International Literature Festival: शिमला में अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव शुरू, केंद्रीय राज्य मंत्री ने किया उद्घाटन, गुलजार भी पहुंचे
अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव ‘उन्मेष’ गुरुवार को शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थियेटर के मुख्य सभागार में शुरू हुआ। यह 18 जून तक चलेगा। उत्सव में करीब 425 लेखक, कवि और कलाकार आए हैं। 15 देशों के लोग आए हैं। यहां 60 भाषाओं के लोग हैं।
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अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव ‘उन्मेष’ गुरुवार को शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थियेटर के मुख्य सभागार में शुरू हुआ। यह 18 जून तक चलेगा। इसका उद्घाटन केंद्रीय संसदीय कार्य एवं संस्कृति राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने किया। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि शिमला जैसे ऐतिहासिक शहर में साहित्यिक चिंतन का बड़ा आयोजन है। इस मंथन से अमृत निकालेंगे। ऐसा उत्सव प्रतिवर्ष करने का प्रयास करेंगे। यह अपनी तरह का पहला आयोजन है। प्रथम साहित्य सम्मेलन शिमला में हो रहा है। बहुत से लोग पूछ रहे हैं कि ‘उन्मेष’ क्या है। इसका अर्थ प्रकट करना, सुबह-सुबह आंखें खोलना, खिलना, अभिव्यक्ति आदि को ‘उन्मेष’ कहते हैं।
भारत कैसा हो, इसका मनन करेंगे। करीब 425 लेखक, कवि और कलाकार आए हैं। 15 देशों के लोग आए हैं। यहां 60 भाषाओं के लोग हैं। ये आजादी का अमृत महोत्सव है। आदिवासी साहित्य सृजन भी विषय रहा। पद्म विभूषण और जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि साहित्य के बिना भारत ही नहीं, विश्व का हाहाकार मिटाया नहीं जा सकता है। साहित्य वह विधा है, जो जीवन से पशुता को दूर करता है। पशु उतना घातक नहीं होता, जितनी पशुता होती है। कार्यक्रम में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. चंद्रशेखर कंबार और शिक्षा मंत्री गोविंद ठाकुर विशेष रूप से मौजूद रहे।
विदेशों से आए साहित्यकारों के लिए मंत्री ने बजाईं तालियां
इंग्लैंड, यूएसए, नेपाल, नीदरलैंड से आए लोगों के लिए केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने तालियां बजाईं। मेघवाल ने गेयटी थियेटर के मुख्य सभागार में उन्हें हाथ खडे़ करने को कहा।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लेकिन देश के खिलाफ बोलने में संविधान में कुछ बंदिशें भी
मेघवाल ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन देश के खिलाफ कितना बोलना है, इसकी संविधान में कुछ बंदिशें भी हैं। इस बारे में महापुरुषों ने रास्ता दिखाया है। डॉ. बीआर आंबेडकर ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खूब लाभ उठाया, उसमें महात्मा फुले, मैक्समूलर की कई बातों को भी काटा, जबकि फुले को वह गुरु मानते थे। डॉ. आंबेडकर ने सिद्ध किया कि आर्य बाहर से नहीं आए। वेद पुराने हैं, उनमें कई बार आर्य शब्द आया है तो वे कहां बाहर से आए।
हिमाचल की संस्कृति को भी नजदीक से देखना
मेघवाल ने साहित्यकारों कर आह्वान किया कि हिमाचल की संस्कृति को भी नजदीक से देखना, हिमाचल की लोक संस्कृति और खान-पान के बारे में भी परिचय करवाना।
पद्म विभूषण अवार्डी साई परांजपे ने की अध्यक्षता
गेयटी के गौथिक सभागार में जानी-मानी कलाकार पद्म विभूषण अवार्डी साई परांजपे ने सिनेमा और साहित्य पर कार्यक्रम की अध्यक्षता की। गुजराती के कवि प्रबोध पारेख ने कहा - मेरी पहली वफादारी सहित्य के लिए है। हमें यह कहना होगा कि सिनेमा साहित्य है और साहित्य सिनेमा है। वह सिनेमा को साहित्य के रूप में ही पाते हैं।
फिल्म बनाने के लिए साहित्य लिखेंगे तो नहीं बन पाएगी : यतींद्र मिश्र
सिनेमा के लिए लेखन पर बहुत से पुरस्कारों से सम्मानित यतींद्र मिश्र ने कहा कि साहित्य अगर इस दिमाग से लिखेगा कि इसकी फिल्म बनानी है तो यह ठीक से नहीं बन पाएगी। सिनेमा को एक फ्रेम में रचा जाता है। साहित्य का फलक बहुत विस्तृत होता है। उन्होंने कहा कि फिल्म को साहित्यिक दर्जा मिलना चाहिए। गुलजार साहब ने बहुत से प्रयोग किए हैं। इनका शिल्प बिल्कुल नया है। गुजराती के कवि प्रबोध पारेख ने कहा कि उनकी पहली वफादारी साहित्य के लिए है। उन्हें यह कहना होगा कि सिनेमा साहित्य है और साहित्य सिनेमा है। वह सिनेमा को साहित्य के रूप में ही पाते हैं। उन्होंने यह बात गौथिक हाल में पद्म भूषण अवार्ड से सम्मानित स्पर्श, कथा, चश्मे-बदूर, दिशा जैसी फिल्मों की निर्देशक और फिल्मी पटकथा लेखक सई परांजपे की अध्यक्षता में हुए सत्र में कही।
