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स्मृति शेष: सियासी जीवन में वीरभद्र सिंह के साथ पंडित सुखराम का रहा 36 का आंकड़ा
Thu, 12 May 2022 10:58 AM IST
Krishan Singh
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
Published by: Krishan Singh
Updated Thu, 12 May 2022 10:58 AM IST
सार
छह बार मुख्यमंत्री रहे दिवंगत वीरभद्र सिंह और पंडित सुखराम का सियासी जीवन में छत्तीस का आंकड़ा रहा। हालांकि, वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में वह एक साथ दिखे।
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दिवंगत वीरभद्र सिंह और पंडित सुखराम(फाइल)
- फोटो : संवाद
विस्तार
छह बार मुख्यमंत्री रहे दिवंगत वीरभद्र सिंह और पंडित सुखराम का सियासी जीवन में छत्तीस का आंकड़ा रहा। हालांकि, वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में वह एक साथ दिखे। सुखराम हिमाचल के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन वीरभद्र की सियासी चालों से मात खाते रहे। पंडित सुखराम और वीरभद्र सिंह के बीच तनातनी का एक किस्सा साल 1993 का है, जब हिमाचल की आठवीं विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को जनता ने 52 सीटों पर विजय दिलवाई। वर्ष 1993 में पंडित सुखराम हिमाचल के मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए। उनकी जगह वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री बने थे।
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हाईकमान भी सुखराम को मुख्यमंत्री बनाना चाह रहा था, लेकिन राजनीति इतनी हावी हो गई कि वह मुख्यमंत्री पद से चूक गए। इसी तरह 1998 में सुखराम के पाले में गेंद रही। इस वर्ष नौवीं विधानसभा के चुनाव में सुखराम ने हिमाचल विकास कांग्रेस (हिविकां) पार्टी का गठन किया। भाजपा और कांग्रेस को 31-31 सीटें मिलीं। हिविकां को पांच सीटें मिलीं। सुखराम ने धूमल सरकार को समर्थन दिया और गठबंधन की सरकार हिमाचल में बनी और धूमल मुख्यमंत्री बने थे।
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आया राम, गया राम बोलने के बाद अनिल ने दिया था इस्तीफा
अक्तूबर 2017 के विधानसभा चुनाव में वीरभद्र और सुखराम एक बार फिर मंच पर आमने-सामने थे। सार्वजनिक मंच पर दोनों एक-दूसरे के खिलाफ खुलकर सामने आए। तब वीरभद्र मुख्यमंत्री थे। उन्होंने सुखराम के परिवार का इतिहास गिनाते हुए उन्हें आया राम, गया राम की संज्ञा दी। पहले से नाराज चल रहे सुखराम के बेटे अनिल शर्मा ने कांग्रेस के मंत्री पद से इस्तीफा देकर भाजपा ज्वाइन की और 2017 के चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस के मजबूत मंडी सदर के किले पर भगवा फहराया। 2019 के विधानसभा चुनावों में वह अपने पोते आश्रय के साथ फिर से कांग्रेस में शामिल हुए। वीरभद्र के साथ दिल्ली में मंत्रणा की। दोनों का गले मिलने वाला फोटो खूब वायरल हुआ। आश्रय को लोकसभा का टिकट कांग्रेस की मिला। इन चुनावों में वीरभद्र और सुखराम की जोड़ी चुनावी रण में उतरी, लेकिन नाकाम रही। चुनावों में भाजपा के दिवंगत रामस्वरूप शर्मा ने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की थी।
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