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19 दिन में दुष्कर्मी को फांसी की सजा सुनाकर जज ने पढ़ी कोर्ट में मार्मिक कविता, नम हो गईं सबकी आंखें

Sat, 01 Sep 2018 11:12 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झुंझुनूं
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झुंझुनूं Updated Sat, 01 Sep 2018 11:12 AM IST
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Judge read poem in court after giving capital punishment to Rapist

ये देश का दुर्भाग्य ही है कि पोक्सो कानून बनाना पड़ा और दिन पे दिन बढ़ते अपराध को देखते हुए बच्चिओं से दुष्कर्म करने वालों को सख्त सजा जल्द देने की मांग हो रही है। दरिंदों को तेज कार्रवाई का डर कितना सताएगा ये तो पता नहीं लेकिन न्याय देने में थोड़ी तेजी तो दिखाई दे रही है। राजस्थान के झुंझुनूं में तीन साल की बच्ची से दुष्कर्म के आरोपी को न्यायालय ने महज 19 दिन में फांसी की सजा सुना दी। घटना 2 अगस्त को मलसीसर के पास डाबड़ीधीर सिंह गांव में हुई थी। 21 वर्षीय दोषी विनोद बंजारा के खिलाफ पुलिस ने 19 दिन पहले चार्जशीट दाखिल की थी। 

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बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम के विशेष न्यायालय की न्यायाधीश नीरजा दाधीच ने मामले को दुर्लभतम बताते हुए एक मार्मिक कविता का भी जिक्र किया। कविता में संदेश छिपा था कि 'अब भी ना सुधरे तो एक दिन ऐसा आएगा, इस देश को बेटी देने से भगवान भी घबराएगा।' बता दें कि दुष्कर्म का शिकार हुई तीन साल की मासूम के दिल में छेद है। उसका ऑपरेशन होना है। फैसले के समय मासूम की मां एवं उसके नाना इलाज के लिए उसे जयपुर लेकर गए हुए थे।
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ये है पूरी घटना

दरअसल दोषी विनोद फेरी लगाकर बर्तन बेचने का काम करता है। 2 अगस्त को वह डाबड़ी धीर सिंह गांव में पहुंचा था। यहां अपने ननिहाल आई तीन साल की मासूम को उसने घर में अकेला देख उसके साथ दुष्कर्म किया और भाग गया। पुलिस ने तीन अगस्त को चिड़ावा में किराए के मकान से रह रहे विनोद को पकड़ लिया। पुलिस ने 11 दिन में ही आरोपी के खिलाफ चालान पेश कर दिया। आरोपी की ओर से किसी वकील ने पैरवी नहीं की तो सरकार ने विधिक सहायता के तहत उसे वकील मुहैया करवाया। 
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चालान पेश होने के 19वें दिन शुक्रवार को विनोद को कोर्ट ने पोक्सो एक्ट में मृत्यु दंड की सजा सुना दी। बता दें कि अभी 20 दिन पहले ही विनोद की पत्नी ने बेटी को जन्म दिया है। फैसले के समय आरोपी चुपचाप खड़ा रहा। 
 

न्यायाधीश ने पढ़ी ये कविता

Judge read poem in court after giving capital punishment to Rapist
'वो मासूम नाजुक बच्ची एक आंगन की कली थी' 
'वो मासूम नाजुक बच्ची एक आंगन की कली थी' 
वो मां-बाप की आंख का तारा थी
अरमानों से पली थी

जिसकी मासूम अदाओं से मां-बाप का दिन बन जाता था
जिसकी एक मुस्कान के आगे पत्थर भी मोम बन जाता था 
वो छोटी सी बच्ची, ढंग से बोल नहीं पाती थी 
दिखा के जिसकी मासूमियत उदासी मुस्कान बन जाती थी
 
जिसने जीवन के केवल तीन बसंत ही देखे थे 
उस पे यह अन्याय हुआ यह कैसे विधि के लेखे थे 
एक तीन साल की बेटी पे यह कैसा अत्याचार हुआ 
एक बच्ची को दरिंदों से बचा नहीं सके, यह कैसा मुल्क लाचार हुआ
 
उस बच्ची पर जु्ल्म हुआ, वो कितनी रोई होगी 
मेरा कलेजा फट जाता है तो मां कैसे सोई होगी 
जिस मासूम को देख के मन में प्यार उमड़ के आता है 
देख उसी को मन में कुछ के हैवान उतर आता है
 
कपड़ों के कारण होते रेप जो कहे, उन्हें बतलाऊं मैं 
आखिर तीन साल की बच्ची को साड़ी कैसे पहनाऊं मैं
गर अब भी ना सुधरे तो एक दिन ऐसा आएगा 
इस देश को बेटी देने से भगवान भी घबराएगा 
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