अभिनेत्री और लेखिका दीप्ति नवल भी पहुंचीं, दर्शकों की तरह बैठीं
अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव में जानी मानी अभिनेत्री दीप्ति नवल भी पहुंचीं। वह दर्शकों की तरह गौथिक हॉल मेें बैठी रहीं और साहित्य और सिनेमा पर चर्चा में हिस्सा लेती रहीं। शुक्रवार को वे चर्चा में अपनी बात रखेंगी।
माल रोड पर घूमे गुलजार, विशाल भारद्वाज और अन्य हस्तियां
बालीवुड के गीतकार गुलजार और फिल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज समेत कई हस्तियां माल रोड पर घूमती रहीं। यहां लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बने रहे। कई लोगों ने इस सितारों के साथ सेल्फी भी ली।
साहित्य उत्सव में दिखी लोक संस्कृति की झलक
अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव का आगाज लोक वाद्ययंत्रों की धुन पर हुआ। ऐतिहासिक गेयटी थियेटर में साहित्य उत्सव के पहले दिन सरस्वती कला मंच ठियोग के कलाकारों ने ढोल-नगाड़े, करनाल और शहनाई की धुनों पर हिमाचल की लोक संस्कृति की झलक पेश की।
शहनाई वादक नरेश ने पैहर सवेला रीए गई.. गीत पर लेखक, गीतकार, अनुवादक, फिल्मकार, कवियों और विद्वानों सहित कई हस्तियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में श्यामलाल, सतपाल, मुकेश, अभिषेक, कृष्णानंद और दीपक ने ढोल-नगाड़े की थाप पर समां बांधा। लोअर और अपर महासू की भी कार्यक्रम में झलक दिखी। मंच की प्रधान एवं प्रसिद्ध गायिका कमला मेक्टा भी मौजूद रहीं।
शब्दों से बनता है साहित्य, भाव को साकार करते हैं शब्द: सोनल मानसिंह
प्रख्यात नृत्यांगना और राज्यसभा सांसद डॉ. सोनल मानसिंह ने गुरुवार को शिमला के गेयटी थियेटर में साहित्य के मायने समझाए। उन्होंने कहा कि शब्दों से साहित्य बनता है। शब्द ही भाव को साकार करते हैं। भारतीय संस्कृति में कला और साहित्य जुड़े हैं। शब्दों को मूर्त रूप देने का काम नृत्य करता है। इससे अध्यात्म भी प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1994 में किए गए द्रोपदी नृत्य को खूब सराहा गया था। इस नृत्य के माध्यम से समाज में व्याप्त समस्याओं का प्रदर्शन किया गया। कई समस्याओं का इसके बाद सरकार ने निराकरण भी किया। साहित्य ने मेरा जीवन सफल किया है। गेयटी थियेटर के मुख्य सभागार में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मेरे लिए साहित्य के मायने को लेकर केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और पूर्व राज्यपाल राम नाईक ने भी अनुभव साझा किए। केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण है। यह जीना सिखाता है।
जब वह स्कूल में पढ़ते थे, तब शिक्षक के लिखे उपन्यास ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। कुत्तों का ध्यान रखने को लेकर लिखे गए उस उपन्यास ने समाज की सेवा करने का जज्बा पैदा किया। शिक्षक के इस उपन्यास को पुरस्कार भी प्राप्त हुए। कहा कि उनकी शादी साढ़े 13 वर्ष की आयु में हो गई थी। पत्नी का मेरे जीवन में बहुत योगदान है। अब शादी के 50 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने पत्नी पर किताब लिखी है। शादी को हमने भौतिक मान लिया है, जबकि यह पवित्र रिश्ता होता है। साहित्य का मतलब सुखी जीवन ही होता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल राम नाईक ने कहा कि मैं एक एक्सिडेंटल लेखक हूं। पहली बार कोई किताब लिखी है। उन्होंने कहा कि जनजीवन भी साहित्य सुधार सकता है। इनके अलावा पूर्व प्रशासक व लेखक राघव चंद्रा और मराठी नाटककार, निर्देशक, शिक्षाविद् व अभिनेता सतीश आलेकर ने भी साहित्य के मायने को लेकर चर्चा की।
सोनल मानसिंह ने दी शानदार प्रस्तुति
पद्मभूषण और पद्मविभूषण से अलंकृत प्रख्यात नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने भरतनाट्यम, ओडिसी और छाऊ जैसी कई भारतीय शास्त्रीय नृत्यों को प्रदर्शित कर ऐतिहासिक गेयटी थियेटर को सराबोर कर दिया। शाम सात बजे समारोह की शुरुआत गोयल जयदेव की नृत्य रचना ‘कृष्ण कालिया’ से पेश की। इसके बीच कलाओं की प्रख्यात नृत्यांगना के शिष्य अनमोल राज, रमेश, राम गौतम ने नृत्य का आगाज ‘जय जय देव हरे’ के गायन से हुआ। नृत्यांगना नंदनी और करिश्मा ने रचना में जंगल में पानी, चिड़िया, हिरण और पेड़ को मुद्राओं और भावों को नृत्य के माध्यम से पेश कर खूब वाहवाही बटोरी। इस दौरान सोनल मान सिंह ने भी कृष्ण कालिया और भगवान विषणु के दशावतार प्रसंग पर दमदार प्रस्तुतियां देकर अभिनय की छाप छोड़ी।