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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Literature Festival Shimla: Lyricist, Poet and Filmmaker Gulzar said that Film script should also find place in literature like drama

Literature Festival Shimla: गुलजार बोले- फिल्मी पटकथा को भी नाटक की तरह साहित्य में मिलना चाहिए स्थान

Thu, 16 Jun 2022 11:03 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Thu, 16 Jun 2022 11:03 PM IST
सार

शिमला में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव उन्मेष का शुभारंभ हो गया है। पहले सत्र की गीतकार गुलजार ने अध्यक्षता की। इसमें फिल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज, गौतम घोष, पद्म विभूषण सई परांजपे सहित बॉलीवुड की कई हस्तियों ने चर्चा में हिस्सा लिया।

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Literature Festival Shimla: Lyricist, Poet and Filmmaker Gulzar said that Film script should also find place in literature like drama
अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव में गुलजार व अन्य। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बॉलीवुड के जाने-माने गीतकार, कवि और फिल्मकार गुलजार ने कहा है कि फिल्मी पटकथा संवाद को भी नाटक की तरह साहित्य में स्थान मिलना चाहिए। यह बात उन्होंने गुरुवार को शिमला में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव उन्मेष के शुभारंभ पर कही। केंद्रीय संस्कृति राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इस उत्सव का उद्घाटन किया। गुलजार ने कहा कि यह विचार-विमर्श साहित्य और सिनेमा पर हो रहा है। आज सिनेमा साहित्य अकादमी की बगल में खड़ा है। सिनेमा भी अभिव्यक्ति की एक नई जबान पैदा हुई है। मूविंग इमेज से लेकर तकनीकी विकास तक सिनेमा ने आज तक की एक लंबी यात्रा तय की है। जब कहानी सुनाने की बात आई तो कहानियों की तलाश चली। यह उत्सव 18 जून तक चलेगा। इसमें देश-विदेश के 425 से अधिक लेखक भाग ले रहे हैं। 

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पहले दिन ‘सिनेमा और साहित्य’ पर जबरदस्त सत्र हुए। पहले सत्र की गीतकार गुलजार ने अध्यक्षता की। इसमें फिल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज, गौतम घोष, पद्म विभूषण सई परांजपे सहित बॉलीवुड की कई हस्तियों ने चर्चा में हिस्सा लिया। गुलजार ने कहा कि जब सिनेमा शुरू हुआ तो भारत में कहानियों की कमी नहीं थी। महाभारत, रामायण, लोक साहित्य जैसी चीजें रहीं। समय बीतने के बाद तकनीक के साथ हाथ-पांव खुल गए। अब यह यात्रा रोचक अंदाज में पहुंच गई है। यह सिनेमा ही लग रहा था। इसे साहित्य कहने की हिम्मत नहीं होती थी।
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साहित्य से केवल कहानियां उठाई जाती थीं। अब सिनेमा की अपनी जमीन बन गई है। सिनेमा साहित्य को आगे पहुंचाने का एक बड़ा स्रोत बन गया। अब ख्याल किसी और का, कहानी किसी और की और सिनेमा में फिल्म बनाने वाला कोई और है। सिनेमा उस जगह पर आया है कि कई जगह कहानी उठाए बगैर काम हो रहा है। अब सिनेेमा बड़ा हो गया है। इसका कद बढ़ गया है। हालांकि इसकी उम्र बहुत कम यानी 100 साल है, जबकि साहित्य 2000 साल पुराना है। सोशल मीडिया के साहित्य और सिनेमा पर प्रभाव पर आए एक सवाल पर गुलजार बोले कि कोई भी फाइन आर्ट किसी भी फॉर्म में दर्ज हो रहा है। चाहे वह मीडिया हो, साहित्य, सिनेमा, संगीत जो भी हो, इससे वह वक्त दर्ज हो रहा है। आप भी इतिहास के हिस्से होंगे, जैसे-जैसे वक्त गुजर रहा है। हर वह चीज जो वक्त को दर्ज कर रही है, वह सार्थक है।  
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पहले दिन सात स्थानों पर हुए 18 कार्यक्रम 
इस उत्सव के पहले दिन सात स्थानों पर 18 कार्यक्रम हुए। गेयटी थियेटर और टाउन हॉल में छह स्थानों पर कार्यक्रम हुए। रिज मैदान पर सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। ये कार्यक्रम मुख्य सभागार, गौथिक हॉल, ललित कला गैलरी, टैवर्न हॉल, टाउन हॉल, सभा कक्ष और रिज मैदान पर सजाए गए मंच पर हुए।

सिनेमा तो साहित्य से भी पार, इसमें चित्रकला, संगीत, काव्य सब : विशाल भारद्वाज 

Literature Festival Shimla: Lyricist, Poet and Filmmaker Gulzar said that Film script should also find place in literature like drama
विशाल भारद्वाज - फोटो : अमर उजाला

कमीने, ओंकारा, ब्लू अंबरेला जैसी कई फिल्मों के निर्देशक और पटकथा लेखक विशाल भारद्वाज ने कहा कि रस्कि न साहब की ब्लू अंबरेला बहुत छोटी कहानी थी। छाता चुराने के बाद चोर पकड़ा जाता है। इसमें चोर पकड़ा जाता था। यह 45-50 मिनट की लघु फिल्म मिलती थी। अपने यहां एक कहानी है, सियार के रंग में गिर गया। उसका रंग बदल गया। उससे एक क्लू मिला। एक डेढ़ साल बाद याद आया कि छतरी न मिले तो आगे वह पूरी फिल्म बनेगी। इसके बाद इस पर फिल्म बनी। वह यह इसलिए कहना चाहते हैं कि सिनेमा में फाइन आर्ट्स का मिश्रण है। चित्रकला, संगीत, काव्य इसमेें सब होता है। यह तो साहित्य से भी पार जाता है। उनके लिए साहित्य यही है। 

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