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सरकारों के साथ यूं बदलता गया तेल का खेल
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Fri, 31 Mar 2017 02:23 PM IST
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राजस्थान में रिफाइनरी
- फोटो : अमर उजाला
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राजस्थान में रिफाइनरी की कहानी काफी मोड़ लिए हुए है। सरकारों के साथ ही रिफाइनरी का रुख और तकदीर दोनों बदलता रहा है। लेकिन अब लगता है कि रिफाइनरी की गाड़ी रफ्तार पकड़ेगी। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने विधानसभा में कहा है कि रिफाइनरी के लिए जल्द ही एचपीसीएल के साथ नए प्रस्तावों के अनुरूप एमओयू साइन होगा। अब हम आपको ले चलते हैं रिफाइनरी की पूरी कहानी की तरफ।
राजस्थान में आने वाली रिफाइनरी कई राजनीतिक दांव पेचों से गुजरते हुए यहां तक पहुंची है। साल 2005 में रिफाइनरी का ऐलान हुआ। शुरुआत में लागत 12 हजार करोड़ लगाई गई, धीरे धीरे समय के साथ ये लागत बढ़ती गई और बाद में इसकी अनुमानित लागत 42 हजार करोड़ हो गई। कहा जाने लगा कि ये घाटे का सौदा साबित होगी। इन सब के बावजूद अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार ने पचपदरा में शिलान्यास कर दिया।
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राजस्थान में आने वाली रिफाइनरी कई राजनीतिक दांव पेचों से गुजरते हुए यहां तक पहुंची है। साल 2005 में रिफाइनरी का ऐलान हुआ। शुरुआत में लागत 12 हजार करोड़ लगाई गई, धीरे धीरे समय के साथ ये लागत बढ़ती गई और बाद में इसकी अनुमानित लागत 42 हजार करोड़ हो गई। कहा जाने लगा कि ये घाटे का सौदा साबित होगी। इन सब के बावजूद अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार ने पचपदरा में शिलान्यास कर दिया।
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पहले पचपदरा, फिर लीलाणा, अब वापस पचपदरा
राजस्थान में रिफाइनरी
- फोटो : अमर उजाला
कांग्रेस सरकार (2008-13) में रिफाइनरी को सबसे पहले बाड़मेर के पचपदरा में स्थापित करने की योजना बनाई गई। बाद में एक उच्च स्तरीय टीम ने रिफाइनरी को लीलाणा में लगाने के लिए चयन किया। टीम के इस फैसले का स्थानीय काश्तकारों ने विरोध किया। जिसके बाद यह फैसला फिर से बदल दिया गया। साल 2013 में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले तय हुआ कि राजस्थान में प्रस्तावित रिफाइनरी बाड़मेर के पचपदरा में ही लगेगी।
इसके लिए वहां उपलब्ध 28000 बीघा में से दो गांवों की 11000 बीघा जमीन ली जाएगी। इसमें एक कोने में आ रही 5 काश्तकारों की 100 बीघा जमीन को भी छोडऩे का फैसला किया गया। जबकि एक काश्तकार को उसकी 8 बीघा जमीन के बदले दूसरी जगह जमीन दी जाएगी।
एचपीसीएल के साथ रिफाइनरी लगाना तय किया था। तब प्रस्तावित 90 लाख टन सालाना क्षमता की रिफाइनरी की लागत 37,320 करोड़ रूपए आंकी गई। एचपीसीएल ने मार्च 2013 में राजस्थान सरकार के साथ इस रिफाइनरी के लिए आपसी सहमति के ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
