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सीएम की ताजपोशी से तय होगा हिमाचल की सियासत का रुख

Sun, 24 Dec 2017 01:13 PM IST
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, शिमला
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, शिमला Updated Sun, 24 Dec 2017 01:13 PM IST
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himachal new CM face will clear the politics in state

हिमाचल में मुख्यमंत्री पद पर किसकी ताजपोशी होगी, उससे प्रदेश की सियासत का रुख तय होना है। पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के मुख्यमंत्री रेस से बाहर होने के बाद यह तय हो गया कि अब प्रदेश में नए युग की शुरूआत होगी।

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भाजपा केंद्रीय नेतृत्व जिस नेता पर भरोसा जताएगा, उसी के इर्द गिर्द भविष्य की सियासत घूमेगी। जेपी नड्डा या जयराम ठाकुर होंगे, इस पर संस्पेंस बरकरार है। नड्डा के करीबी जयराम, विधायकों में पहली पसंद हैं। हालांकि राष्ट्रीय राजनीति में नड्डा का बड़ा कद जयराम पर भारी पड़ सकता है।
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दोनों में से किसी एक के कुर्सी पर बैठने से पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल के बाद अगले नेतृत्व की तलाश पर भी विराम लगेगा। दूसरी तरफ, धूमल की हार के बाद उनका खेमा संजीवनी की तलाश में है।
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धूमल खेमे के लिए नए सीएम के साथ कदमताल की चुनौती भी रहेगी। केंद्र पर इन तमाम समीकरणों का गुणा भाग लोकसभा चुनाव 2019 से जोड़कर कद्दावर चेहरा देने का दबाव है।

असल चुनौती 2019 लोकसभा चुनाव

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मुख्यमंत्री पद पर भाजपा में बना सस्पेंस रविवार को टूट जाएगा। भाजपा के लिए सीएम चेहरा तय करने से अधिक असल चुनौती 2019 लोकसभा चुनाव है। जनता ने जिस तरह से मुख्यमंत्री प्रत्याशी प्रेम कुमार धूमल को नकारा है, वो पार्टी के लिए चिंता का बड़ा विषय है।

धूमल के साथ उनके करीबी हारने से पार्टी को अब नए कद्दावर चेहरे की जरूरत महसूस होती दिख रही है। जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन और आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर फैसला लिया गया है।

नड्डा का राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा नाम है, उनके पक्ष में संघ भी है। नड्डा की केंद्रीय नेतृत्व में मजबूत पकड़ा उनको राज्य सरकार चलाने में भी फायदा देगी। प्रशासनिक अनुभव में भी वे जयराम से आगे हैं। वहीं जयराम के पक्ष में भी कई समीकरण दिख रहे हैं।

उनकी अनदेखी मंडी जिले से भाजपा को मिले बंपर जनादेश की अनदेखी होगी। हालांकि जयराम भी नड्डा के करीबी हैं, जिससे उनको कमान नहीं मिलने पर किसी तरह का विरोध नहीं होगा। उनको डिप्टी सीएम या मंत्रिमंडल में नंबर टू की पोजिशन भी दी जा सकती है।

धूमल की अनदेखी नहीं आसान

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पार्टी के नए चेहरे को प्रदेश की कमान सौंपने के बाद भी धूमल कैंप की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के लिहाज से धूमल कैंप बेहद अहम साबित रहेगा।

ऐसे में उनके साथ जुड़े विधायकों को मंत्रिपद में तरजीह मिलेगी। इतना ही नहीं धूमल को राज्यसभा भेजने की चर्चा भी शुरू हो चुकी है। राज्यपाल बनाने का दांव पार्टी तभी खेलेगी, जब वह  नए सीएम के भरोसे ही पार्टी की आगामी चुनाव में जीत को लेकर आश्वस्त हो।

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