एससी-एसटी आरक्षण बढ़ाने के केंद्रीय विधेयक का संकल्प प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित
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संसद और विधानसभाओं में एससी-एसटी आरक्षण को दस साल और बढ़ाए रखने के केंद्रीय विधेयक के समर्थन में संकल्प प्रस्ताव को सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने ही ‘हां में हां’ मिलाकर पारित कर दिया। प्रदेश विधानसभा के मंगलवार को बुलाए विशेष सत्र में यह कार्यवाही हुई। हालांकि, इस बीच अनुसूचित जाति और जनजातियों की अनदेखी पर दोनों पक्षों में तीखी नोकझोेंक होती रही। एक दिन का यह सत्र कांग्रेस विधायक दल के विधानसभा परिसर में जेएनयू में विद्यार्थियों पर हमले के विरोध में किए गए प्रदर्शन के बाद शुरू हुआ।
मंगलवार को 11 बजे के बाद शुरू हुई सदन की यह कार्यवाही लगभग ढाई बजे खत्म हो गई। साढे़ तीन घंटे चले इस सत्र में पहले राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय का संक्षिप्त अभिभाषण हुआ। थोड़े समय के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित कर देने के बाद रामपुर के पूर्व विधायक नींजू राम के देहांत पर शोक व्यक्त किया गया। दोनों सदनों में पारित 126वें संविधान संशोधन विधेयक-2019 के समर्थन में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने संकल्प प्रस्ताव रखा।
इस प्रस्ताव पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायकों ने अपने विचार रखे। भाजपा और कांग्रेस विधायकों ने एक-दूसरे पर एससी और एसटी के लोगों की उपेक्षा के भी आरोप लगाए। हिमाचल में इस वर्ग पर मंदिरों, शिक्षण संस्थानों, सार्वजनिक समारोहों में हो रहे अत्याचारों का मामला भी उठाया। इस दौरान बीच-बीच में दोनों ओर से नोकझोंक और शोर-शराबा होता रहा। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल लगातार दोनों पक्षों को शांत करते रहे। इस संबंध में करीब दो घंटे तक चर्चा हुई।
हालांकि, सत्ता पक्ष के साथ इस विधेयक का समर्थन दोनों पक्षों के विधायकों ने किया। माकपा विधायक भी इसके समर्थन में रहे। बाद में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने इस संकल्प प्रस्ताव के पारण का प्रस्ताव रखा। इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। इसी के साथ ही सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। यह मालूम रहे कि इस विधेयक के अनुसमर्थन प्रस्ताव के बारे में राज्यसभा सचिवालय को 10 जनवरी 2020 तक अवगत करवाया जाना है।
126वें संशोधन के प्रस्ताव का समर्थन पर बेहतर होता, सत्र दिसंबर में बुलाते: मुकेश
नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने संविधान के 126वें संशोधन को लेकर आए प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि उनका दल इसके पक्ष में है। बेहतर होता यह दिसंबर के विशेष सत्र में लाया गया होता। राज्यपाल का अभिभाषण सिर्फ बजट सत्र या नई सरकार के आते ही होता है। राज्यपाल का अभिभाषण सरकार के एक साल का लेखाजोखा होता है। सत्ता पक्ष और विपक्ष राज्यपाल के अभिभाषण पर खुलकर चर्चा करते हैं।
राज्यपाल का अभिभाषण सिर्फ एक पन्ने का तैयार किया गया। क्या अधिकारियों को सरकार के एक साल का लेखा जोखा तैयार करने का समय ही नहीं मिला। अगर दिसंबर में विशेष सत्र बुलाया जाता तो ऐसी नौबत नहीं आनी थी। उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार ने भी तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया और सत्ता पक्ष-विपक्ष ने खुलकर चर्चा की।
70 साल से लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा में आरक्षण दिया जा रहा है। इसकी अवधि 25 जनवरी को खत्म हो रही है। 10 जनवरी से पहले प्रस्ताव पारित करके भेजना है। यह आरक्षण 25 जनवरी, 2030 तक बढ़ाया जाना है। अग्निहोत्री ने कहा कि प्रदेश में 13 एमएलए दलित हैं और इनमें से सरकार ने सिर्फ एक मंत्री बनाया है। इस पर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने कहा कि नियम 174, 175 और 176 के तहत राज्यपाल कभी भी सदन को संबोधित कर सकते हैं। इस पर कोई संशय नहीं रह जाता।
अग्निहोत्री ने कहा कि प्रदेश विधानसभा में 20 सदस्यों में 17 अनुसूचित जाति और 3 अनुसूचित जनजाति के हैं। देश भर में कुल 4122 विधायक हैं। इनमें 614 अनुसूचित जाति और 554 अनुसूचित जनजाति के हैं। देेश में 20 करोड़ अनुसूचित जाति और 10 करोड़ अनुसूचित जनजाति हैं। दलितों से भेदभाव के मामले सामने आते रहते हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह भी पहुंचे
भले ही पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह धर्मशाला के तपोवन में आयोजित शीत सत्र में नहीं जा पाए लेकिन मंगलवार को विशेष सत्र में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। जैसे ही वीरभद्र सिंह ने सदन में प्रवेश किया तो मंत्री महेंद्र सिंह और विक्रम ठाकुर उनके पास गए और हालचाल पूछा। वीरभद्र सिंह राज्यपाल के अभिभाषण तक सदन में मौजूद रहे। जैसे ही अभिभाषण खत्म हुआ तो सदन की कार्यवाही 11.30 बजे तक स्थगित कर दी गई। इसके तुरंत बाद वीरभद्र सिंह सदन से बाहर चले गए।