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गोल्डन कार्ड बने, पर नहीं मिल रहा आयुष्मान योजना का लाभ

Wed, 25 Sep 2019 12:36 PM IST
अरविन्द ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Wed, 25 Sep 2019 12:36 PM IST
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patients not getting benefits of ayushman bharat yojna shimla himachal pradesh
ayushman yojna - फोटो : amar ujala

हिमाचल प्रदेश के इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (आईजीएमसी) शिमला में आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद मरीजों को खुले बाजार से दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं। इलाज के दौरान टेस्ट करवाने के लिए भी मरीजों को जेब से खर्चा करना पड़ रहा है।

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कार्ड होने के बावजूद मरीजों को डॉक्टर दाखिल नहीं कर रहे हैं। बड़ी बात यह है कि बुखार जुकाम जैसी बीमारियों के लिए भी मरीजों को निजी दवा दुकानों में जाना पड़ रहा है। ‘अमर उजाला’ टीम ने आयुष्मान कार्डधारकों को पेश आ रही समस्याओं का जायजा लिया। इसमें गोल्डन कार्डधारकों को आयुष्मान योजना के तहत आ रही परेशानियों के खुलासे हुए हैं।
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लिखित में दे शिकायत: डॉ. जनक
आईजीएमसी शिमला के वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक डॉ. जनक राज ने बताया कि जिन मरीजों से बाहर से दवाएं मंगवाई जाती हैं, वे मरीज लिखित में शिकायत दें। हालांकि सभी दवाएं अस्पताल में ही मुहैया करवाई जा रही हैं।

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टेस्ट के लिए जीजा से 5 हजार रुपये लिए उधार

चौपाल के रोशन लाल मेडिसन वार्ड में दाखिल है। मरीज को पूरे शरीर में दर्द है। दाखिल होने के बाद भी अंदर से पूरी दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। लिहाजा बाहर से महंगी दवाइयां ले रहे हैं। मरीज ने बताया कि हाल ही में डॉक्टरों ने सैंपल लिया, लेकिन उस नमूने को लैब में ले जाया गया तो उसके 45 सौ रुपये से अधिक पैसे जमा करवाने पड़े। जीजा को बोलकर पैसे उधार लिए गए, जिसके बाद टेस्ट हो पाया। उन्होंने कहा कि यह कार्ड दिखावे के लिए बने हैं। हकीकत में इसका फायदा नहीं मिल पाया है।

आयुष्मान कार्ड है, फिर भी बाहर से मंगवाया सामान, 10 हजार से अधिक खर्चा
सिरमौर के दोची गांव की प्रोमिला देवी घर पर गिर गई थीं। दाईं बाजू में फ्रेक्चर हुआ तो इलाज करवाने अस्पताल आ गई। इमरजेंसी में डॉक्टरों ने एक दिन उपचार के लिए रखा व और बाजू पर प्लास्टर लगा दिया। आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद 15 सौ रुपये का सामान बाहर से खरीदा। अब एक सप्ताह बाद अस्पताल बुलाया और कहा कि बाजू ठीक से जुड़ी नहीं है। महिला ने बताया उपचार में दस हजार से अधिक का खर्चा आ चुका है। डॉक्टर भर्ती करने के बजाय अस्पताल के चक्कर कटवा रहे हैं।

बुखार की दवाई बाहर से मंगवाई
रोहडू़ के पद्म चंद ने बताया कि उनकी मां का पथरी का ऑपरेशन हुआ है। कुछ दवाएं अंदर मिलीं तो कुछ को बाहर से लेना पड़ा। अब उपचार के समय मरीज को बुखार आया तो डॉक्टरों ने दवा लिख दी। हर जगह गए लेकिन यह दवाई नहीं मिली। लिहाजा बाहर से महंगी दरों पर दवाइयां लेनी पड़ी। अब तक अस्पताल में इलाज के समय बाहर से खरीदी गई दवाइयों का खर्चा 10 से 12 हजार रुपये के बीच पहुंच गया है। इसके अलावा कार्ड के देरी से एक्टिवेट होने पर एमआरआई के लिए भी 2500 रुपये खर्च करने पड़े।

6900 मरीजों को दिया जा चुका उपचार

आयुष्मान भारत योजना के तहत 6900 मरीजों को उपचार देने का दावा स्वास्थ्य विभाग ने किया है। यह भी कहा है कि इन मरीजों पर 9.86 लाख रुपये इन पर खर्च किए जा चुके है। वहीं यह भी दावा किया है हिमाचल में आईजीएमसी पहले स्थान पर है जबकि दूसरे स्थान पर टांडा अस्पताल है। जहां कि इस योजना का लाभ मरीज उठा रहे हैं।

निशुल्क औषधि पर भी पूरी दवाएं नहीं
अस्पताल परिसर में खोले गए निशुल्क औषधि केंद्र (50) पर भी पूरी दवाएं नहीं हैं। वार्ड से जब मरीजों को पर्ची पर दवाएं लेने के लिए भेजा जाता है तो इक्का-दुक्का दवाएं दी जाती हैं। इसके बाद मरीजों को प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र पर भेजा जाता है। हालांकि यहां पर दवा न मिल पाने के बाद मरीजों को बाहर बाजारों से दवाएं लेनी पड़ रही हैं।

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