'चीन-पाक की दोस्ती खतरनाक, संकट को पहचाने भारत'
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भाजपा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने चीन पाक की दोस्ती को भारत के लिए खतरनाक बताया है। कहा कि अगर तिब्बत आजाद होता तो 1962 का भारत-चीन युद्ध नहीं होता। यह युद्ध इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी थी। तिब्बत हिमालय के आंचल में चुपचाप शांत रूप से जी रहा था, लेकिन उस पर चीन ने जबरन आधिपत्य कर लिया।
लाखों तिब्बतियों की जान गई। चीन के व्यवहार से तिब्बत को यह सब सहना पड़ा और सह भी रहा है। इसके विपरीत तिब्बत के 14वें धर्मगुरु दलाईलामा ने चीन के खिलाफ कभी कड़वे शब्द नहीं कहे। जैसे विश्व में अहिंसा के पुजारी बुद्ध थे, वैसे ही आज के समय दुनिया के अहिंसा के पुजारी दलाईलामा हैं।
शांता कुमार दलाईलामा मंदिर मैकलोडगंज में 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद लिखी अपनी हिंदी पुस्तक हिमालय पर लाल छाया के प्रकाशन के 50 वर्ष बाद विमोचन पर बोल रहे थे। कहा कि भारत-चीन युद्ध के समय भारत के लाखों लोगों की जान गई। हजारों सैनिक शहीद हुए।
आज उस युद्ध के 50 वर्ष बाद हालात उससे भी बदतर बन गए हैं। चीन विश्व की महाशक्ति बन गया है। भारत के प्रति उसका व्यवहार अच्छा नहीं है। 1962 के युद्ध के समय चीन भारत की 38 हजार किलोमीटर जमीन हड़प चुका है। किताब का विमोचन करने के बाद शांता ने केंद्र सरकार से शांति के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा को भारतरत्न देने की मांग उठाई।
पाक के जरिए भारत में घुस रहा है चीन
लगभग पांच दशक से अधिक समय बाद इस पुस्तक के पुनर्प्रकाशन का उद्देश्य अतीत के उन पन्नों को पुन: पाठकों तक पहुंचाना हैं, जिसके कारण मातृभूमि पर गहरा संकट आया था। स्थितियां आज भी जस की तस हैं। पिछले कुछ वर्षों से सीमा पर घुसपैठ अपेक्षाकृत अधिक होने लगी है। एक ओर चीन है तो दूसरी ओर चीन का मित्र देश पाकिस्तान।
उत्तर में पाक अधिकृत कश्मीर के भीतर घुसकर चीन भारत की सीमाओं तक पहुंच गया है। दूसरी और उत्तर-पूर्व में हर दिन चीन के घुसपैठ की खबरें असुर्खियां बनती हैं। चीन पाकिस्तान के साथ दोस्ती बना चुका है। दोनों देशों की इस दोस्ती से भारत पर संकट गहरा रहा है। उनकी पुस्तक का विमोचन का उद्देश्य इस संकट के प्रति सचेत करना है।
इस संकट के बारे में देश, सरकार और राजनीतिक दलों को मिलकर आगे आना होगा। इस दौरान दलाईलामा ने शांता कुमार की पुस्तक हिमालय पर लाल छाया, उनकी धर्मपत्नी संतोष शैलजा की अंग्रेजी की पुस्तक इफ ऑटम कमज और डॉ. हेमराज कौशिक कृत लेखक शांता कुमार के कृतित्व पर आलोचनात्मक पुस्तक साहित्य सेवी राजनेता शांता कुमार का विमोचन किया।
दलाईलामा बोले, मुंबई के इस समुदाय से सीखे दुनिया
14वें तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा ने कहा कि 21वीं शताब्दी को अहिंसात्मक शताब्दी के रूप में अपनाना होगा। 20वीं शताब्दी में भौतिक विकास ही हुआ। सात अरब की वैश्विक आबादी में से कुछ लोगों ने सिर्फ हिंसा के रास्ते को अपनाया। लाखों लोगों की हत्या की गई। निर्दोष लोगों पर जुल्म की इंतहा हुई। हिंसा के चलते पूरे एशिया सहित तिब्बत में भी परिवर्तन हुआ।
यह दुखदायी है। 20वीं शताब्दी से सीख लेते हुए अब इस युग को अंहिसारूपी बनाने की जरूरत है। 20वीं शताब्दी में स्वयं की जीत और दूसरी की हार की आदत अपनाने की प्रवृत्ति से विश्व में समस्याएं पैदा हुईं। अब ऐसी ताकतों को अपना मन परिवर्तित कर दूसरों की नीचा दिखाने की आदत को छोड़ना होगा। एशिया सहित तिब्बत की समस्या को समझना होगा।
दलाईलामा मुख्य बौद्ध मंदिर मैकलोडगंज में वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार की 1962 के भारत-चीन युद्ध पर लिखी गई पुस्तक हिमालय पर लाल छाया का विमोचन करने के बाद जनसमूह को संबोधित कर रहे थे। दलाईलामा ने शांता की धर्मपत्नी संतोष शैलजा की अंग्रेजी की पुस्तक इफ ऑटम कमज और डॉ. हेमराज कौशिक कृत लेखक शांता कुमार के कृतित्व पर आलोचनात्मक पुस्तक साहित्य सेवी राजनेता शांता कुमार का विमोचन भी किया। कहा कि शांता कुमार उनके घनिष्ठ मित्र हैं।
हिमालय पर लाल छाया पुस्तक वर्तमान की युवा पीढ़ी के लिए लाभदायक सिद्ध होगी। यह पुस्तक तथ्यों पर आधारित है। इतिहास के लिए आवश्यक है कि वह तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। दबाव से कोई भी काम नहीं करवाया जा सकता है। भारत के लोगों को अपनी प्राचीन परंपरा को संजोकर रखना चाहिए, क्योंकि यह अत्यंत लाभदायक है। अब तिब्बत की संस्कृति और उसके पर्यावरण का संरक्षण ही मेरी जिम्मेदारी है।
हिमाचल के लोग दोस्ताना
दलाईलामा ने कहा कि हिमाचल के लोगों के साथ मेरा गूढ़ संबंध है। हिमाचल के लोग दोस्ताना स्वभाव के हैं। हिमाचल में रहकर मुझे कोई समस्या नहीं आई। हमने लामावाद की मान्यता का उन्मूलन कर नालंदा का उपदेश दुनिया भर में दिया।
मुंबई के पारसियों से सीखे दुनिया
दलाईलामा ने मुंबई में पारसी समुदाय का उदाहरण दिया। कहा कि मुंबई में पारसी समुदाय के करीब 1 लाख लोग सुख-शांति से विभिन्न संप्रदायों के बीच रहते हैं। वे सभी संप्रदायों के बीच प्रसन्न रूप से जीवन जी रहे हैं। दुनिया के लोगों को पारसियों से सीख लेनी चाहिए। यह भारत ही है, जहां विविधता में एकता है।