RSS नेता मनमोहन वैद्य बोले- आरक्षण को और आगे बढ़ाया तो अलगाव पैदा होगा
यूपी चुनाव से पहले जयपुर आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य और सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ) में शुक्रवार को कहा, आरएसएस का मानना है कि आरक्षण को और बढ़ाया गया, तो अलगाव पैदा होगा। आरक्षण की व्यवस्था अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए अलग संदर्भ में लागू की गई थी, क्योंकि उस समाज का पूर्व में शोषण हुआ। लेकिन अब इसे धार्मिक आरक्षण की ओर बढ़ाया जा रहा है। आरक्षण लम्बा चलेगा, तो अलगाववाद ही पैदा होगा।
उन्होंने कहा कि आरक्षण किसी भी समाज की लम्बी व्यवस्था नहीं रहा। अब समय आ गया है कि सभी को बेहतर शिक्षा दी जाए और समान अधिकार की बाते हों। उन्होंने कहा कि समिति का गठन कर आरक्षण की सही समीक्षा होनी चाहिए और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसके उपयोगी और प्रभाव को जनता के सामने लाने चाहिए।
'इंटालिरेंस वाले बुद्धिजीवी रखते हैं आरएसएस से अस्पृश्यता का भाव'
यहां आरएसएस की पीड़ा भी जाहिर हुई। वैद्य ने कहा कि इंटालिरेंस की बात करनेवाले तथाकथित बुद्धिजीवी इस देश में आरएसएस से अस्पृश्यता का भाव रखते हैं। जबकि यहां बोलने और अपनी बात रखने की पूरी स्वतंत्रता है। उन्होंने कहा कि जेएलएफ में कुछ बुद्धिजीवी इसलिए नहीं आए क्योंकि हमें यहां बोलने के लिए बुलाया गया था। दोनों ने कहा कि आरएसएस ने हमेशा उन लोगों को भी अपने मंचों पर बुलाया है, जो आरएसएस का विरोध करते हैं। संघ ने ऐसे लोगों से काफी कुछ सीखा भी है। इंटोलिरेंस की बाते वे करते है, जो हिन्दुत्व से दूर हैं।
उन्होंने कहा कि संघ किसी भी तरह की हिंसा से वास्ता नहीं रखता और पुरजोर विरोध करता है। केरल की सरकार ने जब संघ के कार्यकर्ताओं के हमलों पर कुछ नहीं किया, तब वहां बचाव के तहत उन्होंने प्रतिक्रिया दी थी। उत्तर प्रदेश में एक व्यक्ति पर अटैक हुआ तो पूरा मीडिया उस पर फोकस हो गया। केवल आरएसएस कार्यकर्ता पर अटेक होने पर कोई नहीं पूछता। आरएसएस वर्ण व्यवस्था का भी समर्थक नहीं है, वह अब पुरानी बात हो चुकी है। आरएसएस समाज का संगठन है, समाज में संगठन नहीं है। संघ में कोई सदस्यता नहीं लेता।
'धर्मनिरपेक्षता शब्द गैर जरूरी, इस पर पुनर्विचार हो'
जेएलएफ में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और इसकी विचारधारा बदलने जैसे विषय पर आयोजित सत्र में वैद्य और होसबोले ने मुस्लिम आरक्षण, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद, धर्म, धर्मनिरपेक्षता, इतिहास जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में धर्मनिरपेक्षता शब्द गैर जरूरी है। दोनों ने इसे हटाने की वकालत की और कहा कि इस पर पुनर्विचार हो।
उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्षता भारत का विचार ही नहीं है। हिन्दुत्व पर कहा कि हिन्दु धर्म में सभी को जगह दी गई है और सभी अपने-अपने धर्म का पालन करें, यही हिन्दुत्व है। धर्म के आधार पर भारतीय राष्ट्र की कल्पना कभी नहीं की गई। यही भारत की विशेषता है। हिन्दू धर्म जीवन जीने का तरीका है, जिसे कई मंचों पर साबित किया जा चुका है। जहां तक राष्ट्र शब्द का अर्थ है, यह एक राष्ट्र की पहचान से जुड़ा हुआ है। आदर्श राष्ट्र वह होगा, जिसमें सभी तरह की विविधताएं साथ रहें। यह जरूरी नहीं कि सभी एक विचारधारा का पालन करें।
उन्होंने एक लेख का हवाला देते हुए मुस्लिम समाज के लिए कहा कि एक लेख में लिखा था कि गुजरात में मुस्लिमों की स्थिति बंगाल से भी ज्यादा अच्छी है। यह सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में था। यह ऐसा क्यों था, इस पर विचार करना चाहिए। हम भौतिक शिक्षा के बजाय धार्मिक शिक्षा पर बल दे रहे हैं तो इस पर भी विचार करना चाहिए। आजादी के बाद इतने साल बाद भी हमारा समज पिछड़ा क्यों है, पॉलिटिकल दृष्टिकोण से नहीं, राष्ट्रीय विचार से सोचना चाहिए।
'टिकट देना पार्टी का अधिकार, न कि संघ का'
'शिक्षा में इतिहास को सही रूप में नहीं पढ़ाया गया'
होसबोले ने कहा कि अपने देश के इतिहास को विकृत करने का प्रयास अपने देश के भीतर ही हुआ। बच्चों को स्कूलों से सही इतिहास से दूर रखा गया। हालांकि सही इतिहास उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि किसी इतिहास की किताब में उन्होंने पढ़ा था कि भगवान महावीर को 12 साल की उम्र में पागल हो गए थे। पहले कहा गया कि आर्य भारत आए थे, फिर कहा यहीं के थे, जब साबित नहीं हो पाया, तो कहा कि आर्य आये थे और यहां रहकर आगे चले गए।