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हिमाचल : सेब कम, दाम ज्यादा... फिर भी बागवानों को क्यों हो सकता है नुकसान? जानिए पूरा गणित विस्तार से

Sun, 23 Aug 2026 11:48 AM IST
Ankesh Dogra अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Sun, 23 Aug 2026 11:48 AM IST
सार

हिमाचल प्रदेश में इस बार सेब उत्पादन में करीब 43 फीसदी तक गिरावट का अनुमान है। औसत 3.5 करोड़ पेटियों के मुकाबले उत्पादन करीब 2 करोड़ पेटियों तक सिमट सकता है। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों, कम चिलिंग आवर्स, ओलावृष्टि और तेज हवाओं को इसकी वजह बताया गया है। कम उत्पादन का असर बागवानों की आय के साथ आढ़ती, मजदूर, ट्रांसपोर्ट और पैकेजिंग कारोबार पर भी पड़ने की आशंका है।

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himachal apple production may fall 43 percent 2026
सेब तोड़ते बागवान। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ सेब कारोबार पर इस सीजन मौसम की मार पड़ी है। औसत 3.5 करोड़ पेटियों का उत्पादन घटकर करीब दो करोड़ पेटियों तक सिमटने का अनुमान है। इससे लगभग 1.5 करोड़ पेटियों की कमी होगी, जो 43 फीसदी की संभावित गिरावट है। इस कमी से बागवानी आधारित पूरी अर्थव्यवस्था में कारोबार और नकदी के प्रवाह पर गहरा असर पड़ने की आशंका है।

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बागवानी विभाग के निदेशक डॉ. सतीश कुमार शर्मा ने कहा कि फ्रूट सेटिंग के समय प्रतिकूल मौसम, कम चिलिंग आवर्स, ओलावृष्टि और तेज हवाओं के कारण इस बार सेब का उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में कम रहने का अनुमान है। 

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मंडियों में सेब के भाव 130 से 145 रुपये प्रति किलो तक पहुंच रहे हैं। 20 किलो की पेटी के आधार पर यह कीमत 2,600 से 2,900 रुपये प्रति पेटी बैठती है। अच्छे दाम मिलने के बावजूद, उत्पादन में भारी कमी से बागवानों की कुल आय प्रभावित होगी। कम उत्पादन से इस सीजन के बाद बागवानों के हाथ में खर्च करने के लिए कम रकम आएगी।
सेब की पेटी बगीचे से उपभोक्ता तक पहुंचने में कई आर्थिक गतिविधियां जुड़ी होती हैं। इनमें आढ़ती, लोडिंग-अनलोडिंग मजदूर, ट्रांसपोर्टर और अन्य सेवा प्रदाता शामिल हैं। 1.5 करोड़ पेटियों की कमी से इन सभी वर्गों में कारोबार प्रभावित होगा। आढ़ती एसोसिएशन के अध्यक्ष हरीश ठाकुर ने कुल कारोबार और कमीशन के नुकसान की आशंका जताई है। पैकेजिंग सामग्री की मांग भी कम हो गई है, जिससे इस उद्योग को भी चुनौती मिल रही है।

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बागवानों की क्रय शक्ति पर असर
हिमाचल में सेब से होने वाली आय का एक हिस्सा सीजन के बाद प्रदेश और पड़ोसी राज्यों के बाजारों में खर्च होता है। बागवान फ्लैट, प्लॉट, वाहन, सोना-चांदी और इलेक्ट्रॉनिक्स पर बड़ी रकम खर्च करते हैं। बच्चों की उच्च शिक्षा पर भी खर्च होता है। उत्पादन में कमी से बागवानों की क्रय शक्ति घटेगी। इसका असर मैदानी शहरों जैसे चंडीगढ़ और ट्राइसिटी में खरीदारी पर भी पड़ेगा। व्यापार मंडल के अध्यक्ष हरजीत कुमार मंगा का कहना है कि सेब उत्पादन घटने से त्योहारी बिक्री पर असर पड़ने की आशंका है। सेब अर्थव्यवस्था से आने वाली नकदी हिमाचल से बाहर संपत्ति खरीदने में भी लगती है। चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली जैसे शहरों में हिमाचली परिवार संपत्ति खरीदते हैं। इस बार बागवानों की आय में कमी से संपत्ति खरीद के फैसले टल सकते हैं। 

हिमाचल की सेब अर्थव्यवस्था करीब 5,000 करोड़ रुपये की है। उत्पादन घटने से बागवानों की आय और नकदी घटेगी, जिससे क्रय क्षमता पर असर पड़ेगा। सेब की कम फसल का असर एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। बागवान की आय घटने से वह कम खर्च करता है, जिससे दुकानदार की बिक्री घटती है। दुकानदार कम खरीद करता है और परिवहन की मांग भी घटती है। यह क्रम स्थानीय अर्थव्यवस्था में नकदी के प्रवाह को कम करता है। बागवानों की क्रय शक्ति में कमी का मल्टीप्लायर असर होगा। खर्च योग्य आय घटने से पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। जीएसटी संग्रह में कमी से प्रदेश के राजस्व पर भी प्रभाव पड़ेगा। -प्रो. एनके शारदा, अर्थशास्त्री
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