फर्जी कॉलेज मामला, इंडियन नर्सिंग काउंसिल भी सवालों के घेरे में
नर्सिंग कॉलेज की मान्यता के लिए फर्जी दस्तावेज जमा करवाने के मामले में इंडियन नर्सिंग काउंसिल की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। एचपीयू ने इंडियन नर्सिंग काउंसिल को पत्र लिखकर जवाब मांगा है कि बिना मान्यता कैसे अक्तूबर 2014 तक काउंसिल की वेबसाइट पर इस निजी संस्थान का नाम नजर आता रहा। प्रदेश विवि को भेजे पहले जवाब में काउंसिल ने साफ तौर पर 2014-15 और 2015-16 सत्र के लिए ऊना के इस निजी संस्थान को मान्यता न देने, उसका रिन्यूअल न करने की बात कही है।
वहीं, अक्तूबर 2014 तक साइट पर काउंसिल से मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची में इसका नाम नजर आता रहा। इसी आधार पर मेडिकल एजूकेशन और एचपीयू संस्थान के लिए काउंसलिंग करवाता रहा। विश्वविद्यालय के कुलसचिव ने इंडियन नर्सिंग काउंसिल को पत्र लिखकर इसका जवाब मांगा है। इससे मामले में इंडियन नर्सिंग काउंसिल की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं।
जो सूचना विवि के मांगने पर दी गई, वह काउंसिल अपने स्तर पर भी दे सकती थी। समय रहते साइट पर उपलब्ध मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची से नाम हटा सकती थी। इसी चूक के कारण यह निजी संस्थान फर्जी दस्तावेज को विवि में जमा करवाकर विवि से संबद्धता लेता रहा और बैच बिठाता रहा।
ऐसे उजागर हुआ मामला
इंडियन नर्सिंग काउंसिल की राष्ट्रीय स्तर की वेबसाइट से मान्यता प्राप्त नर्सिंग संस्थानों की सूची से ऊना के इस कॉलेज का नाम हट गया। नर्सिंग कोर्स काउंसलिंग कमेटी की चेयरमैन निदेशक स्वास्थ्य शिक्षा और विवि ने उक्त संस्थान को 2015-16 बैच की चार अगस्त को हुई पहले चरण की काउंसलिंग में सशर्त हिस्सा लेने के लिए शामिल कर दिया।
शर्त यह थी कि दूसरे दौर की काउंसलिंग तक वेबसाइट की मान्यता प्राप्त सूची में संस्थान का नाम शामिल हो जाए। विवि ने नर्सिंग काउंसिल से उक्त संस्थान की मान्यता के स्टेटस का ब्योरा मांगा। इसके जवाब में संस्थान को कोई मान्यता पत्र न जारी करने की पुष्टि हुई।
संस्थान के कोर्ट में याचिका दायर करने पर कोर्ट के काउंसलिंग करने के अंतरिम आदेशों पर 17 अगस्त की काउंसलिंग में कमेटी ने संस्थान को शामिल किया। इसमें पहले राउंड में 12 और दूसरे में 2 उम्मीदवारों को सीटें आवंटित की गईं। उच्च न्यायालय से 26 अक्तूबर मामले की सुनवाई होनी है।
कब क्या हुआ, ये रही पूरी टाइमलाइन
चार सितंबर को एचपीयू ने सचिव इंडियन नर्सिंग काउंसिल को पत्र लिखा कि संस्थान को 2014-15, 2015-16 के लिए मान्यता दी गई है या नहीं। 28 सितंबर को विवि को जवाब मिला। इसमें काउंसिल ने कहा कि संस्थान को ऐसा कोई लेटर जारी नहीं किया गया।
संस्थान को सिर्फ 30 अक्तूबर, 2012 में अनुमति दी गई। उसके बाद 2013-14, 2014-15 में कोई रिन्यूअल अनुमति नहीं दी गई है। 9 अक्तूबर को संस्थान को विवि ने कारण बताओ नोटिस देकर दस दिन में जवाब मांगा। जवाब न मिलने पर 19 अक्तूबर को मामले शिकायत पुलिस में की गई।
एचपीयू के कुलसचिव डॉ. पंकज ललित ने कहा कि इंडियन नर्सिंग काउंसिल से जवाब मांगा है कि जब 2014-15 और 2015-16 के लिए संस्थान की मान्यता रिन्यूअल ही नहीं हुई तो साइट पर संस्थान का नाम कैसे आता रहा। विवि को जवाब का इंतजार है।
सवाल यह है कि जब इंडियन नर्सिंग काउंसिल ने संस्थान को 30 अक्तूबर 2012 के बाद मान्यता नहीं दी, तो कैसे अक्तूबर 2014 तक साइट पर मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची में नजर आता रहा, फिर वो गायब कैसे हो गया। कौन साइट को अपडेट करता रहा।
पुलिस ने कब्जे में लिए दस्तावेज और डीवीडी
ऊना के लोअर बसाल नर्सिंग कॉलेज में तलाशी के दौरान दस्तावेजों के साथ कुछ डीवीडी और दो हार्ड डिस्क पुलिस के हाथ लगी हैं। इन्हें कब्जे में लेकर टीम शिमला लौट आई है। इंडियन नर्सिंग काउंसिल दिल्ली भेजी गई टीम अभी वहीं डटी है। शुक्रवार को उन्हें दस्तावेज नहीं मिले थे। जब तक दिल्ली से टीम नहीं लौटेगी, तब तक ऊना से बरामद हुए दस्तावेजों, डीवीडी और हार्ड डिस्क को खंगाला जाएगा। एसपी शिमला डी डब्ल्यू नेगी ने कहा कि सारे दस्तावेज जांचने के बाद ही आगामी कार्रवाई की जाएगी।
बीते सोमवार को विश्वविद्यालय के कुलसचिव ने एसपी शिमला को लिखित शिकायत सौंपी थी। इसमें नर्सिंग कॉलेज में फर्जी दस्तावेज तैयार कर बीएससी नर्सिंग के बैच बैठाने की जानकारी दी गई थी। शिकायत में कहा गया कि संस्थान को अक्तूबर 2012 में शुरू होने वाले सत्र के लिए इंडियन नर्सिंग काउंसिल ने मान्यता दी। इसके बाद 2013-14 और 2014-15 के लिए अनुमति नहीं दी गई।
विश्वविद्यालय ने ट्रस्ट के चेयरमैन और कॉलेज प्रिंसिपल को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा, लेकिन संस्थान से निर्धारित समय में जवाब न मिलने पर फर्जीवाड़े की लिखित शिकायत पुलिस में की गई। इसके आधार पर थाना बालूगंज में मुकदमा दर्ज किया गया।
इसके बाद डीएसपी के नेतृत्व में एक टीम ऊना भेजी गई थी। सर्च वारंट लेने के बाद पुलिस ने दस्तावेजों को कब्जे में लिया। मामले में पुलिस ने संस्थान के कई कर्मचारियों के बयान दर्ज किए हैं। अभी पुलिस संस्थान के चेयरमैन पूर्व डीजीपी मिन्हास के पुत्र अमिल मिन्हास से संपर्क साधने में नाकाम रही है।