अंग्रेजों ने शिमला को दिया अमृत, अब अपनी सरकार पिला रही टॉयलेट का पानी
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पिछले दिनों शिमला की वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की तरफ जाना हुआ। करीब एक हजार हेक्टेयर में फैला शिमला का ये वाटर कैचमेंट एरिया अपने आप में प्राकृतिक सौदर्य की एक मिसाल है। यहां सियोग में अंग्रेजों ने 1901 में एक विशालकाय जलाशय बनाया था।
ताकि, पहाड़ों और झरनों से रिस कर एकत्र हुआ पानी यहां आकर जमा हो सके। फिर इस पानी को मोटी पाइपलाइन के जरिये सीधे वायसराय के आशियाने से जोड़ा गया, जहां आजकल एडवांस्ड स्टडी है।
गुरुत्वाकर्षण यानी ग्रेवटी के जरिये ये पानी खुद व खुद अपने गंतव्य स्थल तक पहुंच जाता है। तब शिमला शहर की आबादी कोई 16,000 थी। ये पानी सबकी प्यास बुझाने के लिए काफी था। आज भी ये पानी शहरियों की प्यास बुझा रहा है। जलाशय के केयरटेकर एवं रिटायर फौजी दौलतराम ने बड़े आग्रह के साथ ये पानी मुझे पीने के लिए दिया। डरते हुए मैंने ये जल ग्रहण किया और यकीन जानिए ये पानी नहीं अमृत था।
स्वच्छ, शुद्ध और खनिजों से लबरेज। 115 साल बीत गए। ये प्रोजेक्ट आज भी बखूबी काम कर रहा है। वही 115 साल पुराना जलाशय, इतनी ही पुरानी पाइप लाइन, इतने ही पुराने वाल्व। दौलतराम ने हंसते हुए बताया कि इस जलाशय के गेट पर लगा ताला और उसकी चाबी भी 115 साल पुरानी है।
तो ये तो सब अंग्रेजों का दिया था जिन्हें हमने मार के यहां से भगा दिया और हुकूमत की चाबी अपने हाथ में ले ली। हमने कहा हम योग्य हैं, सब संभाल लेंगे। शिमला की आबादी बढ़ी। अंग्रेजों ने शिमला शहर में 35 हजार की आबादी के लिहाज से 5 पेयजल योजनाएं तैयार की थीं।
आजादी के बाद सिर्फ दो पेयजल योजना जोड़ पाए
आजादी के बाद से इसमें हम सिर्फ दो अश्वनी खड्ड एवं गिरि नदी पेयजल योजना जोड़ पाए। इस समय शिमला और आसपास के उपनगरों की आबादी ढाई लाख के करीब है। पेयजल के लिए अफसरों को जो सबसे आसान, सस्ता और टिकाऊ उपाय लगा, वह था सीवरेज का पानी। शिमला के एक कोने पर सीवरेज प्लांट लगा दिया गया। आसान शब्दों में इसे समझें तो शहर का सारा मल मूत्र और गंदा पानी सीवरेज लाइनों से इस सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुंचता है। यहां कथित तौर पर इसे शोधित किया जाता है।
ठोस मैला अलग कर दिया जाता है और तरल पदार्थ आगे नाले में बहा दिया जाता है। यही नाला आगे जाकर अश्वनी खड्ड में मिल जाता है और अश्वनी खड्ड में लगी मोटी पाइपें इस पानी को आपके घर के नलों तक पानी पहुंचा देती हैं। आप विडंबना देखिए। जिस राज्य के पास अपनी सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब जैसी बड़ी नदिया हों। जिस राज्य के पास चंद्रताल, कराली, मणिमहेश, महाकाली, रेणुका, नाको, डल, कावेरी, पराशर, मंतालर जैसी एक दर्जन से ज्यादा झीलें हों, मणिकर्ण और तत्तापानी से गर्म पानी के झरने एवं कुंड हों, दर्जनों ग्लेशियर हों।
जिस राज्य के पानी ने पंजाब में हरित क्रांति ला दी हो, जिस राज्य की नदियों का पानी पड़ोसी देश पाकिस्तान की प्यास बुझाता हो, उस राज्य की जनता सीवरेज का पानी पीने के लिए मजबूर हों और एक हजार से ज्यादा लोग पीलिया जैसी खतरनाक बीमारी से जूझ रहे हों। ये तथ्य बेहद शर्मनाक है। आप कह सकते हैं वैज्ञानिक तौर पर सोचा जाए तो सीवरेज ट्रीटमेंट के बाद पानी पीने योग्य माना जा सकता है।
मल्याणा सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का बहुत बुरा हाल
