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'डेढ़ साल' से कपड़े में बांधकर रखे हैं मृतक के अवशेष

Sat, 26 Sep 2015 03:55 PM IST
Updated Sat, 26 Sep 2015 03:55 PM IST
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remains of the deceased are placed from One and a half years

राजस्थान के उदयपुर में 'मौताणा' के लिए मृतक का अंतिम संस्कार किए बिना अवशेषों को पोटली में बांधकर रखने का मामला सामने आया है। 'मौताणा' यानी किसी अस्वाभाविक मृत्यु पर दोषियों से मुआवजा वसूलने का आदिवासी रिवाज।

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राजस्थान के मांडवा थाना के सब इंस्पेक्टर भगवत सिंह के अनुसार मृतक की पहचान 36 वर्षीय अजमेरी के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि उनकी मौत मई 2014 में हुई थी। उनके परिजनों ने 'मौताणे' के लिए अभियुक्त पक्ष के गाँव बूझा में दबाव बना रखा है।
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सब इंस्पेक्टर भगवत सिंह ने इसकी पुष्टि की है। उन्होंने बताया, “मृतक के अवशेष एक कपडे में बंधे हुए आंजनी गाँव के एक पुराने खंडहरनुमा आंगनवाडी भवन में टंगे हुए हैं जहाँ वे रहते थे। पर अभी तक स्थानीय लोग यह ठीक से नहीं बता पाए हैं कि कितने समय पहले अवशेष यहां टांगे गए।''
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(सभी फोटो फाइल)

कोई मामला दर्ज नहीं

remains of the deceased are placed from One and a half years

यह स्थान सीमावर्ती गुजरात के पोशीना थाना में आता है इसलिए पोस्टमॉर्टम या डीएनए जांच के लिए पोशीना पुलिस की मदद भी ली जा रही है। उन्होंने बताया, “आज तक अजमेरी की हत्या संबंधी कोई मामला थाने में दर्ज नहीं है लेकिन शुक्रवार को अदातल के आदेश पर एक 'चढोतरे' की शिकायत दर्ज हुई है।

बताया जा रहा है कि मृतक की मानसिक हालत भी ठीक नहीं थी और उनकी पत्नी अपने पांच बच्चों समेत अपने मायके चली गई।” 'चढोतरा' यानी अभियुक्त पर दबाव बनाने के लिए गांव या परिवार का रास्ता रोकना, पशु कब्जे में ले लेना आदि।

मृतक अजमेरी के भाई लल्लू, पोपट और सुंदर बूझा में रहने वाले अपने जीजा बाडिया गमार पर हत्या का आरोप लगा रहे हैं।

पहाड़ी के पास मिल शव

remains of the deceased are placed from One and a half years

बताया जाता है कि अजमेरी पिछले साल मई में अपनी बहन से मिलने बूझा गाँव गए थे, लेकिन लौटे नहीं और एक महीने बाद उनका क्षत-विक्षत शव पहाडी के पास मिला।

सामाजिक संस्था 'आस्था' से जुडे अश्विनी पालीवाल कहते हैं, “जिले के आदिवासी अंचल में मौताणा के लिए दबाव बनाने के लिए मृतक के गोत्र वाले लोग अक्सर अभियुक्त के परिवार पर धावा बोल देते हैं, फसल जला देते हैं या सडक पर धरना देकर बैठ जाते हैं।'

पुलिस अधिकतर मामलों में मूक दर्शक बनी रहती है क्योंकि मामला कानूनन सुलझ जाने पर भी कई बार आदिवासी बकाया मौताणा लेना नहीं भूलते।

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