हिमाचल: सीएम के लिए जयराम का दावा मजबूत, धूमल कैंप हार कर भी हारने को नहीं तैयार
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भाजपा में मुख्यमंत्री चेहरा तय करने को केंद्रीय पर्यवेक्षकों की रायशुमारी के बाद अब सबकी नजरें दिल्ली पर टिकी हैं। चुनाव नतीजा निकलने के चार दिन बाद भी भाजपा मुख्यमंत्री का नाम तय नहीं कर पाई है। अब भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुख्यमंत्री कौन?
इसका जवाब मोदी और शाह के अलावा किसी के पास नहीं, लेकिन मुख्यमंत्री के नाम पर सहमति की जगह दिखी धूमल और नड्डा कैंप की खेमेबाजी में जयराम ठाकुर एकाएक फ्रंट में दिख रहे हैं। यह अलग बात है कि नड्डा खेमे के माने जाने वाले जयराम अलग खेमा बनाने के बजाए पुरानी आस्थाओं पर अब भी टिके हैं।
यह उनके साथ नड्डा को भी रेस में बनाए रखने का कारगर दांव साबित हो सकता है। इस दांव में नड्डा-जयराम संयुक्त तौर पर सबसे मजबूत हैं। दिल्ली जिसके नाम पर फैसला ले, दूसरा उसका समर्थन करेगा।
नड्डा खेमे को इस बीच सबसे बड़ी चुनौती एक बार फिर धूमल खेमे से मिलती दिखी। नेता की हार के बावजूद धूमल खेमा हारने को तैयार नहीं है। मुख्यमंत्री के लिए छिड़ी प्रतिस्पर्धा में मंत्रिमंडल में जगह दिलवाने को लेकर लॉबिंग का दांवपेच भी खेला गया है।
जयराम विधायकों में सबसे मजबूत
शिमला में इस खेमे का शक्ति प्रदर्शन धूमल को सबसे बड़ा नेता के तौर पर पेश करने में कितना कारगर हुआ, इसका नतीजा पार्लियामेंट्री बोर्ड से निकलने वाले सीएम से होगा। सूत्रों की मानें तो धूमल खेमे के पास विधायकों की संख्या भी सबसे अधिक है।
मंडी-कुल्लू-बिलासपुर के गठजोड़ के बावजूद नड्डा-जयराम खेमा कांगड़ा-चंबा से मिलने वाले समर्थन पर टिका है। सांसद शांता भले धूमल के विरोध में हैं, लेकिन अपने क्षेत्र के विधायकों को नड्डा के पक्ष में खड़ा करना उनके लिए भी आसान नहीं रहा।
पार्टी के भीतर चले रहे इसी सियासी ताने-बाने पर पर्यवेक्षकों निर्मला सीतारमण और नरेंद्र तोमर की रिपोर्ट पार्लियामेंट्री बोर्ड के सामने रखी जाएगी। इसी पर पार्लियामेंट्री बोर्ड को निर्णय लेना है।
हालांकि चर्चा यह भी है कि पर्यवेक्षकों को लिखित में धूमल को सीएम बनाने का पत्र भी विधायकों की ओर से दिया गया है।
जयराम विधायकों में सबसे मजबूत माने जा रहे हैं, जबकि नड्डा और धूमल को पैराशूट से उतार कर उपचुनाव झेलने का जोखिम भी साथ जुड़ा है। इन तमाम सियासी गुणा भाग के बाद केंद्र वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव के लिहाज से अंतिम फैसला सुनवाएगा।
नड्डा और धूमल कैंप की सियासत शांता खेमे पर टिकी
धूमल के हारने के बाद एकाएक जयराम के प्रदेश भाजपा की सियासत में सक्रिय होने के मायने अभी साफ नहीं हुए हैं। इसे नड्डा कैंप की मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही सियासत का हिस्सा माना जा रहा है।
नड्डा कैंप का सीएम चेहरा वही है, लेकिन किसी भी उलटफेर की संभावना बनी तो जयराम कवरिंग कैंडिडेट के तौर पर हो सकते हैं। नड्डा और धूमल कैंप में छिड़ी खींचतान में अब शांता खेमा भी अहम हो गया है।
जयराम की संघ में मजबूत पृष्ठभूमि, एबीवीपी का बैकअप और राजपूत होना सभी समीकरणों पर भारी दिख रहा है।
तीन दिनों में जयराम जिस तरह पर्दे के पीछे से आगे निकले हैं, उससे अब वे नड्डा से अधिक मजबूत प्रत्याशी दिख रहे हैं। जयराम के नाम पर धूमल खेमे को मात देने के लिए शांता खेमा भी तैयार हो सकता है।
सभी विधायकों से नहीं हुई मुलाकात
दिल्ली से आए पर्यवेक्षकों की सभी विधायकों से मुलाकात नहीं हुई है। वरिष्ठ विधायकों महेंद्र ठाकुर, सुरेश भारद्वाज, राजीव बिंदल, विपिन परमार, किशन कपूर से पर्यवेक्षकों ने खुद मुलाकात की।
जबकि अन्य विधायकों को निमंत्रण था, अगर वे अपनी बात रखना चाहे तो रख सकते हैं। ऐसे में पहली बार जीतकर आए कुछ विधायक शिष्टाचार के तौर पर पर्यवेक्षकों से मिले हैं, जबकि कांगड़ा और हमीरपुर संसदीय क्षेत्र के कई विधायक आए ही नहीं।