भैराणा धाम: क्या अकेले पड़ गए 'हनुमान' ? संतों ने क्यों बनाई दूरी, आंदोलन में आया नया मोड़
भैराणा धाम आंदोलन में हर रोज नए मोड आ रहे हैं। सुबह संतो ने हनुमान से दूरी बनाते हुए सरकार से बातचीत में भरोसा जताया। शाम को हनुमान से मिले। आंदोलन की दिशा और सियासी समीकरण दोनों बदलते नजर आ रहे हैं।
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भैराणा धाम में प्रस्तावित RIICO औद्योगिक क्षेत्र का विवाद अब केवल धार्मिक आस्था या औद्योगिक विकास का मुद्दा नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे राजस्थान की राजनीति में नए शक्ति-संतुलन की लड़ाई का केंद्र बनता जा रहा है। सोमवार को हुए घटनाक्रमों ने साफ संकेत दिया कि संत समाज और राजनीतिक दल अब इस आंदोलन को अलग-अलग तरीके से आगे बढ़ाना चाहते हैं। हालांकि कांग्रेस ने अब तक इस मुद्दे अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन उसके कई नेता इस मामले में हनुमान का समर्थन करते नजर आ रहे हैं।
वहीं तरफ भैराणा धाम संघर्ष समिति ने खुद को राजनीतिक बयानबाजी से अलग करते हुए सरकार और प्रशासन के साथ सीधे संवाद की रणनीति अपनाई है, वहीं दूसरी तरफ नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने इस मुद्दे को सरकार की विश्वसनीयता और वादाखिलाफी से जोड़कर राजनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश तेज कर दी है।
दादूपीठ नारायणा के पीठाधीश्वर ओमदास महाराज की मौजूदगी में संघर्ष समिति ने स्पष्ट कर दिया कि उसका मकसद किसी राजनीतिक दल के साथ खड़ा होना नहीं, बल्कि भैराणा धाम और उसके आसपास के पर्यावरण तथा धार्मिक स्वरूप की रक्षा करना है। समिति ने यह भी संकेत दिया कि वह मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से सीधे संवाद कर समाधान चाहती है।
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यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आंदोलन की शुरुआत से ही इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिशें होती रही हैं। संत समाज का यह संदेश सरकार के लिए राहत का संकेत माना जा रहा है कि बातचीत की गुंजाइश अभी बनी हुई है लेकिन दूसरी ओर हनुमान बेनीवाल ने इस मुद्दे को हाथ से जाने नहीं दिया। साधु-संतों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद उन्होंने सरकार पर सहमति के बावजूद निर्णय लागू नहीं करने का आरोप लगाया। बेनीवाल का संदेश साफ है कि यदि सरकार पीछे हटती है तो वे इस आंदोलन को प्रदेशव्यापी मुद्दा बनाने से नहीं चूकेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह पूरा घटनाक्रम बेनीवाल की उस रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है, जिसमें वे खुद को किसानों, युवाओं और अब संत समाज की आवाज के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। पिछले कुछ वर्षों में आंदोलन आधारित राजनीति से अपनी पहचान बनाने वाले बेनीवाल के लिए भैराणा धाम का मुद्दा जनभावनाओं से जुड़ने का नया अवसर बन सकता है।
उधर, सरकार के लिए स्थिति आसान नहीं है। एक तरफ संत समाज और पर्यावरण संरक्षण की मांग है तो दूसरी तरफ आसपास के गांवों का एक वर्ग RIICO परियोजना का समर्थन कर रहा है। स्थानीय लोगों द्वारा प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर परियोजना शुरू कराने की मांग ने सियासी समीकरण और जटिल कर दिए हैं।
असल चुनौती यह है कि यदि सरकार परियोजना वापस लेती है तो यह उसके लिए बैकफुट पर आने जैसा होगा। आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री स्तर पर होने वाली संभावित वार्ता और सरकार के अंतिम फैसले से तय होगा कि यह विवाद बातचीत से सुलझता है या फिर राजस्थान की राजनीति में एक बड़े जनआंदोलन का रूप लेता है।