देवधरा हिमाचल: उन्नति के रास्ते में चुनौतियों का भी पहाड़
देवधरा हिमाचल ने तमाम कठिन परिस्थितियों के बावजूद विकास व उपलब्धियों के कई पड़ाव पार हासिल तो किए लेकिन अभी भी उसके सामने दशकों पुरानी सात बड़ी चुनौतियों का पहाड़ भी खड़ा है।
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विस्तार
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पहाड़ी राज्यों की दुश्वारियां सर्वविदित हैं। देवधरा हिमाचल ने तमाम कठिन परिस्थितियों के बावजूद विकास व उपलब्धियों के कई पड़ाव पार हासिल तो किए लेकिन अभी भी उसके सामने दशकों पुरानी सात बड़ी चुनौतियों का पहाड़ भी खड़ा है। जनता की समस्याओं के रूप में खड़ीं कुछ चुनौतियां ऐसी हैं जो कि हर सरकार व साल दर साल मंथन पर मजबूर करती हैं लेकिन उनका समाधान आज तक नहीं निकल पाया। आमदनी अट्ठन्नी व खर्चा रुपया इस प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या रही और धीरे-धीरे कर्ज के बड़े पहाड़ के बोझ के नीचे सरकार पूरी तरह दब गई है। राज्य में विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंका जाने वाला है और दशकों पुरानी समस्याएं फिर से मुद्दों को रूप लेंगी। कई समस्याएं ऐसी भी हैं जिनसे निपटने के लिए प्रदेश की जनता को भी सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना होगा। पेश है इन समस्याओं को दर्शाती राकेश भट्ट की रिपोर्ट।
हिमाचल में हवा, जमीन व पटरी से परिवहन का संकट
अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की दरकार आजादी के 75 साल बाद भी हिमाचल को है। राजधानी शिमला की ही बात करें तो यहां के हवाई अड्डे से फरवरी 2020 से कोई भी फ्लाइट टेकऑफ या लैंड नहीं हुई है। अब हवाई पट्टी पर काम के बाद सितंबर से दोबारा यहां से एक फ्लाइट शुरू करने का दावा है। हवाई मार्ग से शिमला को ढंग से जोड़ने के कितने प्रयास पिछले 50 सालों में किए गए, यह इससे ही पता चलता है कि डेढ़ साल पहले तक दिल्ली से एक ही जहाज शिमला में लैंड करता था। इसमें भी इसके निरस्त होने के दिनों की संख्या साल में काफी रहती थी। हालांकि, हाल फिलहाल में ही शिमला से कुल्लू व धर्मशाला के लिए भी हवाई जहाज की उड़ानें शुरू करने की योजना बनाई गई है।
यह भी दिलचस्प है कि हवाई पट्टी की हालत के चलते अभी तक 42 सीटर जहाज को वापस जाते समय 10 से 15 सीटें टेकऑफ के संतुलन के लिए खाली रखनी होती थीं। इसमें अब सुधार और एटीआर 47 को शिमला-दिल्ली के बीच चलाने के दावे हैं। इसके अलावा दो हवाई अड्डे कुल्लू जिले में भुंतर व कांगड़ा जिले में गगल में भी हैं। गगल में रोज चार जहाज ही दिल्ली व चंडीगढ़ से आते हैं। इनमें भी कई बार मौसम खराब होने या अन्य कारणों से दो या तीन जहाजों का ही आना-जाना होता है। भुंतर से फिलहाल एक ही जहाज दिल्ली-चंडीगढ़-कुल्लू आता-जाता है। मंडी में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट प्रस्तावित है लेकिन यह योजना कब तक पूरी होगी, इसको लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता। एयर कनेक्टिविटी की कमजोरी के चलते ही यहां पर देश-विदेश के पर्यटकों की उपस्थिति कम रह जाती है।
दशकों से नहीं बढ़ी रेल की गति
