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लापरवाही या गबन! 31 करोड़ हो रहे खर्च फिर भी असफल पौधरोपण अभियान, यहां सूख गए पौधे; हरियाली सिर्फ काजगों पर

Tue, 14 Oct 2025 11:49 AM IST
दौसा ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दौसा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दौसा Published by: दौसा ब्यूरो Updated Tue, 14 Oct 2025 11:49 AM IST
सार

Dausa News: 31 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं फिर भी 261 ग्राम पंचायतों में पौधशाला योजना पर खटाई पड़ती नजर आ रही है। अब सिर्फ और सिर्फ यह योजना सरकारी राशि की बर्बादी साबित हो रही है। चलिए बता रहे हैं लापरवाही और पैसों की बर्बादी की पूरी कहानी, आखिर कैसे ये योजना उदासीनता की भेंट चढ़ रही है। 
 

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In Dausa, more than half of the ₹31 crore approved for 261 gram panchayats
दौसा में पौधरोपण अभियान के बाद खाली नर्सरी, अनदेखी की वजह से सूख रहे पौधे। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दौसा जिले को हरा-भरा बनाने के लिए सरकार ने जो महत्त्वाकांक्षी पौधशाला योजना शुरू की थी, वह जिले में असफल साबित होती नजर आ रही है। योजना पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद जिले की कई ग्राम पंचायतों में पौधशालाएं बनी ही नहीं, और जहां बनीं भी वहां देखभाल के अभाव में पौधे सूख गए। पंचायती राज विभाग ने महात्मा गांधी नरेगा योजना के तहत जिले की 261 ग्राम पंचायतों में पौधशाला व नर्सरी विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था। इन पंचायतों को 31 करोड़ रुपए की स्वीकृति दी गई। योजना का उद्देश्य था कि हर ग्राम पंचायत मुख्यालय पर दो हजार पौधे तैयार हों और अगले पांच साल में हरियाली का ऐसा जाल बिछे कि जिले का चेहरा बदल जाए। लेकिन परिणाम करोड़ों खर्च होने के बाद भी उम्मीदों के विपरीत नजर आ रहे हैं।

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शुरुआत से ही कमजोर रही योजना
योजना की शुरुआत में ही कई कमियां नजर आईं। जिन पंचायतों को बजट मिला, उनमें से अधिकांश ने न तो जगह का सही चयन किया और न ही पानी की व्यवस्था। कुछ पंचायतों ने खेतों के बीच या सुनसान मैदानों में पौधशालाएं बना दीं, जहां न बाड़बंदी थी और न ही कोई देखभाल करने वाला।

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लवान पंचायत समिति की कवरपूरा, हिगोटिया, दौसा की सूरजपुरा ग्राम पंचायत में बजट स्वीकृति के बाद भी पौधशाला तक तैयार नहीं की। वहीं सिगवाड़ा ग्राम पंचायत में तो हाल और भी खराब रहे। यहां पौधशाला तो बनाई गई, लेकिन देखभाल के अभाव में पौधे सूख गए। हालात इतने बिगड़े कि कई जगह पौधों के ढेर ही जला दिए गए। ग्रामीणों का कहना है कि अगर शुरुआती समय में देखभाल और सिंचाई की व्यवस्था होती तो हजारों पौधे आज हरे-भरे होते।

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सिंगवाड़ा ग्राम पंचायत की पौधशाला पर लाखों खर्च होने के बाद भी कागजों पर ही हरी-भरी दिख रही है। वास्तविकता यह है कि वहां आज सिर्फ 2000 पौधों की जगह मात्र 100-200 पौधे ही दिखाई दे रहे हैं। पौधशाला का पूरा परिसर वीरान पड़ा है। ग्रामीणों के अनुसार शुरुआती बरसात में पौधे लगाए तो गए थे, लेकिन बाद में किसी ने ध्यान नहीं दिया। न तो पानी का इंतजाम हुआ और न ही देखभाल की गई।

निगरानी का तंत्र भी नाकाम
जिले में इस योजना की निगरानी के लिए ग्राम विकास अधिकारी से लेकर अधीक्षण अभियंता तक को नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है। काम की समीक्षा के लिए प्लांटेशन आईडी तक बनाकर ट्रैकिंग सिस्टम बनाया गया। लेकिन यह पूरा तंत्र केवल कागजों तक सीमित रहा। पंचायतों को बजट मिला, काम का रिकॉर्ड तैयार हुआ, लेकिन स्थलीय निरीक्षण और देखभाल में लापरवाही होती रही।

