हिमाचल: मौसम के साथ बदलती है पहाड़ की थाली, पारंपरिक व्यंजनों में पौष्टिकता का खजाना; अध्ययन में खुलासा
हिमाचल प्रदेश में मौसम के साथ खानपान की परंपराएं भी बदलती हैं। भटूरू, बेदिया, पटांडे और पतरोड़े जैसे पारंपरिक व्यंजन स्वाद के साथ पीढ़ियों से चली आ रही भोजन तैयार करने की विधियों को भी दर्शाते हैं। पपरोला आयुर्वेदिक महाविद्यालय के विशेषज्ञों ने मौसमी खानपान, पाचन और पारंपरिक रसोई के संबंध का अध्ययन किया है।
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पहाड़ों में मौसम के साथ खानपान भी बदल जाता है। मानसून में बारिश के साथ जहां हर तरफ हरियाली छा जाती है। वहीं घरों की रसोई में भटूरू, बेदिया, पटांडे, वार्री और पतरोड़े जैसे पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू भी बढ़ जाती है। इन व्यंजनों की खासियत केवल उनका स्वाद नहीं, बल्कि उनमें छिपा सेहत का खजाना और उन्हें तैयार करने की पीढ़ियों पुरानी विधियां भी हैं। किण्वन (फर्मेंटेशन), अनाज को भिगोने, पीसने, मसालों का संतुलित इस्तेमाल और भाप में पकाने जैसी तकनीकें हिमाचल की पारंपरिक रसोई को विशिष्ट बनाती हैं। राजकीय राजीव गांधी स्नातकोत्तर आयुर्वेदिक महाविद्यालय एवं अस्पताल पपरोला के विशेषज्ञों के अध्ययन में वर्षा ऋतु के आहार-विहार और हिमाचल के पारंपरिक खानपान के संबंध को समझने का प्रयास किया गया है।
बाल रोग विभाग की प्रो. डॉ. मीनाक्षी और कायाचिकित्सा विभाग की व्याख्याता डॉ. प्रियंका भारद्वाज के अध्ययन के अनुसार आयुर्वेद में स्वास्थ्य को शरीर, मन, आहार, जीवनशैली और प्रकृति के बीच संतुलन से जोड़कर देखा गया है। डॉ. प्रियंका ने बताया कि लोगों के घरों में जाकर पारंपरिक खानपान से जुड़ी जानकारी जुटाई। प्रो. मीनाक्षी ने बताया कि वर्षा ऋतु में नमी, तापमान में उतार-चढ़ाव और बदलते मौसम के बीच पाचन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। ऐसे में ताजा, अच्छी तरह पका और अपनी पाचन क्षमता के अनुकूल भोजन करना महत्वपूर्ण है। बदलती जीवनशैली के बीच खानपान से जुड़ी समस्याओं को समझना जरूरी है। ऐसे में मौसमी भोजन की परंपराओं को जानना उपयोगी हो सकता है।
हालांकि, किसी पारंपरिक व्यंजन को हर व्यक्ति के लिए समान रूप से स्वास्थ्यवर्धक नहीं माना जा सकता। उम्र, स्वास्थ्य की स्थिति, पाचन क्षमता और भोजन की मात्रा भी महत्वपूर्ण हैं। हिमाचल के पारंपरिक व्यंजनों में भटूरू का खास स्थान है। गेहूं के आटे से बनने वाली इस खमीरी रोटी को पारंपरिक रूप से मलेरा यानी स्टार्टर की मदद से तैयार किया जाता है। इसके लिए आटे को करीब छह से आठ घंटे तक फर्मेंटेशन होने दिया जाता है। इसके बाद भटूरू पकाए जाते हैं। इन्हें आमतौर पर दाल, सब्जी या करी के साथ खाया जाता है। मलेरा में लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया और यीस्ट जैसे सूक्ष्मजीव फर्मेंटेशन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस प्रक्रिया से भोजन के स्वाद, और पाचन संबंधी गुणों में बदलाव आता है।
कमला नेहरू अस्पताल शिमला की डायटीशियन नेहा शर्मा के अनुसार हिमाचल के पारंपरिक व्यंजनों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री से शरीर को ऊर्जा, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और खनिज मिल सकते हैं। सर्दियों में खाया जाने वाला सिड्डू ऊर्जा देने वाले भोजन का हिस्सा है। इसे घी के साथ खाने से इसकी ऊर्जा मात्रा बढ़ जाती है। वहीं, अरबी के पत्तों से तैयार पतरोड़ों में कैरोटीनॉयड जैसे पोषक तत्व पाए जा सकते हैं। कैरोटीनॉयड मुख्य रूप से हमारी आंखों की रोशनी बढ़ाता है।