गोलियों, धमाकों और खौफ से लौटे वापस
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लौटकर जयपुर पहुंचे कामगारों ने बताया कि नर्क सा मंजर था। खून ऐसे बहाया जा रहा था, जैसे पानी हो। चारों तरफ शव फैले थे। कानों में गोलियों की गडग़ड़ाहट और बम के धमाकों की गूंज थी। जहां तक जाती थी, वहां तबाही ही तबाही के नजारे थे। उन्होंने बताया कि अभी सोचकर भी उनकी रूह कांप रही है, तो सोचों जब वहां थे, तो क्या हाल हो रहा होगा?
जान की कोई कीमत ही नहीं
ईराक से लोटकर आए इन लोगों की आंखों में आसानी से खौफ देखा जा सकता है। बातचीत करते हुए वे बीच-बीच में कई बार सिहर उठते हैं। कामगारों ने बातचीत में बताया कि वहां जान की तो कोई कीमत ही नहीं है। जो जहां मिलाए माथे पर बंदूक तान दी जाती है या फिर गोलियां मार दी जाती हैं या काट दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि वहां उन्हें धन की चिंता नहीं थी और न मन की। सभी सिर्फ जीवन के बारे में सोच रहे थे और ईश्वर से प्रार्थना करके इस बुरे समय काट रहे थे। बस ईश्वर से यही मांग थी कि कैसे भी करके हमारे वतन पहुंचा दे। हालांकि लोगों ने बताया कि समुदायों में झगड़े-तनाव वहां आम बात की तरह है।
न मांगा वेतन, सामान भी बेच आए
सीकर से सुलतान सिंह ने बताया कि ऐसे खतरनाक माहौल में न तो कंपनी से वेतन मांग सके और जो कु छ सामान था, उसे भी बेच पाए। सुलतान सिंह ही नहीं और भी ऐसे कामगार हैं, जो इराक में चल रहे इस भयावह स्थिति में तीन से चार महीने की पूरी कमाई वहीं छोड़ आए। जिस कंपनी में काम कर रहे थे अभी भी 500 भारतीय नागरिक फं से हैं। सरकार से प्रार्थना करता हूं कि उन्हें भी निकाले।
देवली के प्रेम सिंह ने बताया कि वो लम्हें याद कर कांप जाता हूं। तीन माह के पैसे कंपनी ने नहीं दिए, बोले पैसे का क्या अचार डालेंगे जब जान ही नहीं बचेगी। वे नहीं देख रहे है कि सामने कौन है वे तो धमाके को खिलौना समझकर करते जा रहे हैं। चार महीने से पगार नहीं दी। वहां समुदायों का झगड़ा पहले से है लेकिन इस बार यह हद ही पार कर गया है।