क्या कहा जिम्मेदारों ने
विकास अधिकारी लवान का कहना है कि हाँ, सिगवाड़ा ग्राम पंचायत में पोधारोपण तो कराया था, लेकिन पौधे पानी में डूब गए जिसके चलते पौधे गल गए, इसलिए पौधे जीवित नहीं हैं। वहीं दौसा जिला परिषद के अधिशाषी अभियंता सीताराम मीणा ने बताया कि ग्राम पंचायतों में पौधशालाएं स्थापित की गई थीं, लेकिन उनकी वर्तमान में कुछ पौधे की बढ़िया नहीं है। उनका यह बयान साफ बताता है कि मॉनिटरिंग व्यवस्था कितनी लचर रही।

सूख गए पौधे, गांव के लोग मायूस
योजना की विफलता का असर सीधे गांवों पर पड़ा। गांवों के लोगों ने उम्मीद की थी कि पौधशालाओं से उन्हें औषधीय और फलदार पौधे आसानी से मिलेंगे। लेकिन ज्यादातर पंचायतों में सूखे पौधों और खाली गड्ढों के अलावा कुछ नहीं बचा। सूरजपुरा ग्राम पंचायत के ग्रामीणों का कहना है कि सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए थे, लेकिन ग्राम पंचायत में लाखों खर्च दर्शाने के बाद भी पौधरोपण तक नहीं हुआ। सरपंच सविता मीणा का कहना है कि पौधरोपण के लिए गड्डे खुदवा दिए गए थे और लाखों रूपये खर्च कर पौधों की सुरक्षा के लिए तारबंदी करवा दी गई थी, लेकिन दौसा वीडियो ने पौधरोपण नहीं करने दिया।



इसके चलते पौधशाला में दो हजार पौधे तैयार होने थे, लेकिन एक भी पौधा नहीं लगा। अब वहां खाली गड्डे ही नजर आ रहे हैं। गांव की महिलाओं ने बताया कि बच्चों के लिए फलदार पौधे लगाने का सपना अधूरा रह गया। हिगोटिया पंचायत के लोग भी मायूस हैं। उनका कहना है कि जिस जगह पौधशाला बनाई गई थी, वहां आज खरपतवार और झाड़ियां उग आई हैं। न पौधे हैं, न पानी की टंकी और न ही कोई चौकीदार। शुरुआत में मजदूरों से गड्ढे खुदवाए गए, पौधे लगाए गए, फोटो खिंचवाई गई और फिर सब कुछ ठप हो गया।

बीज बैंक का वादा भी अधूरा
योजना का एक अहम हिस्सा था, ग्राम पंचायत स्तर पर बीज बैंक बनाना। ग्रामीणों से कहा गया था कि वे आम, जामुन, पपीता जैसे फलों के बीज दान करें और उनसे पौधे तैयार हों। लेकिन जिले में एक भी पंचायत में यह बीज बैंक धरातल पर नहीं बन पाया। ग्रामीण बताते हैं कि बीज बैंक का नाम तो कई बार सुना, लेकिन कभी किसी को बीज जमा कराते नहीं देखा।

जली हुई टहनियां और खाली थेलियां
सूखी हुई टहनियां और खाली गड्डे पंचायत में पौधशाला योजना की असफलता की गवाही हैं।

पैसे खर्च, पर काम अधूरा.
प्रत्येक पंचायत को लाखों रुपए का बजट दिया गया था। शर्त यह थी कि पौधे कम से कम तीन साल तक सुरक्षित रहें। लेकिन जब जगह का सही चयन, पानी की आपूर्ति और सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं हो पाई, तो बजट का फायदा जमीन पर दिखाई नहीं दिया। पंचायतों में बजट का उपयोग गड्ढे खुदवाने, पौधे खरीदने और नर्सरी बैग भरने तक ही सिमट गया। बाद की देखभाल के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई। नतीजतन, पौधशालाएं शुरू होते ही सूख गईं।

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हरियाली का सपना अधूरा
जिले के लिए हरियाली केवल सुंदरता नहीं बल्कि जीवन का आधार है। खेती, पशुपालन और पर्यावरण संतुलन सब कुछ हरियाली पर टिका है। पौधशाला योजना का उद्देश्य था कि गांव आत्मनिर्भर हों और पौधों की कमी कभी न हो। लेकिन करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद यह सपना अधूरा रह गया।

 

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