लेकिन ये जोखिम भरा खेल है। पिछले साल हम शिमला के मल्याणा स्थित सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट गए थे। सड़क पर गाड़ी खड़ी करके हमें करीब डेढ़ किलोमीटर नीचे उतरना पड़ा। ये डेढ़ किलोमीटर का सफर नारकीय था। चारों तरफ इतनी बदबू कि मुंह पर कपड़ा बांधना पड़ा। पूरे प्लांट में सिर्फ एक कर्मचारी था। प्लांट चालू था। एक बड़ी हौज में ठोस मैले से तरल पदार्थ अलग किया जा रहा था। बाद में स्लज यानी ठोस मैला परत दर परत सीढ़ीदार खेतों में खुले में जमा किया जा रहा था।
हमने पूछा- इस स्लज का आप क्या करते हैं? बताया गया कि ये खाद बन जाती है और इसे बेच दिया जाता है। हमने पूछा अब तक कितनी खाद बेची जा चुकी है। प्लांट के पास इसका रिकॉर्ड नहीं था। यानी ये ठोस मैला वहीं खुले में पड़ा रहता है। और बारिश के पानी के साथ बह कर फिर उसी अश्वनी खड्ड के पानी में मिल जाता है। यही वजह है कि हर साल बारिश में शहर पीलिया की चपेट में आ जाता है। वहां बिजली की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं थी।
यानी बिजली न होने पर प्लांट ठप और सारा मैला बिना ट्रीट हुए सीधे खड्ड में। ‘अमर उजाला’ ने इस पर खबरों की शृंखला शुरू की लेकिन सरकार और अफसरशाही के कानों पर जूं तक न रेंगी। और आप ये कतई न समझें कि आपको पीलिया नहीं हुआ, आप पूरी तरह सुरक्षित हैं और आपके घर का पानी शुद्ध है।
यूरोपीय देशों की व्यवस्था जानकर दंग रह जाएंगे
चिकित्सक कहते हैं इस तरह का रोगाणुओं या विषैले तत्वों, ठोस पदार्थों से संदूषित स्रोतों का पानी कई दीर्घकालिक बीमारियों की वजह बन रहा है जिसकी खबर बहुत बाद में लगती है। ट्रीटमेंट प्लांट लगाते वक्त हिमाचल हाईकोर्ट ने साफ आदेश दिए थे कि इन शर्तों के पूरी होने के बाद ही इसे चलाया जाए। लेकिन न आईपीएच और न ही नगर निगम के अफसरों ने इसे गंभीरता से लिया। नतीजा आप सबके सामने है।
और इन अफसरों की संवेदनहीनता देखिए। पीलिया फैलने के बाद नगर निगम ने हल्ला मचाया और शिमला में अश्वनी खड्ड से जलापूर्ति पर रोक लगा दी। लेकिन अश्वनी खड्ड का सीवरेज युक्त पानी सोलन के लिए जारी रखा गया। अब सोलन में भी लोग पीलिया का शिकार हो रहे हैं। जो पानी शिमला के लिए पीने योग्य नहीं वह सोलन के लोगों के लिए पीने योग्य कैसे हो सकता है? अफसरों का तर्क है कि इतनी दूर यात्रा करने के बाद पानी खुद ब खुद पीने योग्य हो जाएगा।
तो अब आप समझ सकते हैं कि अंग्रेजों और हमारे अफसरशाहों की सोच में कैसा फर्क है। अगर आप यूरोपीय देशों में जाएं तो वहां बाथरूम का पानी भी पीने के योग्य होता है। उनका बहुत सीधा-सा तर्क है। वे घरों, व्यवसायों और उद्योगों में हर जगह जरूरत से कहीं ज्यादा उच्च गुणवत्ता वाला पानी देकर जलजनित रोगों पर होने वाले खर्च को बचा लेते हैं। इसलिए वे स्वास्थ्य से तिगुना बजट शुद्ध जलापूर्ति पर खर्च करते हैं।
कोल डैम परियोजना को शुरू कराएं अफसर तभी बच पाएंगे शिमला के लोग
अब भी देर नहीं हुई है। शिमला से सतलुज दूर नहीं। केंद्र सरकार ने शिमला शहर के लिए कोल डैम पेयजल आपूर्ति परियोजना को मंजूरी दे दी है। करीब 643 करोड़ रुपये की इस परियोजना के लिए विश्व बैंक मदद देने को भी तैयार है। शिमला को पीलिया का तोहफा देने की शर्मिंदगी झेल रहे सूबे के अफसरों को चाहिए कि अब वे रात-दिन एक करके इस परियोजना को जल्द से जल्द शुरू कराएं। शिमला से सबक लेकर वे मंडी, सोलन, धर्मशाला, नाहन और दूसरे शहरों की पेयजल योजना की समीक्षा करें।
क्योंकि पीलिया, डायरिया जैसे जलजनित रोग किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक हैं। अगर आप अपने नागरिकों को पीने का एक गिलास साफ पानी नहीं दे सकते तो डूब मरने के लिए चुल्लू भर पानी भी ज्यादा है। अपने सुझाव और प्रतिक्रिया के लिए 9736023310 व्हाट्स एप पर संदेश भेजें।