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Nagaur: मायरा बना चर्चा का विषय, किसान भाइयों ने बाजरे से भरी ट्रॉली-ट्रैक्टर की भेंट, 81 लाख नगदी और गहने भी
Thu, 16 Mar 2023 04:08 PM IST
अरविंद कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नागौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नागौर
Published by: अरविंद कुमार
Updated Thu, 16 Mar 2023 04:08 PM IST
सार
राजस्थान में शादी बिना मायरे के फीकी सी लगती है। मायरे में नागौर जिला सदियों से चर्चा का विषय बना हुआ है। तीन किसान मामा ने अपनी भांजी की शादी में मायरा के नाम तीन करोड़ 21 लाख रुपये खर्च किए। साथ अपनी बहन को रुपयों से सजी ओढ़नी ओढ़ाई। मामाओं ने अपने खेत से अनाज भरकर कर ट्रैक्टर-ट्रॉली, स्कूटी, आभूषण और उपहार सौंपे।
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मायरा बना चर्चा का विषय
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
नागौर जिले में जायल उपखंड के झाड़ेली गांव निवासी घेवरी देवी और पति भंवरलाल पोटलिया की बेटी अनुष्का की 15 मार्च को शादी थी। अनुष्का की शादी में नाना बुरडी गांव निवासी भंवरलाल गरवा अपने तीन बेटे हरेंद्र रामेश्वर और राजेंद्र को लेकर करोड़ों रुपये का मायरा लेकर भी पहुंचे।
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घेवरी देवी जब अपने पिता और अपने भाइयों के इस सम्मान को देखा तो परिवार के आंखों में आंसू छलक पड़ा। घेवरी देवी के पिता बताते हैं कि उनके इकलौती बेटी है और इस बेटी के इकलौती ही बेटी है। यानी नाना जी के अनुष्का इकलौती दोहिती है और अनुष्का के नाना जी का कहना है कि बेटी के लिए मेरे तीन बेटे को इतना मिला है।
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तीनों भाइयों ने बहन को चुनरी ओढ़ाई...
राजस्थान में जब किसी बेटियां बेटे की शादी हो उस दौरान जो मामा अपनी बहन को सहयोग देते हैं और उस सहयोग को मायरा कहते हैं, जिसमें बहन के लिए आभूषण और नगदी भी देते हैं, कपड़े भी देते हैं। नागौर के झाड़ेली गांव की रहने वाली घेवरी देवी की बेटी अनुष्का की शादी थी, उस समय गांव के और अपने रिश्तेदार आए हुए थे। उस दौरान गवरी देवी के भाइयों ने जमीन के कागज बेटी के परिवार को सौंपे तीनों भाइयों के बीच एकलौती बहन बहन के ससुराल वालों सभी को चांदी के सिक्के भेंट किए।
गवरी देवी के पिता भंवरलाल का कहना है कि उसके पास करीब 350 बीघा उपजाऊ जमीन है और उसके तीन बेटे हैं। हरेंद्र रामेश्वर और राजेंद्र और घेवरी की इकलौती की बेटी हैं, जो उसको ईश्वर ने एक बड़ा उपहार दिया है। बहन बेटी और बहू से बढ़कर इस संसार में कोई बड़ा धन नहीं है। यह नहीं कहते हैं, यह उनके पूर्वजों का भी पुराना इतिहास है। बहन बेटी के लिए मायरा दिल खोलकर भर देना चाहिए और अपनी बहन के लिए संकट के समय रक्षक की तरह खड़े होना चाहिए। इसी सोच के चलते उसके बेटो ने उसकी सहमति पर अपनी बहन की खुशी के लिए दिल खोलकर मायरा भर दिया।
नाना पहुंचे रुपयों की गाड़ियों से भरकर थाल...
गवरी देवी के पिता खुद अपने सिर पर रुपयों से भरकर रुपयों की थाली भरकर कर टेंट में पहुंचे इस दौरान थाली में 81 लाख रुपये नगदी और थाली के साथ अपनी बेटी के लिए 500 रुपये से सजी ओढ़नी भी लेकर आए साथ में। 16 बीघा खेती के लिए जमीन नागौर शहर में रिंग रोड के ऊपर 30 लाख की लागत का एक प्लॉट 41 तोला सोना और तीन किलो चांदी के गहने दिए। इसके अलावा और अनाज की बोरियों से भरी हुई एकदम नया ट्रैक्टर-ट्रॉली और अपनी दो ही टी के लिए स्कूटी वी गिफ्ट दी। इतना देखकर पूरे जिले भर में यह मायरा चर्चा का विषय बन गया।
नागौर का मायरा सदियों से प्रसिद्ध...