टॉय ट्रेन से दो प्रमुख पर्यटन शहर शिमला व धर्मशाला आजादी से पहले जोड़े गए थे। कालका से शिमला व पठानकोट से जोगिंद्रनगर जोड़े तो गए लेकिन आज तक भी इस लाइन को आगे बढ़ाने में कोई काम नहीं हुआ है। अंग्रेजों ने 1903 में कालका-शिमला ट्रैक का निर्माण किया। इसके बाद उन्होंने 1928 में 180 किलोमीटर लंबा पठानकोट-जोगिंद्रनगर ट्रैक शुरू किया। इन दोनों रूटों पर टॉय ट्रेनें चलाई गईं। इनमें कालका-शिमला ट्रैक को 2007 में हेरिटेज ट्रैक का दर्जा मिला, जबकि 2008 में इसे यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा दिया। हालांकि, अंग्रेजों ने किन्नौर जिले के कल्पा तक रेल ट्रैक बिछाने की योजना भी बनाई थी लेकिन यह सिरे नहीं चढ़ सकी। ऊना से निकल रही ब्रॉडगेज लाइन में कुछ नई ट्रेनें जोड़ने का काम भी हुआ है।
पहाड़ जैसा ही कर्ज
बड़े बुजुर्गों की हमेशा से नसीहत रही है कि कर्ज किसी भी तरह का ठीक नहीं होता। प्रदेश में आय के स्रोत कम होने व खर्च ज्यादा होने पर पहाड़ की सरकार पर पहाड़ जैसा ही कर्ज खड़ा हो गया है। हिमाचल बनने के बाद से कुछ सौ करोड़ का कर्ज अब 65,000 करोड़ रुपये पहुंच गया है। साल दर साल तो केंद्र सरकार व अन्य संस्थानों से कर्ज के लिए गुहार लगानी ही होती है लेकिन किसी खास प्रोजेक्ट व बड़े काम पर भी कर्ज लिए बिना कुछ नहीं हो सकता। इसलिए ही इस बार छठे वेतन आयोग का कर्मचारियों को एरियर देने के लिए ज्यादा कर्ज की जरूरत होगी और इस वित्तीय वर्ष के जाते-जाते प्रदेश पर कर्ज की राशि 75 हजार करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। प्रदेश के लिए यह चिंता का विषय तो है ही लेकिन भविष्य में कर्ज की इस खाई को कैसे पाटा जाए इसको लेकर विशेषज्ञ कुछ ठोस नहीं सुझा पा रहे हैं। वर्ष 2007 से 2012 तक भाजपा की धूमल सरकार के कार्यकाल में कर्ज 28,760 करोड़ रुपये रहा।
2012 से 2017 तक कांग्रेस की वीरभद्र सरकार के कार्यकाल में यह कर्ज 47,907 करोड़ रुपये जा पहुंचा। 2017 से अब तक भाजपा की जयराम सरकार के कार्यकाल में यह कर्ज करीब 65,000 करोड़ से अधिक का पहुंच चुका है। हालांकि इस अवधि में दो साल कोविड महामारी के कारण भी सरकार पर बहुत ज्यादा बोझ पड़ा लेकिन इस कर्ज को चुकाने व नए कर्ज की उम्मीद में सरकार व प्रदेशवासियों की चिंता बढ़ी है। जो राजस्व प्राप्ति करीब 36,000 करोड़ प्राप्त होती है, उसमें से करीब 53 फीसदी सेंट्रल टैक्स सहित केंद्र से स्थानांतरित होकर मिलता है। करीब 37 फीसदी आय स्टेट का ही राजस्व प्राप्त होता है। राजस्व के अलावा जो आय राज्य को प्राप्त होती है उसमें से सबसे ज्यादा बिजली सेक्टर से करीब 1,165 करोड़ रुपये है। यह सभी क्षेत्रों से आय का 42 फीसदी है। खर्च का अनुमान अगर 100 रुपये से समझाया जाए तो इसमें से 62 रुपये तो वेतन, पेंशन, ऋण व ब्याज अदायगी पर ही खर्च हो जा रहे हैं। आमदनी खर्च से कम होने पर ही घाटे का बजट पेश करना सरकार की मजबूरी है।
सड़क : सुरक्षा का भी सवाल और हजारों गांव नहीं जुड़ सके
यह देश व प्रदेश की तरक्की के दावों के बीच कहीं न कहीं पिछड़े राज्य का बोध भी कराता है। सड़क सुरक्षा को लेकर भी प्रदेश की स्थिति ठीक नहीं है। प्रदेश में सड़कों की लंबाई करीब 3,805 किलोमीटर है। इसमें 520 किलोमीटर पर क्रैश बैरियर लगे हैं। क्रैश बैरियर की कमी के चलते आए दिन पहाड़ों से गुजर रहीं सड़कों से वाहन खाई में गिरने की खबरें आती रहती हैं। इसके बाद लोगों का आक्रोश व दुर्घटनाएं रोकने को सक्रियता भी दिखती है लेकिन अभी तक भी इस ओर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका। पांच साल के सड़क हादसों के आंकड़े देखे जाएं तो इस अवधि में 2,633 लोगों की जान गई जबकि 6,792 लोग घायल हुए। क्रैश बैरियर अगर अधिकांश सड़कों के किनारे स्थापित किए जाएं तो वाहन खाई में गिरने की दुर्घटनाओं में कमी आएगी। क्रैश बैरियर मजबूत होने पर वाहन इनसे टकराकर रुक जाते हैं।
