साथियों के शव देख खून खौला और टूट पड़ा दुश्मनों पर: कैप्टन लीलाराम
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कारगिल युद्ध में विजय पताका फहराने वाले 18 ग्रेनेडियर के ददाहू के जांबाज कैप्टन लीला राम की आंखें आज भी उस मंजर को याद करके भर आती हैं। उन्होंने बताया कि एक समय साथियों के शवों को देख उनका खून खौला और ललकारते हुए दुश्मनों पर टूट पड़े थे। उनके सिर पर दुश्मनों का खात्मा करने का भूत भी सवार हो गया था। उन्होंने बताया कि अपनी टीम के 38 साथियों की शहादत को अपनी आंखों से देखा था।
करीब 20 साथियों के शवों को उन्होंने अपने कंधे पर उठाकर नीचे ढोया था। उनकी मौत का गम आज भी उनसे भुलाया नहीं जा रहा है। कैप्टन लीला राम ने बताया कि उन्होंने मौत को करीब से देखा है। भले ही आज पूरा देश कारगिल विजय दिवस की 20वीं वर्षगांठ मना रहा है, लेकिन युद्ध का मंजर आज भी उनके जहन में है। कैप्टन लीला राम ने युद्ध के दौरान टाइगर हिल व द्रास में एक साथ कई घुसपैठियों को मौत की नींद सुलाया था।
कारगिल युद्ध का जिक्र करते हुए कैप्टन लीला राम की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने का जिम्मा भी उन्हीं की बटालियन 18 ग्रेनेडियर को सौंपा गया था। आक्रमण व जवाबी हमले में इस बटालियन ने दुश्मन पर ताबड़तोड़ हमले करके उन्हें मौत के घाट उतारा। अंत में विजय का सेहरा भी उनकी बटालियन के सिर ही बंधा।
कैप्टन लीला राम ने कहा कि उनकी बटालियन को परमवीर चक्र से भी सम्मानित किया गया है। वह अपनी बटालियन में सबसे प्रिय थे। 7 मार्च 2007 को लीला राम कैप्टन के पद से सेवानिवृत्त होकर अपने घर ददाहू लौट आए थे। इन दिनों वह ददाहू में ही युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ उनको निशुल्क प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।