ऐतिहासिक मिंजर मेले का आगाज, बेटियों ने दिया बेटी बचाने का संदेश
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ऐतिहासिक मिंजर मेले का आगाज रविवार को चंबा में पूरे परंपरागत अंदाज में हुआ। भगवान रघुनाथ को मिंजर अर्पित करने की रस्म पंडित व प्रशासन की मौजुदगी में मिर्जा परिवार ने पूरी की। चंबा में यह परंपरा 17वीं शताब्दी से चली आ रही है।
इससे पूर्व राज्यपाल का दौरा रदद होने के बाद नगरपरिषद ने शहर भर में जुलूस निकाला और मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना की। शाही अंदाज में निकाले गए इस जुलूस में प्रशासनिक अधिकारी व नगरपरिषद के पदाधिकारी शामिल हुए।
भगवान रघुनाथ को मिंजर अर्पित करने के बाद चौगान में भव्य आतिशबाजी के बीच झंडा चढ़ाने की रस्म अदायगी कर वनमंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी ने मिंजर मेले के आगाज की घोषणा की। उन्होंने मिंजर को आपसी सौहार्द व भाईचारे का त्यौहार बताया।
उन्होंने कहा कि मिंजर मेले से चंबा की पहचान जुड़ी है और कई सदियों से इस मेले को मनाया जा रहा है। चंबा रियासत के समय में मिंजर का जो प्रारूप था मौजूदा हालात उससे काफी अलग हैं लेकिन अभी भी कई परंपराएं ऐसी हैं जो चंबा को पुर्वजों की देन हैं।
डेढ़ हजार मां-बेटियों ने नृत्य कर दिया बेटी बचाने का संदेश
डेढ़ हजार मां-बेटियों ने रविवार को चौगान मैदान में करीब आधा घंटा नृत्य कर बेटी बचाने का संदेश दिया। अनोखे अंदाज में शुरू हुए मिंजर मेले में चौगान मैदान बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारों से गूंज पड़ा।
जिले भर से पहुंचीं मां-बेटियों ने यहां एक स्वर में बेटी की रक्षा और उसे शिक्षित करने का संदेश दिया। डीसी सुदेश मोख्टा ने बताया कि इस आयोजन का मकसद रिकॉर्ड बनाना नहीं बल्कि गांवों व शहरी लोगों को संदेश देना था।
महिला एवं बाल विकास विभाग ने सिर्फ दो दिन की कड़ी मेहनत से डेढ़ हजार मां-बेटियों को एक लय में पिरोया था। इस आयोजन का हिस्सा बनने पहुंची तीसा की बेटी सपना ने बताया कि वह दो बहनें हैं। उनके माता-पिता उन्हें बहुत प्यार करते हैं।
लेकिन ऐसी स्थिति उनके गांव में हर जगह नहीं है। बेटी के पैदा होने पर लोग मां को प्रताड़ित करते हैं। हर जगह बेटा पैदा होने की चाह दिखती है। इस सोच को बदला जाना चाहिए। महिला कमला, रीना, शकुंतला, सरिता ने बताया कि बेटे के लिए परिवार का दबाव रहता है। लेकिन आज के जमाने में बेटियां भी कम नहीं।
मिंजर मेले में नहीं पहुंचे राज्यपाल, वनमंत्री ने किया उद्घाटन
करीब तीन साल से मिंजर की शुरूआत राज्यपाल से करवाने का ख्वाब देख रहे चंबा की मुराद इस बार भी पूरी नहीं हो पाई। मौसम के खलल की वजह से राज्यपाल आचार्य देवव्रत चंबा नहीं पहुंच पाए। प्रशासन सुबह से ही उनके आने का इंतजार कर रहा था।
राज्यपाल की अगुवाई के लिए सुल्तानपुर हेलीपैड पर सभी प्रबंध कर लिए गए थे। अग्निशमन विभाग की गाड़ी सुबह से हेलीपैड पर मौजूद थी। लेकिन इस बीच जिला प्रशासन को राज्यपाल के मिंजर मेले में न पहुंच पाने की सूचना मिली।
आनन-फानन में जिला में ही मौजूद वनमंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी को मिंजर उद्घाटन कार्यक्रम का मुख्यातिथि बनाया गया। वनमंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी ने विधिवत रूप से झंडा चढ़ाने की रस्म अदाकर मिंजर मेले की शुरूआत की।
राज्यपाल के आगमन को लेकर उत्साहित स्वयंसेवी संस्थाओं व अन्य लोगों को मायूसी झेलनी पड़ी है। खासतौर पर साझा मोर्चा जिसने राज्यपाल से मिलकर चंबा में स्वास्थ्य की बिगड़ते हालतों का मुद्दा उठाने की बात कही थी।
गौरतलब है कि चार सालों से चंबा मिंजर मेले के उद्घाटन समारोह में राज्यपाल नहीं पहुंच पाए हैं। मिंजर के समापन पर मुख्यमंत्री भी नियमित रूप से चंबा नहीं आ पाते हैं। पिछले साल भी मिंजर विसर्जन के मौके पर मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह चंबा नहीं आए थे।