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हिमाचल प्रदेश: स्कूल में प्रवेश लेने से पहले ही कमजोर हो रही नौनिहालों की नजर, जानें क्या है इसके पीछे की वजह
Fri, 20 Feb 2026 10:35 AM IST
अंकेश डोगरा
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
Published by: अंकेश डोगरा
Updated Fri, 20 Feb 2026 10:35 AM IST
सार
हिमाचल प्रदेश में स्कूल जाने की उम्र शुरू होने से पहले ही बच्चे नजर कमजोर होने की समस्या से जूझ रहे हैं। आंखों की सुरक्षा के लिए बच्चों के स्क्रीन टाइम को कम करवाना अभिभावकों के लिए भी मुश्किल होने लगा है। पढ़ें पूरी खबर...
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
खेलकूद, आउटडोर गतिविधियों की जगह मोबाइल पर गेम्स, रील, एनिमेटिड मूवी देखने के साथ ऑनलाइन पढ़ाई करने की आदत नौनिहालों की नजर को कमजोर कर रही है। अस्पतालों में अब स्कूल जाने की उम्र शुरू होने से पहले ही बच्चे नजर कमजोर होने की समस्या को लेकर उपचार के लिए आने लगे हैं। यह सब मोबाइल, लेपटॉप जैसे गेजेट के अधिक उपयोग का नतीजा है। विशेषज्ञों के अनुसार स्कूल जाने से पहले बच्चों की आंखें चेेक करवाना जरूरी है। इसी से पता लग सकता है कि अधिक मोबाइल उपयोग करने से कहीं आंखें कमजोर तक नहीं हुई हैं।
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टेस्ट में आंखें कमजोर पाए जाने पर समय से नंबर के चश्मे लगाने पर बच्चे की आंखें ठीक होने की संभावना होती है। चश्मा हट भी सकता है, चूंकि बच्चे की गढ़ती उम्र और ग्रोथ के साथ आंखों की क्षमता और नजर भी अच्छी हो सकती है। दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल शिमला की ओपीडी में रोजाना औसतन तीन से चार, आईजीएमसी की ओपीडी में पांच से सात छोटी उम्र के बच्चे आंखें चेक करवाने के लिए आने लगे हैं। यह आंकड़े पहले से अधिक हैं।
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आंखों की सुरक्षा के लिए बच्चों के स्क्रीन टाइम को कम करवाना अभिभावकों के लिए भी मुश्किल होने लगा है। इन गेटेजेट्स पर बढ़ती निर्भरता, ऑनलाइन क्लास, बच्चों का मोबाइल से ही मनोरंजन करना आंखों के लिए बड़ा खतरा बनने लगा है। बच्चों के खान-पान में आया बदलाव, हरी सब्जियों का कम सेवन, जंक फूड का अधिक उपयोग भी आंखों को कमजोर कर रहा है। आउटडोर गतिविधियां न कर मोबाइल, लैपटॉप का स्क्रीन टाइम बढ़ने, खेलकूद में भाग न लेने से बच्चों की आंखों पर सीधा असर पड़ रहा है।
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स्क्रीन टाइम बढ़ाता है आंखों की ड्राइनेस
आईजीएमसी के नेत्र रोग विभाग के डॉ. प्रवीण पंवर का कहना है मोबाइल और लैपटॉप पर लगातार कार्य करने, रील्स देखने और ऑनलाइन पढ़ाई करने का असर बच्चों की आंखों पर पड़ता है। नजदीक होने से गैजेट्स से निकलने वाली रोशनी, गर्मी और देखने में आंखों पर पड़ने वाले स्ट्रेस से ड्राइनेस बढ़ती है, नजर कमजोर होती है। अभिभावक स्कूल जाने वाले बच्चों की आंखों का चेकअप करवाएं। जरूरत हो तो उसके मुताबिक आंखों का उपचार करवाएं। आवश्यक हो तो चश्मा और नजर को बचाने में सहयोगी ब्लू लाइट प्रोटेक्शन चश्मे लगाएं। समय से चश्मा लगाने से बच्चों की आंखें ठीक भी हो सकती हैं।
आईजीएमसी के नेत्र रोग विभाग के डॉ. प्रवीण पंवर का कहना है मोबाइल और लैपटॉप पर लगातार कार्य करने, रील्स देखने और ऑनलाइन पढ़ाई करने का असर बच्चों की आंखों पर पड़ता है। नजदीक होने से गैजेट्स से निकलने वाली रोशनी, गर्मी और देखने में आंखों पर पड़ने वाले स्ट्रेस से ड्राइनेस बढ़ती है, नजर कमजोर होती है। अभिभावक स्कूल जाने वाले बच्चों की आंखों का चेकअप करवाएं। जरूरत हो तो उसके मुताबिक आंखों का उपचार करवाएं। आवश्यक हो तो चश्मा और नजर को बचाने में सहयोगी ब्लू लाइट प्रोटेक्शन चश्मे लगाएं। समय से चश्मा लगाने से बच्चों की आंखें ठीक भी हो सकती हैं।