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Shimla News: चौपाल से मैदानी इलाकों की ओर लौटने लगे गुज्जर परिवार

Fri, 09 Oct 2026 11:43 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Fri, 09 Oct 2026 11:43 PM IST
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Gujjar families began returning from Chaupal to the plains
गर्म इलाकों की तरफ लौटते गुर्जर। संवाद
अश्विन संक्रांति के बाद शुरू हुई उतराई, क्षेत्र में दूध-पनीर की आपूर्ति पर पड़ सकता है असर
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150 से 200 किलोमीटर का पैदल सफर तय कर पहुंचेंगे स्थायी ठिकानों पर
संवाद न्यूज एजेंसी
नेरवा (रोहड़ू)। नेरवा (रोहड़ू)। कठिन और संघर्षपूर्ण जीवन जीने वाला घुमंतू गुज्जर समुदाय अब अपने मवेशियों के काफिले के साथ मैदानी इलाकों में स्थित स्थायी ठिकानों की ओर लौटने लगा है। यह समुदाय करीब छह महीने से उपमंडल चौपाल के हरे-भरे देवदार के जंगलों और ऊंचे चरागाहों में अस्थायी डेरा जमाए हुए थे। अश्विन संक्रांति से इनकी वापसी शुरू हो गई है। गुज्जर परिवारों के लौटने से स्थानीय बाजारों में दूध और पनीर की आपूर्ति प्रभावित होने की संभावना है। गुज्जर समुदाय सदियों से चली आ रही ऋतु प्रवास की परंपरा का निर्वहन कर रहा है। अप्रैल में बैसाख संक्रांति के बाद मैदानी इलाकों में गर्मी बढ़ने और चारे की कमी होने पर ये परिवार अपने मवेशियों के साथ पहाड़ों का रुख करते हैं। मई की शुरुआत में चौपाल क्षेत्र के ऊंचे चरागाहों में पहुंचने के बाद ये परिवार गर्मियों के करीब छह महीने यहीं बिताते हैं। इस दौरान जंगलों और चरागाहों में पशुओं को चराने के साथ-साथ दूध और पनीर तैयार कर स्थानीय स्तर पर उनकी आपूर्ति भी करते हैं। समुदाय के बुजुर्ग जुम्मन के अनुसार गुज्जर परिवारों के स्थायी ठिकाने चौपाल क्षेत्र के अलावा उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के देहरादून, मोहंड, खारा और सहारनपुर के आसपास के जंगलों में हैं। रियासतकाल से ही इन्हें विभिन्न स्थानों पर पट्टे के आधार पर जमीन और चरागाहें उपलब्ध करवाईं जाती रही हैं। चौपाल उपमंडल में चूड़धार, चंबी, खिड़की, छारकी, शिल्ला, बमटा, गुरार, सड़ाच, गात और खांटी समेत कई क्षेत्रों में इनके डेरे हैं। वर्तमान में चौपाल क्षेत्र में वन विभाग की ओर से गुज्जर समुदाय को 58 पट्टे दिए गए हैं। मैदानी इलाकों से पहाड़ों तक पहुंचने और वापस लौटने की यह यात्रा गुज्जर परिवारों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होती। मवेशियों के साथ करीब 150 से 200 किलोमीटर का पैदल सफर तय करने में लगभग एक महीना लग जाता है। लंबे रास्ते, बदलता मौसम और पशुधन की देखभाल इस यात्रा को और कठिन बना देते हैं। काफिले के कुछ सदस्य राशन और तंबुओं के साथ घोड़ों व बैलों पर सामान लादकर आगे निकल जाते हैं। उनका उद्देश्य महिलाओं, बच्चों और मवेशियों के अगले पड़ाव पर पहुंचने से पहले ठहरने और भोजन की व्यवस्था करना होता है। यात्रा के दौरान कई बार प्राकृतिक गुफाओं में या खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़ती है। तमाम कठिनाइयों के बावजूद समुदाय के लोग अपनी पारंपरिक जीवनशैली और पीढ़ियों से चली आ रही प्रवास की परंपरा को बनाए हुए हैं।
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