हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा- जनहित याचिका से एकल पीठ के आदेश को नहीं दे सकते हैं चुनौती
प्रदेश हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि एकल पीठ के आदेश को जनहित याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती और न ही उसमें बदलाव कराया जा सकता है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि एकल पीठ के आदेश को जनहित याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती और न ही उसमें बदलाव कराया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की पीठ ने मध्यस्थता फैसलों को लेकर दायर जनहित याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को कानून के तहत उचित कानूनी विकल्प अपनाने की छूट दी है। यह मामला हिमाचल प्रदेश सूक्ष्म एवं लघु उद्योग सुविधा परिषद से संबंधित है।
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 7 जुलाई 2026 को दिए आदेश में कहा था कि परिषद धारा 18(2) के तहत विवादों के निपटारे के लिए किसी व्यक्तिगत मध्यस्थ के पास मामला नहीं भेजेगी। एकल पीठ ने पहले दिए गए एक मध्यस्थता फैसले को भी रद्द कर दिया था। इस आदेश के बाद लघु उद्योग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ने जनहित याचिका दायर कर की थी। एसोसिएशन का कहना था कि मध्यस्थों का चयन सरकार की ओर से निर्धारित पैनल से किया गया था। ऐसे में एकल पीठ के आदेश के आधार पर पहले जारी सभी मध्यस्थता फैसलों को स्वतः रद्द या अमान्य नहीं माना जाना चाहिए।
चुनौती देने के लिए याचिका उचित माध्यम नहीं
खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ के फैसले को चुनौती देने या उसमें बदलाव कराने के लिए जनहित याचिका उचित माध्यम नहीं है। इसके लिए प्रभावित पक्षों को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के तहत नियमित अपील दायर करनी होगी। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि प्रभावित पक्षों ने एकल पीठ के आदेश के खिलाफ नियमित अपील दायर नहीं की है। इस पर खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को नियमानुसार उचित कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।