नागौर में जायल के जाटों का मायरा सदियों से प्रसिद्ध है। मारवाड़ में इस मायरे को कॉफी सम्मान की नजर से देखा जाता है। गूगल साम्राज्य के दौरान जायल के खियाला और जायल के जाटों ने मिलकर लिछमा गुजरी को अपनी धर्म की बहन मानकर भर गए थे। मायरा आज भी जब शादी होती है और उस समय मायरा आता है तो महिलाएं लोकगीत में भी गाती हैं।
कहा जाता है कि खियाला के जाट धर्माराम और गोपालराम दोनों मुगल साम्राज्य में बादशाह के लिए टैक्स कलेक्शन का काम करते थे और टैक्स कलेक्शन कर टैक्स को जमा करवाने के लिए वह दिल्ली दरबार जा रहे थे। जब दोनों भाई दिल्ली टैक्स कलेक्शन दिल्ली दरबार में जमा करवाने जा रहे थे। इसी दौरान बीच रास्ते में शादी के दिन लिछमा गुजरी नामक एक महिला बिलखती हुई रोती हुई नजर आई। जब उन्होंने कारण पूछा तो लिछमा गुजरी ने बताया कि उसके घर पर शादी है, बेटों की और उसके कोई भाई नहीं हैं, जिसके कारण उसके बच्चों की शादी में अब मायरा कौन लेकर आएगा । तब उन्होंने धर्माराम और गोपाल रामजाट ने ढांढस बांधते हुए कहा कि वह तुम्हारे भाई हैं और तुम चलो घर हम करेंगे मायरा। उस दौरान दोनों जाटों ने अपनी बहन लिछमा गुजरी के लिए टैक्स कलेक्शन के सारे रुपए से़ मायरा भर दिया। दूसरी तरफ बादशाह नाराज हो गए, वह समय पर नहीं पहुंचे थे। जब वह पहुंचे तब सारी बात बादशाह के सामने रखी तो उन्होंने सजा देने के बजाय उनको माफ कर दिया।
मायरे की शुरुआत 600 साल पूर्व नरसी भगत ने शुरू की थी। नरसी भगत का जन्म गुजरात के जूनागढ़ में 600 साल पहले हुआ था, उस समय हुमायूं का शासन काल था। नरसी भगत जो कि जन्म से ही गूंगे और बहरे थे। वह अपनी दादी के पास ही रहते थे, उनके एक भाई भाभी भी थे। भाभी का स्वभाव कड़क था, लेकिन नरसी भगत जो कि एक संत प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। इसी प्रवृत्ति के चलते उनको आवाज और उनका वीरप्पन ठीक हो गया। नरसी जी के मां बाप एक महामारी के शिकार हो गए, नरसी भगत की शादी हुई थी और पत्नी भी भगवान के प्यारी हो गई। नरसी जी की दूसरी शादी भी करवाई, कुछ दिन बीतने पर नरसी जी के घर पर एक लड़की का जन्म हुआ और उसका नाम नानीबाई रखा नरसी बाई नरसी भगत ने अपनी बेटी की शादी अंजार नगर में करवा दी। दूसरी तरफ नरसी जी की भाभी ने उनको घर से निकाल दिया, नरसी भगवान श्री कृष्ण के अटूट भगत हैं।
वह उन्हीं की भक्ति में लीन हो गए, भगवान शंकर की कृपा से उन्होंने ठाकुर जी के भी दर्शन कर लिए। उसके बाद तो नरसी जी ने सांसारिक मोहेबी त्याग दिया और संत बन गए उधर नरसी भाई ने पुत्री को जन्म दिया और पुत्री विवाह लाइक हो गई। किंतु नरसी को कोई खबर नहीं थी, लड़की के विवाह पर ननिहाल की तरफ से भात भरने की रसम के चलते नरसी जी को नरसी के पास देने के कुछ नहीं थे, नरसी जी के पास खुद की टूटी-फूटी बैलगाड़ी और बूढ़े 220 हैं। नरसी जी ने अपने कुटुम के भाई लोगों से मदद मांगी, लेकिन उन्होंने भी इंकार कर दिया। अपनी टूटी-फूटी और बूढ़े लोगों को लेकर नरसी भगत अपनी बेटी के घर अंजार पहुंच गए, भक्ति के कारण भगवान श्री कृष्ण ने 56 करोड़ का मायरा भरा था।