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Himachal High Court: आयुर्वेदिक फार्मासिस्टों को एलोपैथिक के समान वेतन, सरकार को एरियर देने के आदेश
Sun, 12 Jul 2026 10:26 AM IST
Ankesh Dogra
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Sun, 12 Jul 2026 10:26 AM IST
सार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आयुर्वेद विभाग के फार्मासिस्टों को एलोपैथिक फार्मासिस्टों के समान वेतनमान और ग्रेड पे देने का आदेश दिया है। अदालत ने सरकार को तीन वर्ष पूर्व की अवधि का एरियर देने और तीन माह में भुगतान नहीं होने पर छह प्रतिशत ब्याज देने के भी निर्देश दिए हैं।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए आयुर्वेद विभाग के फार्मासिस्टों को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के एलोपैथिक फार्मासिस्टों के समान वेतनमान और ग्रेड पे का लाभ देने का निर्देश दिया है। इस फैसले से प्रदेश के आयुर्वेदिक फार्मासिस्टों में खुशी की लहर दौड़ गई है, जो लंबे समय से इस समानता की मांग कर रहे थे।
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भेदभावपूर्ण अधिसूचना को अदालत ने किया रद्द
न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की पीठ ने कहा कि दोनों विभागों के फार्मासिस्टों को शुरू से ही समान वेतनमान मिलता रहा है। ऐसे में, 28 सितंबर, 2012 की अधिसूचना के माध्यम से आयुर्वेदिक फार्मासिस्टों को इस लाभ से वंचित करना मनमाना और संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के सिद्धांत के विपरीत है। अदालत ने मनोहर लाल, अमरनाथ राय और अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।
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वित्तीय एरियर के भुगतान का आदेश
हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि याचिकाकर्ताओं को याचिका दायर करने की तिथि से तीन वर्ष पूर्व की अवधि से वित्तीय एरियर का भुगतान किया जाए। यदि सरकार तीन महीने के भीतर यह भुगतान नहीं करती है, तो उसे छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
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न्यायालय का हस्तक्षेप और समानता का सिद्धांत
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वेतनमान से जुड़े मामलों में न्यायालय सामान्यतः कार्यपालिका या वेतन आयोग के निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करता है। हालांकि, यदि राज्य का कोई निर्णय स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण और तर्कहीन हो, तो न्यायालय मूकदर्शक नहीं रह सकता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य सरकार एक आदर्श नियोक्ता के रूप में अपने कर्मचारियों के साथ समानता और न्यायपूर्ण व्यवहार करने के लिए उत्तरदायी है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1978 से जारी थी समानता
जानकारी के अनुसार, आयुर्वेद विभाग के फार्मासिस्टों को एक अप्रैल 1978 से स्वास्थ्य विभाग के फार्मासिस्टों के समान वेतनमान मिलता रहा है। वर्ष 1986, 1996 और 2006 के वेतन संशोधनों में भी यह समानता बरकरार रही। हालांकि, 28 सितंबर, 2012 की एक अधिसूचना ने स्थिति बदल दी। इस अधिसूचना के तहत, सरकार ने केवल स्वास्थ्य विभाग के चीफ फार्मासिस्ट और फार्मासिस्ट को क्रमशः 10,300-34,800 रुपये के वेतनमान के साथ 4,600 और 4,200 रुपये ग्रेड पे का लाभ दिया, जबकि आयुर्वेद विभाग के फार्मासिस्टों को इससे बाहर रखा गया, जो कि इस फैसले का मुख्य कारण बना।
इस फैसले से आयुर्वेदिक फार्मासिस्टों को न केवल आर्थिक राहत मिलेगी, बल्कि उन्हें यह भी अहसास होगा कि उनके योगदान को समान महत्व दिया जा रहा है। यह निर्णय अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल कायम कर सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वेतनमान से जुड़े मामलों में न्यायालय सामान्यतः कार्यपालिका या वेतन आयोग के निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करता है। हालांकि, यदि राज्य का कोई निर्णय स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण और तर्कहीन हो, तो न्यायालय मूकदर्शक नहीं रह सकता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य सरकार एक आदर्श नियोक्ता के रूप में अपने कर्मचारियों के साथ समानता और न्यायपूर्ण व्यवहार करने के लिए उत्तरदायी है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1978 से जारी थी समानता
जानकारी के अनुसार, आयुर्वेद विभाग के फार्मासिस्टों को एक अप्रैल 1978 से स्वास्थ्य विभाग के फार्मासिस्टों के समान वेतनमान मिलता रहा है। वर्ष 1986, 1996 और 2006 के वेतन संशोधनों में भी यह समानता बरकरार रही। हालांकि, 28 सितंबर, 2012 की एक अधिसूचना ने स्थिति बदल दी। इस अधिसूचना के तहत, सरकार ने केवल स्वास्थ्य विभाग के चीफ फार्मासिस्ट और फार्मासिस्ट को क्रमशः 10,300-34,800 रुपये के वेतनमान के साथ 4,600 और 4,200 रुपये ग्रेड पे का लाभ दिया, जबकि आयुर्वेद विभाग के फार्मासिस्टों को इससे बाहर रखा गया, जो कि इस फैसले का मुख्य कारण बना।
इस फैसले से आयुर्वेदिक फार्मासिस्टों को न केवल आर्थिक राहत मिलेगी, बल्कि उन्हें यह भी अहसास होगा कि उनके योगदान को समान महत्व दिया जा रहा है। यह निर्णय अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल कायम कर सकता है।