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आईआईटी मंडी में कार्यशाला: भारतीय विज्ञान पद्धति से दूर होगा कोरोना और रोजमर्रा की जिंदगी का अवसाद
Tue, 29 Mar 2022 12:00 AM IST
Krishan Singh
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
Published by: Krishan Singh
Updated Tue, 29 Mar 2022 12:00 AM IST
सार
आईआईटी मंडी में तीन दिवसीय राष्ट्रीय भारतीय ज्ञान पद्धति और मानसिक स्वास्थ्य (आईकेएसएमएच) कार्यशाला में हुआ। वर्चुअली संबोधन करते हुए पद्मश्री आचार्य नागेंद्र (कुलपति सी व्यासा इंडिया) ने कहा कि शिक्षाविद भारतीय ज्ञान पद्धति के बारे में अपना ज्ञान साझा करने के लिए एकजुट हुए हैं।
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आईआईटी मंडी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की भागमभाग भरी जिंदगी और कोरोना वायरस की वजह से आम लोगों की जीवनशैली में आए बदलाव को भारतीय ज्ञान पद्धति (आईकेएस) से दूर किया जा सकेगा। मनुष्य-कंप्यूटर संबंध से संचालित इस दुनिया में योग, ध्यान और आयुर्वेद और आपसी सौहार्द से मानसिक विकारों को दूर करने के मकसद से देश में विशेष कार्यक्रम जल्द तैयार होगा। जिसकी रूपरेखा पर मंथन आईआईटी मंडी में तीन दिवसीय राष्ट्रीय भारतीय ज्ञान पद्धति और मानसिक स्वास्थ्य (आईकेएसएमएच) कार्यशाला में हुआ। वर्चुअली संबोधन करते हुए पद्मश्री आचार्य नागेंद्र (कुलपति सी व्यासा इंडिया) ने कहा कि शिक्षाविद भारतीय ज्ञान पद्धति के बारे में अपना ज्ञान साझा करने के लिए एकजुट हुए हैं।
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मानसिक स्वास्थ्य पूरी दुनिया में बड़ी चिंता का विषय बन गया है, इसलिए यह जरूरी है कि हम फिर से भारतीय ज्ञान पद्धति में वापस जाएं और बेहतर जीवन जीने में सहायक समाधान ढूंढ निकालें। हाल के शोध से यह स्पष्ट भी हुआ है कि इस दौर में आईकेएस का मानव शरीर, मानसिक स्वास्थ्य और सुखी रहने में बड़ा महत्व है और यह बहुत लाभदायक है। कार्यशाला का शुभारंभ भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय में सचिव के संजय मूर्त ने शनिवार को किया।
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कोरोनकाल में 25 फीसदी बढ़े चिंता और अवसाद के मामले
कोरोना काल के बीते दो वर्षों के अंदर मानसिक परेशानियों के मरीजों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। एंग्जायटी और डिप्रेशन के 25 फीसदी मामले बढ़े हैं। कोरोना वायरस का असर लोगों की शारीरिक और मेंटल हेल्थ दोनों पर पड़ा है।
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आईआईटी मंडी में इस पर हो रहा काम
कार्यशाला का महत्व बताते हुए आईआईटी मंडी के निदेशक प्रो. लक्ष्मीधर बेहरा ने बताया कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। बायो-सिग्नल जैसे कि इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राम (ईईजी), मस्तिष्क इमेजिंग, के साथ-साथ वर्चुअल वास्तविकता-आधारित इमर्सिव न्यूरॉन-फीडबैक का उपयोग मानसिक विकार रोगियों के लिए किया जा रहा है।