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पीलिया पर हाईकोर्ट के शिकंजे में फंसे बड़े अफसर

Sat, 27 Feb 2016 10:01 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला Updated Sat, 27 Feb 2016 10:01 AM IST
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high court hearing on jaundice issue in shimla city.

पीलिया को लेकर बड़े अफसर अब हाईकोर्ट के शिकंजे में फंस गए हैं। प्रदेश की राजधानी में सरकार के बड़े अफसरों की लापरवाही से पीलिया बेकाबू हुआ। अफसर अपनी ड्यूटी निभाने में तो फेल हुए ही, यही नहीं न्यायालय को भी गुमराह किया। कोर्ट को गुमराह करने वाले अधिकारियों के खिलाफ मामले चलाने के आदेश के बाद अफसरशाही के होश उड़ गए हैं। हालांकि, कोर्ट ने प्रथम दृष्टतया पाए गए साक्ष्यों के आधार पर यह टिप्पणी दी है। जब तक संबंधित अधिकारी अपना पक्ष नहीं रखते, इन्हें दोषी नहीं माना जा सकता है।

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हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर तथा न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ के आदेशों के बाद यह साफ हो गया है कि सरकार में ऊंचे पदों पर बैठे अफसर अगर अपने काम को लेकर थोड़े भी संवेदनशील होते पीलिया से लोगों की जानें न जाती। बड़े अफसरों ने बड़े सुनियोजित तरीके से अपने सहयोगियों और निचले अधिकारियों को बचाने के लिए न्यायालय को गुमराह किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब न्यायालय ने मुख्य सचिव समेत सभी संबंधित विभागों को प्रधान सचिवों को मामले में प्रतिवादी बनाया है। झूठे हल्फनामे दायर करने वालों के खिलाफ न्यायालय कार्रवाई करेगा। अधिकारियों के खिलाफ न्यायालय के आदेशों की अवमानना का भी मामला चलाया जाएगा।

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मुख्य अभियंता से चपरासी तक का मांगा ब्योरा
न्यायालय ने मुख्य सचिव और सचिव सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग से पीलिया को लेकर 2007 से लेकर अब तक की रिपोर्ट तलब की है। न्यायालय ने पूछा है कि कौन से अधिकारी 2007 से सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग में साफ पानी मुहैया करवाने के लिए तैनात किए गए थे। न्यायालय ने संबंधित मुख्य अभियंता से चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक का ब्योरा मांगा है।

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न्यायालय ने आईपीएच, स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम को आदेश दिए थे कि शिमला शहर को पर्याप्त मात्रा में और स्वच्छ पानी उपलब्ध करवाया जाए, लेकिन नहीं कराया। हाईकोर्ट ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव को अश्वनी खड्ड से संबंधित रिपोर्ट हर तीन माह में कोर्ट के समक्ष पेश करने के आदेश दिए थे। ये रिपोर्ट भी संतोषनजक नहीं।

लापरवाह महकमे
न्यायालय ने सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से अश्वनी खड्ड परियोजना और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के संचालन को लेकर रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट दी पर संतोषनजक नहीं। आईपीएच और नगर निगम के अधिकारी शहर को पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध नहीं करवा पाए। जो पानी सप्लाई किया गया वह भी दूषित पाया गया। इसके बारे में इन विभागों ने कोर्ट को गुमराह किया। प्रदूषण बोर्ड के अधिकारियों ने न्यायालय को निर्धारित समय पर अश्वनी खड्ड से संबंधित रिपोर्ट नहीं दी। जो रिपोर्ट दी गई वह भी स्पृष्ट नहीं थी और गुमराह करने वाली थी।

अब अफसरों का ये है कहना

आईपीएच सचिव अनुराधा ठाकुर की ओर से दी गई स्टेटस रिपोर्ट पर कहा है कि यह विरोधाभासी प्रतीत हो रही है। अनुराधा का कहना है कि कोर्ट को भ्रमित करने का सवाल ही नहीं। शपथ पत्र में स्थिति स्पष्ट करेंगी। कोर्ट के आदेशों पर 2014 में इंजीनियर सुरेंद्र जस्टा की ओर से दी गई तीन रिपोर्टों में खामियां पाई गई हैं। इंजीनियर सुरेंद्र जस्टा का कहना है कि ‘मामला विचाराधीन है, अभी कुछ नहीं कहेंगे।

