संगमन-20 में जुटे देश भर के 40 साहित्यकार
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साहित्य और समाज की रचनात्मक अवधारणाओं पर चर्चा के साथ प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी मंडी में संगमन-20 का आगाज हुआ। संगमन-20 में देश भर से करीब 40 साहित्यकार शिरकत कर रहे हैं। हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर की अध्यक्षता में शुरू हुए संगमन-20 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आनंद प्रधान ने साहित्य और समाज की रचनात्मक अवधारणाओं विषय का मूल पत्र पढ़ते हुए वर्तमान परिस्थितियों में बहुसंख्यकवाद के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए साहित्य से अल्पसंख्यक समाज और पात्रों के गायब होने पर सवाल खड़ा किया।
उन्होंने कहा कि लेखन का आधार सत्य और न्याय के पक्ष में होना चाहिए। आज के दौर में प्रतिरोध की आवाजों को कुचलने की कोशिश की जा रही है। 1984 के सिख दंगों के प्रभावितों, भोपाल त्रासदी, बाबरी मसजिद और गुजरात दंगों के प्रभावितों को अभी तक न्याय न मिलना हमारी रचनात्मक अवधारणाओं की चिंता में शामिल होना चाहिए। इसके लिए संघर्ष करने वाली आवाजों को हाशिए पर धकेलने की कोशिश की जा रही है।
इतिहास को नए सिरे से लिखने की कोशिश हो रही है। वरिष्ठ पत्रकार आलोक श्रीवास्तव ने कहा कि साम्राज्यवाद मीडिया को उपकरण के रूप में उपयोग कर रहा है। उन्होंने कहा कि 20वीं सदी की जिन अवधारणाओं को लेकर आजादी की जंग लड़ी गई थी, 21वीं सदी में वे अवधारणाएं अब बदल गई हैं। ग्लोबलाइजेशन के चलते स्थानीयता खतरे में है।
चर्चा में भाग लेते हुए क्रांतिकारी इतिहासकार सुधीर विद्यार्थी ने कहा कि शहीदों को जाति और धर्म के नाम पर विभाजित किया जा रहा है। ऐसे में क्रांति और समझौते तथा सत्ता और व्यवस्था से जुड़ने के बजाय जनता के पक्ष में रचनाकार को जुड़ना होगा। वहीं हिमाचल के वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. सुंदर लोहिया ने कहा कि हमें अपनी संस्कृति से प्रगतिशील तत्वों की पहचान करनी होगी।