हिमाचल के 2000 स्कूलों में लटकेंगे ताले, वजह हैरान करने वाली
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शिक्षा के क्षेत्र में कई अवार्ड पाने वाले हिमाचल के प्राइमरी और मिडल सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या लगातार कम हो रही है। छात्र न होने के कारण प्रदेश के 2050 सरकारी स्कूलों में कभी भी ताले लटक सकते हैं। प्राइमरी और मिडल स्तर के इन स्कूलों में छात्र संख्या 15 से कम है।
तीन सौ से ज्यादा ऐसे स्कूल हैं, जिनमें मात्र पांच से दस बच्चे ही पढ़ रहे हैं। मंडी जिला में एक भी दाखिला नहीं होने पर सरकार को 12 स्कूल बंद करने पड़े हैं। सरकारी स्कूलों में कम हो रही शिक्षा की गुणवत्ता, खराब रिजल्ट एवं अव्यवस्था के चलते अभिभावक सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ाने को तैयार नहीं है।
मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह सार्वजनिक तौर पर एलान कर चुके हैं कि 15 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को बंद कर बच्चों को नजदीकी स्कूलों में शिफ्ट किया जा सकता है। ऐसे में दो हजार से अधिक स्कूलों पर ताले लगने की नौबत आ गई है।
ये भी एक बड़ी वजह
तमाम प्रयासों के बावजूद अभिभावक निजी स्कूलों में अपने बच्चे पढ़ाने को तवज्जो दे रहे हैं। सरकारी स्कूलों में मुफ्त वर्दी, भोजन, किताबें और फीस न होने के बावजूद अभिभावक सरकारी स्कूलों में बच्चों को नहीं पढ़ा रहे हैं। नेताओं, अफसरों, सरकारी कर्मचारियों
और अध्यापकों के बच्चे भी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं। प्रारंभिक शिक्षा निदेशक मनमोहन शर्मा ने कहा कि केंद्र के निर्देश पर छात्र संख्या का डाटा एकत्रित किया जा रहा है। सरकार के निर्देशों के अनुरूप ही कम छात्र संख्या वाले स्कूलों पर फैसला लिया जाएगा।
जिला 15 से कम संख्या वाले स्कूलों की संख्या
शिमला 530
मंडी 330
कांगड़ा 256
चंबा 245
कुल्लू 180
हमीरपुर 173
सोलन 167
ऊना 72
बिलासपुर 58
सिरमौर 39
इस जिले के 149 में से 112 स्कूलों में 15 से कम विद्यार्थी
जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति में 130 प्राइमरी स्कूल हैं। यहां 100 स्कूलों में 15 से कम छात्र संख्या है। कुल 19 मिडल स्कूलों में से 12 स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या 15 से कम है। किन्नौर के स्कूलों का भी यही हाल है। हालांकि, भौगोलिक परिस्थितियों के चलते यहां छात्र संख्या में छूट दे रखी है।
नए स्कूल खोलने, अपग्रेडेशन का सिलसिला जारी
प्रदेश में जहां सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या निरंतर कम हो रही है, वहीं राज्य सरकार नए स्कूल खोलने और पुराने स्कूलों को अपग्रेड करने में जुटी हुई है। मुख्यमंत्री बीते कुछ समय में ऐसे कई स्कूलों को अपग्रेड करने की घोषणा कर चुके हैं जो अपग्रेडेशन के नियमों को पूरा नहीं करते हैं। ऐसे में सचिवालय पहुंचकर कई स्कूलों के अपग्रेडेशन का मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
ऐसे स्कूलों पर हर साल करोड़ों रुपये आ रहा खर्च
कम संख्या वाले सरकारी स्कूलों के भवन बनाने, अन्य गतिविधियों, शिक्षकों की सैलरी पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। कई स्कूलों में तीन बच्चे तो तीन ही शिक्षक हैं जबकि कई स्कूलों में बच्चों की संख्या ज्यादा है तो एक भी रेगुलर शिक्षक नहीं है। इसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है।