राजधानी में सरकारी अमले ही तोड़ रहे कायदे कानून
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राजधानी में भवनों की छतों को लाल या हरे रंग से रंगने को लेकर सरकारी महकमे खुद ही गंभीर नहीं। मुख्य शहर में स्थित उपायुक्त दफ्तर, पुलिस अधीक्षक दफ्तर, विधायक सदन मैट्रोपोल, रिपन अस्पताल सहित कई अन्य सरकारी भवनों की छतें आज भी बदरंग हैं।
नगर निगम आम पब्लिक को तो हाईकोर्ट के आदेशों की आड़ में चेता रहा है लेकिन सरकारी विभागों के अफसरों पर इसका कोई असर नहीं। सरकारी भवनों की कई छतों पर काफी साल पहले रंग हुआ है।
ऐसे में यह रंग हल्का पड़ चुका है। छतों की हालत जर्जर हो गई है। कई सरकारी भवनों की छतों पर तो जंग तक लगा है। नगर निगम की चेतावनी के बाद आम पब्लिक ने तो अपने घरों की छतों को रंगने का काम शुरू कर दिया है लेकिन सरकारी विभाग इसको लेकर गंभीर नहीं।
मुख्य शहर के अलावा कसुम्पटी स्थित एसडीए कांप्लेक्स में कई विभागों के निदेशालयों की छतों पर भी कोई रंग नहीं है। यहां कहीं सरकारी महकमों की छतों से रंग गायब हो चुका है।
साल 2006 में शुरू हुई थी मुहिम
नगर निगम के वास्तुक योजनाकार केएस चौहान ने कहा कि सभी सरकारी विभागों को छतों को रंगने के लिए सूचित किया जा रहा है। इसके बावजूद भी अगर आदेश नहीं माने गए तो विभागों की लिस्ट बनाकर हाईकोर्ट को सौंपी जाएगी। लिहाजा इसके बाद ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो सकती है।
हालांकि शहर में सैकड़ों ऐसे मामले हैं जहां छतें रंगी नहीं हैं या फिर रंग अब मिट चुका है। ऐसे में नगर निगम के ताजा फरमानों से दोबारा छतें रंगनी होंगी।
हाईकोर्ट ने त्रिशा शर्मा बनाम राज्य सरकार के केस नंबर 956/2003 की सुनवाई करते हुए छतों को लाल या हरे रंग से रंगने के आदेश दिए थे। नगर निगम के बिल्डिंग बॉयलाज 1998 में भी इसका उल्लेख है।
साल 2006 के दौरान हाईकोर्ट के आदेशों के चलते समूचे शहर में छतों को रंगने की मुहिम शुरू हुई थी। लेकिन बीते सालों में निरीक्षण नहीं करने के चलते यह अभियान अधर में छूट गया था। जिसे नगर निगम ने दोबारा शुरू किया है। शिमला शहर में सि्थत रिपन अस्पताल। अस्पताल के भवन की छत भी बदरंग हो चुकी है। अमर उजाला