सड़कों को लेकर दूसरी सबसे बड़ी परेशानी ग्रामीणों को लेकर है। हजारों गांव आज भी सड़क से नहीं जुड़े हैं। सड़क न होने पर हिमाचल के 26 फीसदी यानी 4,714 गांवों में मरीज या बुजुर्ग को पालकी या चारपाई पर कई किलोमीटर दूर सड़क तक पहुंचाया जाता है। कांगड़ा में सर्वाधिक 766 गांव ऐसे हैं, जबकि दूसरे नंबर पर सोलन जिला के 751 गांव सड़क से कनेक्ट होने की बाट जोह रहे हैं। यही नहीं, प्रदेश की राजधानी शिमला के निकटवर्ती 689 गांव सड़क से नहीं जुड़े हैं। गांवों को सड़कों से जोड़ने का लक्ष्य यहां की सरकारों के लिए कठिन कार्य रहा है। इन गांवों के लोगों का दर्द इससे समझा जा सकता है कि शादी-ब्याह हो या बच्चों का स्कूल पहुंचना, यहां से कई किलोमीटर पैदल चलकर ही पहुंचते हैं। यह भी आलम है कि रिश्ते जोड़ने में कई बार गांव की सड़क बाधा बन जाती है।
छलनी होते पहाड़, पीड़ा व्यक्त कर रहे लोग
देव भूमि की पीड़ा यहां के पहाड़ों का लगातार छलनी होना भी है। व्यावसायिक गतिविधियों के चलते ही पहाड़ों को काटने का काम चल रहा है। प्रदेश की आय में सबसे ज्यादा आय के स्रोत बने पावर प्लांट इसका सबसे बड़ा कारण है। प्रदेश में अब इनकी संख्या 168 पहुंच चुकी है जबकि 920 स्थापित किए जाने की योजना है। देश में हाइड्रो पावर क्षमता का 25 फीसदी उत्पादन हिमाचल से ही हो रहा है। विकास को आगे बढ़ाने के लिए पहाड़ काटने का सिलसिला न रुका तो इसके भीषण परिणाम भी देखने को मिल सकते हैं। बिजली उत्पादन के लिए पहाड़ों को काटने अथवा छलनी करने के खिलाफ लोग अब लामबंद होने शुरू हो गए हैं। सरप्लस बिजली उत्पादक राज्य होने के कारण ही हिमाचल प्रदेश दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, राजस्थान को बिजली देता रहा है। प्रदेश की जल विद्युत उत्पादन क्षमता 27,436 मेगावाट हो गई है।
जाहिर है पहाड़ों को छलनी कर ही प्रोजेक्ट का निर्माण होता रहा है और इसके बाद भी पर्यावरण को हो रहे नुकसान से भूस्खलन का खतरा बढ़ता जा रहा है। हिमाचल प्रदेश में वर्तमान में 10848 मेगावाट बिजली उत्पादन प्रतिवर्ष हो रहा है। वर्ष 2030 तक 1088 बिजली परियोजनाओं में उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। इसे लेकर प्रदेशवासियों में डर बना हुआ है। भूस्खलन से लगातार मौतें होने और प्रकृति के दोहन के दुष्परिणाम दिखने से जिला किन्नौर के युवा संगठनों ने ‘नो मीन्स नो’, ‘सेव किन्नौर’ अभियान को छेड़ा था। प्राकृतिक आपदाओं और तबाही से बचाने के लिए युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं ने किन्नौर जिले के गांव-गांव में जाकर इस अभियान में काफी लोगों को जोड़ लिया है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि किन्नौर में आए भूस्खलन से जिले के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। लोगों ने सीधे तौर पर प्रदेश सरकार और बिजली परियोजनाओं के प्रबंधनों को चेतावनी दी है कि आने वाले समय में किन्नौर जिले में बिजली परियोजना को नहीं बनने दिया जाएगा।
पीने के पानी का संकट भारी
