हर हिमाचली पर है इतना कर्ज, कैग की रिपोर्ट में हुआ खुलासा
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साल 2016-17 की भारत के वित्त नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। प्रदेश के हर हिमाचली पर 65 हजार 444 रुपये का कर्ज है।
रिपोर्ट के अनुसार पांच साल के दौरान यह प्रति व्यक्ति 21,728 रुपये बढ़ गया है। इसी तरह प्रदेश पर साल 2016-17 के दौरान 47 हजार 244 करोड़ का कर्ज है। इस कर्ज में पिछले साल की तुलना में पंद्रह प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो गई है।
वीरवार को प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा में पेश कैग की रिपोर्ट के अनुसार पांच साल के दौरान प्रति व्यक्ति ऋण में पचास फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। साल 2012-13 में हर हिमाचली पर जहां 43,726 रुपये का उधार था, वहीं, साल 2015-16 में यह 57 हजार 642 रुपये था।
सरकार को 55 प्रतिशत लोन का भुगतान करना है
वहीं, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पब्लिक लोन का नौ प्रतिशत यानी करीब 3 हजार करोड़ का भुगतान एक साल में होना था, जबकि 31 प्रतिशत का भुगतान एक से पांच साल में होना था, लेकिन शेष साठ फीसदी यानी 19 हजार 466 करोड़ के लोन को पांच साल से ज्यादा अवधि में चुकाना है।
इन आंकड़ों से साफ है कि सात साल के अंदर सरकार को 55 प्रतिशत लोन का भुगतान करना है। ऐसे में प्रदेश सरकार के वर्तमान और अगले बजट पर भी इन लोन का असर रहेगा।
नए उद्योगों को परखे बगैर ही दे दी स्टांप ड्यूटी में छूट
नए उद्योगों को परखे बिना ही उन्हें स्टांप ड्यूटी में लाखों रुपये की कर छूट दी गई। इससे हिमाचल सरकार को लाखों रुपये का नुकसान हुआ। कैग रिपोर्ट के मुताबिक हिमाचल सरकार की ओर से 13 अगस्त 2014 को जारी की गई अधिसूचना के मुताबिक नई औद्योगिक इकाइयों के लिए 50 फीसदी कर की छूट का
प्रावधान किया गया है। ऐसे उद्योग हिमाचल में ही होने चाहिए। उप पंजीयक नाहन के वर्ष 2014 और 2015 के अभिलेखों की लेखा परीक्षा से उद्घाटित हुआ कि अप्रैल 2015 और जुलाई 2015 के बीच 4.85 करोड़ रुपये की राशि के प्रतिफल के लिए पंजीकरण किया गया था।
ये इकाइयां 50 फीसदी स्टांप शुल्क के लिए पात्र नहीं थीं। इसके परिणामस्वरूप 48.48 लाख रुपये के स्टांप शुल्क की वसूली भी की गई। भूमि क्षेत्र की लागू दरों के आधार पर संपत्ति के वास्तविक मूल्योें की गलत दरों के अनुसार 4.85 करोड़ रुपये की प्रतिफल राशि के लिए पंजीकृत किया गया।
सड़कों पर भी कम स्टांप ड्यूटी की वसूली
परिणाम 12.20 रुपये लाख रुपये की पंजीकरण फीस की कम वसूली की। इस तरह से औद्योगिक इकाइयों के तीन बिक्री विलेखों पर 60.68 लाख रुपये के स्टांप शुल्क और पंजीकरण फीस की कम वसूली की गई।
सात उप पंजीयकों ने बिक्री विलेखों के 30 दस्तावेजों का पंजीकरण करते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग और अन्य सड़क से भूमि या संपत्ति की वास्तविक दूरी का सत्यापन नहीं किया गया जो वास्तव में खरीददार की ओर से दायर हलफनामों में था।
इसके परिणाम में 16.90 करोड़ के मूल्यांकन के प्रति 11.46 करोड़ रुपये का मूल्यांकन हुआ। इससे 37.76 करोड़ रुपये की कम वसूली हुई।
कर वसूली में ये विभाग रहा नाकाम, 58 करोड़ की चपत
विधानसभा में वीरवार को पेश वर्ष 2016-17 की लेखा परीक्षा रिपोर्ट में आबकारी एवं कराधान विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट की मानें तो विभाग की लापरवाही से सरकार को करीब 58.66 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
सोलन और सिरमौर सहायक आबकारी एवं कराधान आयुक्त ने नियमों में किसी प्रावधान के बिना बियर उत्पादन में 14.8 लाख बल्क लीटर क्षति की स्वीकृति की। इससे सरकार को 2.44 करोड़ के आबकारी शुल्क की हानि हुई।
न्यूनतम गारंटिड कोटा कम उठाने पर 4.94 करोड़ अतिरिक्त फीस नहीं वसूली गई। इसी तरह संविदाकारों को किए गए कार्य अनुबंध कर की कम कटौती करने से 3.7 करोड़ का नुकसान हुआ।
अतिरिक्त माल का आडिट न होने से इतना नुकसान हुआ
श्रम प्रभारों की अधिक स्वीकृति और संविदाकारों के छोटे भुगतान के लिए कटौती के कारण 3.46 करोड़ की कम वसूली, डीलरों के निर्धारण के दौरान 2010-11 से 2013-14 की कर अवधि के लिए 2.37 करोड़ के बजाय 1.30 करोड़ की आउटपुट गणना की।
इसके चलते सरकार को 1.07 करोड़ का राजस्व नुकसान हुआ। अपेक्षित नवीनीकरण फीस के भुगतान के बिना लाइसेंस नवीकृत करने के चलते 1.45 करोड़ की कम वसूली हुई।
इसी तरह 1.10 करोड़ के यात्री एवं माल कर, वाणिज्यिक वाहनों का पंजीकरण न होने सेे 1.13 करोड़, अतिरिक्त माल का आडिट न होने से 39.37 करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ।
रॉयल्टी रुकी, पर नहीं उठाई मांग
वन विभाग ने प्रदेश वन निगम से ईंधन लकड़ी की लागत परिवहन प्रभारों के प्रति अधिकतम भुगतान सहित 31.12 करोड़ की रॉयल्टी भुगतान के लिए मांग नहीं उठाई। इस वजह से उस सीमा तक राजस्व की वसूली नहीं हो सकी।
रेजिन सत्र के रॉयल्टी दरों को अंतिम रूप न देने से रेजिन रॉयल्टी की मांग नहीं की। वहीं, निगम द्वारा इसका भुगतान भी नहीं किया। इससे विभाग को 2.48 करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ।
उद्योग विभाग ने सिर्फ लाइम स्टोन रिजर्वों की खोज को ही 1.88 करोड़ खर्च कर दिए। वहीं, बिना किसी कार्य के स्टाफ की नियुक्ति कर 1.79 करोड़ बर्बाद कर दिए।
सीएजी रिपोर्ट के अनुसार वन थानों की स्थापना के लिए वन विभाग ने नीति तो बनाई पर योजना की कमी के चलते 4.04 करोड़ की अवसंरचना अनुपयोगी रही। उच्चतम न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन कर वन विभाग ने कोलडैम जल विद्युत परियोजना
प्राधिकरण से प्राप्त 59.31 करोड़ का शुद्ध मूल्य वनीकरण निधि प्रबंधन तथा योजना प्राधिकरण के बजाय सरकारी खाते में जमा कराया। इससे पर्यावरणीय क्षति कम करने के लिए वन संरक्षण गतिविधियां उस राशि में से नहीं की जा सकी।