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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Health: Sand flies are spreading disease not only on the banks of the Sutlej River but also in other areas, st

स्वास्थ्य: सतलुज किनारे ही नहीं, अन्य क्षेत्रों में भी बीमारी फैला रही रेत मक्खी, अध्ययन में हुआ खुलासा

Mon, 29 Sep 2025 11:16 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Mon, 29 Sep 2025 11:16 AM IST
सार

विशेषज्ञों के अनुसार यह मक्खी और इससे होने वाली बीमारी राज्य के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में तेजी से फैल रही है, जिसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकीय असंतुलन है। 

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Health: Sand flies are spreading disease not only on the banks of the Sutlej River but also in other areas, st
बीमारी फैला रही रेत मक्खी(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

रेत मक्खी यानी कटैनीय लीशमैनियासिस (सीएल) केवल सतलुज घाटी तक सीमित नहीं है। यह अन्य क्षेत्रों में भी पहुंच चुकी है। इस मक्खी के काटने से त्वचा पर दाग पड़ते हैं, जो जल्दी नहीं भरते। समय पर इलाज नहीं किया गया तो यह बीमारी त्वचा की सूरत बिगाड़ देती है। विशेषज्ञों के अनुसार यह मक्खी और इससे होने वाली बीमारी राज्य के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में तेजी से फैल रही है, जिसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकीय असंतुलन है। हिमाचल प्रदेश के कई जिले अब इस बीमारी के संभावित खतरे की जद में हैं। समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो स्थिति गंभीर हो सकती है।

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संयुक्त अध्ययन में हुआ खुलासा
यह खुलासा आईसीएमआर-राष्ट्रीय मलेरिया अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली और आईजीएमसी शिमला के संयुक्त अध्ययन में हुआ है। हाल ही में विशेषज्ञों की एक टीम ने इस मक्खी की खोज और बीमारी पर हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों में किया अध्ययन किया। इस अध्ययन के अनुसार पिछले वर्षों के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1988 से 2001 तक 38 मामले दर्ज किए गए।   वहीं 2001 से 2003 के बीच यह संख्या बढ़कर 161 तक पहुंच गई। 2016-17 के बीच केवल रामपुर मेडिकल परिसर में ही 337 मरीजों का उपचार किया गया।  आईसीएमआर-राष्ट्रीय मलेरिया अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली के डॉ. गौरव कुमार, डॉ. भारत भाकुनी, डॉ. रमेश सी. धीमान और आईजीएमसी शिमला की डॉ. संध्या कुमारी ने इस पर संयुक्त अध्ययन किया।

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इन परजीवियों से फैलती है  बीमारी
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह बीमारी मुख्यतया लीशमैनिया ट्रोपिका और लोशमैनिया डोनोवानी नामक परजीवियों से फैलती है, जिसे फ्लेबोटोमस लॉन्गिडक्टस नामक रेत मक्खी फैलाती है। जहां-जहां समुद्र तल से ऊंचाई 1000 से 1250 मीटर के बीच थी, वहां सीएल के अधिक मामले सामने आए। उदाहरण के तौर पर, कुल्लू जिले के भुंतर यानी 2050 मीटर में कोई मामला नहीं मिला, जबकि निरमंड मंडल के गांवों (1000-1200 मीटर) में कई मामले दर्ज किए गए। किन्नौर जिले के मुख्यालय कल्पा (3000 मीटर): में भी सीएल और रेत मक्खियों की उपस्थिति नहीं मिली, लेकिन वहां के कुछ गांवों यानी 1600-2200 मीटर तक ऊंचाई वाले इलाकों में बीमारी के मामले सामने आए। डॉ. संध्या कुमारी के अनुसार कटैनीय लीशमैनियासिस त्वचा से संबंधित बीमारी है।
 

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नियंत्रण के लिए सिफारिशें
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि सीएल पर नियंत्रण के लिए जून से सितंबर के बीच विशेष अभियान चलाए जाएं। 1000 से 1250 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई जाए। जिन जिलों में कोई मामला नहीं आया है, लेकिन मौसम-भौगोलिक स्थिति अनुकूल है, वहां सावधानी बरती जाए। अध्ययन से स्पष्ट है कि रेत मक्खियों की उपस्थिति और सीएल के फैलाव में मौसमी कारक जैसे तापमान, नमी और भू-आवरण की अहम भूमिका है। किन्नौर-रामपुर क्षेत्रों में भूमि उपयोग में बदलाव, जंगलों की कटाई और झाड़ीदार भूमि में वृद्धि से रेत मक्खियों को अनुकूल वातावरण मिल रहा है।

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