प्रदेश में सतलुज, ब्यास, चिनाब, रावी जैसी बड़ी नदियों सहित करीब दर्जन भर छोटी नदियां व सहायक नदियां, सैकड़ों खड्डें होने के बावजूद सिंचाई व पीने के लिए पानी का पर्याप्त इंतजाम अभी तक की सरकारें नहीं कर सकी हैं। शिमला शहर में 2018 में पेयजल संकट का मुद्दा तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी छाया रहा। प्रदेश की कृषि योग्य भूमि में से करीब 18 फीसदी में ही सिंचाई की व्यवस्था है। शिमला शहर में रोज पानी देने के लिए 48 से 50 एमएलडी पानी की जरूरत है। पर्यटन सीजन में दो से चार एमएलडी अतिरिक्त पानी की जरूरत पड़ती है। शहर के लिए कुल छह परियोजनाओं में पेयजल क्षमता करीब 48 एमएलडी है। लेकिन साल के 10 महीने इनसे औसतन 42 से 45 एमएलडी पानी ही आता है। इसमें भी 7-8 एमएलडी लीकेज में बह जाता है।
जनपद सिरमौर में जलशक्ति विभाग की 1,308 पेयजल योजनाएं चल रही हैं। जबकि, 258 सिंचाई योजनाएं हैं। गर्मियों के दिनों में जिले के सराहां, राजगढ़ और पांवटा साहिब के विभिन्न इलाकों में पेयजल योजनाओं पर भारी असर देखने को मिलता है। चंबा जिले में इस गर्मी व बरसात के मौसम में भी 17 पंचायतों में पेयजल के लिए हाहाकार मचा हुआ है। बिलासपुर जिला में 31,813 हेक्टेयर भूमि पर कृषि की जाती है। यहां भी 80 फीसदी किसानों को फसल के लिए बारिश पर निर्भर रहना पड़ता है।
घुमारवीं और झंडूता में 38 पेयजल योजनाएं प्राकृतिक जल स्रोतों पर और 129 पेयजल व सिंचाई योजनाएं खड्डों पर आश्रित हैं। जिला सोलन में 15 बड़ी योजनाएं हैं। इसमें गर्मियों के दौरान 10 योजनाएं हांफ जाती हैं। इनमें 70 फीसदी तक पानी की कमी आ जाती है। जिला मंडी में पीने के पानी की 1,435 पेयजल योजनाएं हैं जबकि 87 योजनाओं का काम चल रहा है। वहीं, सिंचाई योजनाएं 222 हैं। इनमें गर्मी के मौसम में 50 प्रतिशत प्रभावित हुई हैं। ऊना जिला में 43,000 हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य है। 70 फीसदी किसानों को बारिश पर निर्भर रहना पड़ता है।
जिला कांगड़ा में मौजूदा समय में लगभग 550 के करीब महत्वपूर्ण पेयजल परियोजनाएं हैं। इनमें करीब 15 योजनाएं प्रभावित हैं। कुल्लू जिले में 59,478 हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य है। 56,193 हेक्टेयर भूमि पर फसलों के लिए पानी की सुविधा नहीं है। हमीरपुर जिला में 3,500 हेक्टेयर भूमि पर कृषि होती है। इनमें सिंचाई के लिए किसानों को बारिश पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
शहरों में वाहन पार्क करना भी बड़ी चुनौती
हिमाचल के अधिकांश जिलों में पार्किंग एक बड़ी समस्या है। यहां पर अधिकांश वाहन सडकों पर पार्क होते हैं, इससे सड़क तो संकरी हो ही जाती है, वाहनों की सुरक्षा भी भगवान भरोसे ही रहती है। आलम यह है कि कार खरीदने के लिए लोगों को पार्किंग की वजह से हजार बार सोचना पड़ता है। शहरों में वाहन पार्क करना भी एक बड़ी चुनौती की तरह है। कुछ जिलों में तो वाहन रजिस्ट्रेशन के समय पार्किंग होने का शपथ पत्र भी देना पड़ता है। वाहनों के अनुपात में पार्किंग की व्यवस्था तो दूर पर्यटन सीजन में खाली पर्यटकों के ही वाहन पार्क हो सकें इसकी भी व्यवस्था नहीं है। घर में पार्किंग की व्यवस्था न के बराबर है। मल्टीलेवल पार्किंग ही इसका एकमात्र समाधान है लेकिन इस पर दशकों से गति कछुआ चाल जैसी है। शिमला में 40,000 से ज्यादा वाहन पंजीकृत हैं तो पांच मल्टी स्टोरी पार्किंग और अन्य सभी छोटी बड़ी पार्किंग मिलाकर करीब 7,000 वाहनों की पार्किंग की ही व्यवस्था है। यहां पर येलो लाइन के अलावा लोहे के ढांचे में पार्किंग की व्यवस्था वर्षों से फाइलों में ही चल रही है। भविष्य में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत 106 करोड़ से 3,090 गाड़ियों के लिए पार्किंग बन रही है। लेकिन फिर भी हजारों वाहन कहां खड़े होंगे, इसको लेकर कोई योजना नहीं दिखती।
