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Shimla News: चेक बाउंस के मामले में 10 वर्ष बाद दोषी करार
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पांच महीने की सजा और 6 लाख का जुर्माना
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सुनाया फैसला
साल 2011 में पंजाब नेशनल बैंक का मामला
दोषी ने साइबर कैफे खोलने के लिए लिया था 4.75 लाख रुपये का ऋण
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। जिला अदालत ने चेक बाउंस मामले में कोटखाई निवासी वीरेंद्र सिंह को 10 साल बाद दोषी करार देते हुए पांच महीने की कैद की सजा सुनाई है। साथ ही 6 लाख रुपये की राशि का मुआवजा भी देना होगा।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विवेक शर्मा की अदालत ने यह फैसला सुनाया है। दोषी वीरेंद्र सिंह ने साइबर कैफे खोलने के लिए 4.75 लाख उधार लिए थे जिसे वह ब्याज सहित चुकाने में असमर्थ रहा। शिकायतकर्ता के अनुसार आरोपी ने 31 अक्तूबर 2011 में पंजाब नेशनल बैंक से 4.75 लाख रुपये का ऋण लिया था। ऋण स्वीकृत होने के एक महीने बाद शुरू होने वाली मासिक किस्तों में प्रति वर्ष ब्याज के साथ चुकाने के लिए समझौता हुआ था। लेकिन आरोपी भुगतान करने में विफल रहा। 27 फरवरी 2014 को शिकायतकर्ता को एक बैंक का चेक जारी किया। लेकिन बैंक खाते में पर्याप्त धनराशि न होने के कारण चेक बाउंस हो गया। इसके बाद आरोपी को राशि के भुगतान करने के लिए कानूनी नोटिस भी जारी किया। 26 अप्रैल 2014 को निर्धारित समय में कर्ज न चुकाने पर शिकायतकर्ता ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत न्यायालय के समक्ष केस दायर किया था। न्यायालय में केस के दौरान दोनों पक्षों की ओर दलीलें दी गई और सबूतों के आधार पर न्यायालय ने आरोपी को दोषी करार देते यह फैसला सुनाया है। संवाद
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मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सुनाया फैसला
साल 2011 में पंजाब नेशनल बैंक का मामला
दोषी ने साइबर कैफे खोलने के लिए लिया था 4.75 लाख रुपये का ऋण
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। जिला अदालत ने चेक बाउंस मामले में कोटखाई निवासी वीरेंद्र सिंह को 10 साल बाद दोषी करार देते हुए पांच महीने की कैद की सजा सुनाई है। साथ ही 6 लाख रुपये की राशि का मुआवजा भी देना होगा।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विवेक शर्मा की अदालत ने यह फैसला सुनाया है। दोषी वीरेंद्र सिंह ने साइबर कैफे खोलने के लिए 4.75 लाख उधार लिए थे जिसे वह ब्याज सहित चुकाने में असमर्थ रहा। शिकायतकर्ता के अनुसार आरोपी ने 31 अक्तूबर 2011 में पंजाब नेशनल बैंक से 4.75 लाख रुपये का ऋण लिया था। ऋण स्वीकृत होने के एक महीने बाद शुरू होने वाली मासिक किस्तों में प्रति वर्ष ब्याज के साथ चुकाने के लिए समझौता हुआ था। लेकिन आरोपी भुगतान करने में विफल रहा। 27 फरवरी 2014 को शिकायतकर्ता को एक बैंक का चेक जारी किया। लेकिन बैंक खाते में पर्याप्त धनराशि न होने के कारण चेक बाउंस हो गया। इसके बाद आरोपी को राशि के भुगतान करने के लिए कानूनी नोटिस भी जारी किया। 26 अप्रैल 2014 को निर्धारित समय में कर्ज न चुकाने पर शिकायतकर्ता ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत न्यायालय के समक्ष केस दायर किया था। न्यायालय में केस के दौरान दोनों पक्षों की ओर दलीलें दी गई और सबूतों के आधार पर न्यायालय ने आरोपी को दोषी करार देते यह फैसला सुनाया है। संवाद
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