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Sirohi News: प्रकृति के मनोरम वातावरण के बीच यहां विराजे हैं पुष्करराज, जानिए क्या है इस मंदिर की खासियतें
Mon, 17 Mar 2025 03:28 PM IST
सिरोही ब्यूरो
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, सिरोही
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, सिरोही
Published by: सिरोही ब्यूरो
Updated Mon, 17 Mar 2025 03:28 PM IST
सार
आज हम आपको सिरोही जिले में स्थित एक अति प्राचीन धार्मिक स्थल के बारे में बता रहे हैं। जो प्रकृति के मनोरम वातावरण के बीच बना हुआ है। यहां तक पहुंचने के लिए करीब पांच किलोमीटर ट्रैकिंग करनी पड़ती है।
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पुष्करराज मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
गुजरात से सटे सिरोही जिले की ऐतिहासिक एवं प्राचीन धार्मिक स्थलों की वजह से देवनगरी के रूप में पहचान है। जिले में विभिन्न क्षेत्रों में एक से बढ़कर एक अतिप्राचीन मंदिर स्थित हैं। आज हम आपको ऐसे ही एक मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जो सरूपगंज के समीप अरावली की पहाड़ियों एवं घने जंगलों के बीच स्थित है। इसे पुष्करराज तीर्थ भी कहा जाता है। यहां पहुंचने के लिए सरूपगंज टोल नाका के पास से सड़क मार्ग होते हुए पिंडवाड़ा तहसील के फूलाबाई का खेड़ा गांव पहुंचना होता है।
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बता दें कि यहां से आगे की करीब पांच किलोमीटर की दूरी नदी एवं पहाड़ियों में बनी पगडंडी से होकर तय करनी पड़ती है। बारिश एवं इसके बाद एक लंबे समय तक तो लोगों को कई बार पानी के बहाव के बीच में से होकर गुजरना पड़ता है। मंदिर के मुख्य द्वार से पुष्करराज मंदिर तक 100 सीढ़ियां भी चढ़नी पड़ती हैं, जो प्राकृतिक झरने के पास है।
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यह है मंदिर की खासियतें
वैसे तो पुष्करराज का नाम आते ही अजमेर का नाम हमारे दिमाग में आता है। लेकिन, सिरोही जिले में भी पुष्करराज का मंदिर है। मान्यता है कि जो लोग किन्हीं कारणों से अजमेर नहीं जा पाते हैं, वे यहां आकर दर्शन कर लेते हैं। उन्हें उसी के समान पुण्य लाभ मिलता है। मंदिर के प्रवेश द्वार के पास निरंतर बहती जलधारा और गोमुख इसे पवित्र बनाते हैं। इस मंदिर का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। कुछ वर्ष पहले इसे जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पाया गया था, जिसके बाद साधु-संतों के सानिध्य में इसका जीर्णोद्धार करवाया गया था।
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यहां का आसपास का प्राकृतिक नजारा यहां आने वालों को शांति और सुकून प्रदान करता है। वाद्ययंत्र बजाती प्रतिमाओं से सज्जित मंदिर मंदिर के गर्भगृह में ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव की प्रतिमाएं विराजमान है। पंडाल में बने प्रत्येक पिलर और बाहरी दीवारों पर वाद्ययंत्र बजाती हुई प्रतिमाएं उकेरी गई हैं, जो इसे वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण बनाती हैं। यहां के महंत शिवगिरी महाराज मंदिर के प्रवेश द्वार पर विराजमान हैं, जबकि साधु-संतों के लिए कुटिया और निरंतर जलता हुआ धुणा भी परिसर बना हुआ है।
शाम चार बजे के बाद मंदिर आवाजाही पर रहती है रोक
चूंकि, ये मंदिर अरावली की सुरम्य पहाड़ियों के बीचों बीच स्थित है। इसलिए श्रद्धालुओं की हमेशा आवाजाही बनी रहती है। श्रावण मास में तो मंदिर में मेले सा माहौल हो जाता है। यहां आवाजाही के लिए घने जंगलों एवं पगडंडी से होकर गुजरना पड़ता है। ऐसे में अक्सर शाम को अंधेरा होने के बाद जंगली जानवरों का भी भय रहता है। इसलिए शाम चार बजे से सवेरे सात बजे तक मंदिर आने एवं यहां से जाने की मनाही है। श्रद्धालुओं को इस दौरान आवाजाही नहीं करने की सलाह दी गई है।