मंडी शहर में 45,000 वाहन हैं और पार्किंग मात्र 1,500 की है। धर्मशाला शहर में कुल 79,000 वाहन हैं। यहां 14 पार्किंग में करीब 2,300 वाहनों को ही पार्क करने की क्षमता है। सोलन शहर में 25,000 वाहन पंजीकृत हैं जबकि वाहन 1,500 ही पार्क हो सकते हैं। बिलासपुर में 5,000 वाहन पंजीकृत हैं। पार्किंग में करीब 600 वाहन ही पार्क हो सकते हैं। हजारों वाहन सड़कों के किनारे पार्क होते हैं। नाहन में करीब 38,000 वाहन हैं। यहां कुल दस पार्किंग हैं, जिनमें करीब 300 वाहन पार्क करने की ही व्यवस्था है। हमीरपुर में 5,000 वाहन हैं जबकि पार्किंग की क्षमता 300 वाहनों की है। कुल्लू में 5,000 वाहन हैं और पार्किंग की व्यवस्था 500 वाहनों की है। चंबा जिले में 56,000 वाहन पंजीकृत हैं। शहर में पांच पार्किंग हैं, जहां 350 वाहन पार्क करने की क्षमता है।
फसलों व खेती को तबाह करते जंगली जानवर
हिमाचल में कृषि के साथ-साथ बागवानी को भी बंदर व अन्य जंगली जानवर चौपट कर रहे हैं। शिमला, सोलन, सिरमौर, कुल्लू और मंडी में बंदरों का आतंक सबसे ज्यादा है। वन विभाग के सर्वे के मुताबिक प्रदेश में इस समय 1.36 लाख बंदर हैं। यह आंकड़ा साल 2020 के सर्वे का है। 2015 में प्रदेश में बंदरों की संख्या 2 लाख से ज्यादा थी। अब तक 1.62 लाख बंदरों की नसबंदी का दावा किया गया है। नसबंदी के चलते 33 फीसदी की गिरावट का दावा है। लेकिन इसके बावजूद खेतीबाड़ी को व्यापक नुकसान पहुंच रहा है। प्रदेश में बंदरों की नसबंदी के लिए 8 सेंटर खोले गए हैं। बीते सालों में बंदरों को मारने के लिए शिमला शहर समेत 91 तहसील और सब तहसील में इन्हें वर्मिन घोषित किया गया था। लेकिन इक्का-दुक्का बंदर ही मारे गए हैं। हालांकि ग्रामीण इलाकों में कई जगह जहर देकर बंदर को मारने की खबरें सामने आती रही हैं। लेकिन वन विभाग के पास इसका पक्का आंकड़ा नहीं है।
सिरमौर जिले के अधिकांश क्षेत्रों में बंदर मक्की की फसल चट कर रहे हैं। काकड़, सूअर, खरगोश के अलावा पांवटा साहिब बेल्ट में हाथी भी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। हर साल 30-35 फीसदी फसल जंगली जानवर बरबाद कर रहे हैं। चंबा जिला में 40 प्रतिशत हिस्से पर किसान खेतीबाड़ी करने से हाथ पीछे खींच चुके हैं। बिलासपुर जिला में करीब 25 से 30 फीसदी नुकसान किसानों की फसलों का होता है। जिला सोलन में 35 फीसदी तक फसलें जंगली जानवर बरबाद कर देते हैं। मंडी जिला में भी जंगली जानवर हर साल जिला की 30 से 35 फीसदी फसल को बरबाद कर देते हैं। ऊना जिला में जंगली जानवरों व खुले में घूम रहे लावारिस पशुओं से करीब 50% नुकसान किसानों की फसलों का होता है। जिला कांगड़ा में जानवर हर वर्ष लगभग पांच से 10% फसल बरबाद कर देते हैं। कुल्लू में 76140 किसान हैं, जो खेतीबाड़ी करते हैं। यहां भी हर साल 10 से 15 फीसदी फसल को जंगली जानवर तबाह कर देते हैं। इसके अलावा सूअर, नील गाय, मोर आदि पशु-पक्षियों ने खेतीबाड़ी को भारी नुकसान पहुंचाया हुआ है। कुछ जिलों में तो 25% से 30% तक खेतों आैर बागों को जंगली जानवर तबाह कर देते हैं।
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