मेंबर सेक्रेटरी पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड विनीत कुमार की ओर से न्यायालय को सौंपी गई मामले की स्टेटस रिपोर्ट ताजा रिपोर्ट के बाद गलत प्रतीत हो रही है। विनीत कुमार का कहना है कि वह अपना पक्ष न्यायालय के समक्ष ही रखेंगे। इंजीनियर सुमन विक्रांत की ओर से भी एक रिपोर्ट न्यायालय में दी गई थी यह रिपोर्ट गुमराह करने वाली बताई जा रही है। सुमन विक्रांत ने कहा कि वो कोई कमेंट नहीं कर पाएंगे।

एसआईटी ने भी बड़े अफसरों को बचाया

पीलिया के मामले को लेकर गठित एसआईटी हर हफ्ते जांच में प्रगति की रिपोर्ट प्रदेश उच्च न्यायालय को सौंपेगी। एसआईटी की अब तक की जांच पर प्रदेश उच्च न्यायालय ने संतोष नहीं जताया। एसआईटी इस मामले में किसी भी बड़े जिम्मेदार अफसर तक नहीं पहुंच पाई। हिरासत में लिए गए आरोपियों में सबसे बड़ा अधिकारी एक्सीयन ही है जबकि इस मामले में इनसे भी बड़े अफसरों की जिम्मेदारी बनती थी इस दिशा में फिलहाल कोई काम नहीं किया गया।

एसआईटी अब दो मार्च को जांच रिपोर्ट प्रदेश उच्च न्यायालय में देगी और वहां से आगामी आदेश मिलने के बाद ही गिरफ्तारियों को लेकर कोई कदम उठाएगी। प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के बाद एसआईटी के मुख्य जांच अफसर एसपी संदीप धवल ने शुक्रवार को जांच का जिम्मा सौंप लिया है। यह एसपी कार्यालय शिमला से मामले की निगरानी करेंगे। प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के बाद एसआईटी हर कदम फूंक फूंक रख रही है। अभी तक ठेकेदार, सुपरवाइजर के अलावा केवल आईपीएच महकमे के निचले स्तर के अधिकारियों को ही गिरफ्तार किया गया है।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों से पूछताछ और पत्राचार ही चल रहा है। इस पूरे मामले की विस्तृत जांच के लिए एसआईटी को टीम में और नए सदस्यों को जोड़ने की जरूरत भी महसूस की जा रही है। एसआईटी तभी किसी को हिरासत में लेने की हिम्मत कर पाऐगी जब संबंधित अधिकारी के खिलाफ पुख्ता सबूत हाथ आऐंगे। दो मार्च के बाद एसआईटी अगले कदम पर काम करेगी फिलहाल जांच का दायरा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और नगर निगम ही है।


6 जनवरी को हुई है एफआईआर
इस मामले में नगर निगम के डिप्टी मेयर की शिकायत के आधार पर छह जनवरी को थाना ढली में मुकदमा दर्ज किया गया। एसपी के निर्देश पर तत्कालीन एएसपी (ग्रामीण) के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया गया। टीम ने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट मल्याणा और ढली का निरीक्षण किया। वहां पर खामियां पाई गई और इस आधार पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के ठेकेदार और सुपरवाइजर को हिरासत में लिया। आईपीएच के एक्सीईएन और जेई समेत कुल सात गिरफ्तारियां की गई। एएसपी संदीप धवल पदोन्नत होकर एसपी साइबर क्राइम नियुक्त हुए। लेकिन प्रदेश उच्च न्यायालय ने इन्हें ही मामले की बागडोर संभालने का फैसला सुनाया एसआईटी अब नए सिरे से रह गई खामियों को दूर करने में जुट गई है।

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