वर्ष 2013 में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले गहलोत सरकार ने कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी से रिफाइनरी का शिलान्यास करवाया। चुनाव के बाद प्रदेश की सरकार बदली और प्रोजेक्ट अधर में लटक गया। सवाल उठे सरकार व एचपीसीएल के बीच हुए अनुबंध पर।
इसके लिए वहां उपलब्ध 28000 बीघा में से दो गांवों की 11000 बीघा जमीन ली जाएगी। इसमें एक कोने में आ रही 5 काश्तकारों की 100 बीघा जमीन को भी छोडऩे का फैसला किया गया। जबकि एक काश्तकार को उसकी 8 बीघा जमीन के बदले दूसरी जगह जमीन दी जाएगी।
एचपीसीएल के साथ रिफाइनरी लगाना तय किया था। तब प्रस्तावित 90 लाख टन सालाना क्षमता की रिफाइनरी की लागत 37,320 करोड़ रूपए आंकी गई। एचपीसीएल ने मार्च 2013 में राजस्थान सरकार के साथ इस रिफाइनरी के लिए आपसी सहमति के ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
वर्ष 2013 में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले गहलोत सरकार ने कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी से रिफाइनरी का शिलान्यास करवाया। चुनाव के बाद प्रदेश की सरकार बदली और प्रोजेक्ट अधर में लटक गया। सवाल उठे सरकार व एचपीसीएल के बीच हुए अनुबंध पर।
अब नए सिरे से होगा एमओयू
राजस्थान में रिफाइनरी
- फोटो : अमर उजाला
वर्ष 2013 में हुए चुनाव के बाद भाजपा की सरकार बनी। सरकार बदलते ही रिफाइनरी ठंडे बस्ते में चली गई। अब जाकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा है कि पूर्ववर्ती सरकार की ओर से एचपीसीएल के साथ किए गए एमओयू के मुताबिक राज्य सरकार को 15 वर्ष तक प्रतिवर्ष ब्याज मुक्त ऋण के रूप में 3 हजार 736 करोड़ रुपए देने पड़ते, जो हमारे रि-नेगोशिएशन से अब मात्र 1 हजार 123 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष ही रह गया है।
इस तरह अब हमारे प्रयासों से 15 वर्षों में ब्याज मुक्त ऋण के रूप में दी जाने वाली राशि 56 हजार 40 करोड़ रुपए से घटकर 16 हजार 845 करोड़ रुपए ही रह गई है। इसी प्रकार पिछली सरकार ने रिफाइनरी में 26 प्रतिशत इक्विटी के रूप में 3871 करोड़ देना तय किया था। नए प्रस्ताव में यह राशि भी घटकर 3738 करोड़ रह गई है।
राजे का कहना है कि इस अनुबंध पर पुनर्विचार की बात की गई है। राज्य पर रिफाइनरी की स्थापना से पड़ने वाला वित्तीय भार परियोजना की लागत बढऩे के बावजूद करीब दो-तिहाई घटकर अब 20 हजार 583 करोड़ रुपए रह गया है। शीघ्र ही एचपीसीएल के नए प्रस्ताव के मुताबिक रिफाइनरी के लिए एमओयू किया जाएगा।
इस तरह अब हमारे प्रयासों से 15 वर्षों में ब्याज मुक्त ऋण के रूप में दी जाने वाली राशि 56 हजार 40 करोड़ रुपए से घटकर 16 हजार 845 करोड़ रुपए ही रह गई है। इसी प्रकार पिछली सरकार ने रिफाइनरी में 26 प्रतिशत इक्विटी के रूप में 3871 करोड़ देना तय किया था। नए प्रस्ताव में यह राशि भी घटकर 3738 करोड़ रह गई है।
राजे का कहना है कि इस अनुबंध पर पुनर्विचार की बात की गई है। राज्य पर रिफाइनरी की स्थापना से पड़ने वाला वित्तीय भार परियोजना की लागत बढऩे के बावजूद करीब दो-तिहाई घटकर अब 20 हजार 583 करोड़ रुपए रह गया है। शीघ्र ही एचपीसीएल के नए प्रस्ताव के मुताबिक रिफाइनरी के लिए एमओयू किया जाएगा।