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Prakash Singh Badal : सरपंच से सीएम बने...और फिर देश की सियासत की धुरी, कहा जाता था राजनीति का 'बाबा बोहड़'
Wed, 26 Apr 2023 05:31 AM IST
दुष्यंत शर्मा
सुरिंदर पाल, जालंधर
सुरिंदर पाल, जालंधर
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 26 Apr 2023 05:31 AM IST
सार
95 साल की उम्र तक सियासत में सक्रिय रहने के कारण उन्हें राजनीति का बाबा बोहड़ (दिग्गज) कहा जाता था। उन्होंने 20 साल की उम्र में 1947 में सरपंच का चुनाव जीतकर अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था।
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प्रकाश सिंह बादल।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
शिरोमणि अकाली दल के दिग्गज नेता व पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के निधन से पंजाब की राजनीति का एक बड़ा अध्याय खत्म हो गया है। 95 साल की उम्र तक सियासत में सक्रिय रहने के कारण उन्हें राजनीति का बाबा बोहड़ (दिग्गज) कहा जाता था। उन्होंने 20 साल की उम्र में 1947 में सरपंच का चुनाव जीतकर अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था। इसके बाद वह पांच बार पंजाब का सीएम बने।
खास बात यह है सबसे कम उम्र में सीएम बनने और सबसे अधिक उम्र में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का रिकॉर्ड भी उनके नाम है। प्रकाश सिंह बादल 1970 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो वह देश में सबसे कम उम्र यानी 43 साल के किसी राज्य के मुख्यमंत्री थे। 2012 में जब वह पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने तो वह देश के सबसे उम्रदराज मुख्यमंत्री बने और अब 2022 के चुनावी मैदान में उतरे तो सबसे ज्यादा उम्र के प्रत्याशी थे। बादल 10 बार विधानसभा तक पहुंचे। राजनीति के हर दांव पेच के माहिर प्रकाश सिंह बादल ने अपने जीवन के अधिकतर विधानसभा चुनाव मुक्तसर लंबी सीट से लड़े। हालांकि, 2022 के आखिरी विधानसभा चुनाव में हार गए थे।
1957 में वह पहली बार पंजाब विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। 1969 में प्रकाश सिंह बादल फिर से विधानसभा के लिए चुने गए और गुरनाम सिंह की सरकार में उन्हें सामुदायिक विकास, पंचायती राज, पशु पालन, डेरी और मत्स्य पालन मंत्रालय का कार्यभार दिया गया। इसके बाद 1996 से 2008 तक अकाली दल के अध्यक्ष भी रहे।
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हिंदू-सिख भाईचारे के प्रतीक
: लंबे समय तक भाजपा के साथ गठबंधन करने वाले प्रकाश सिंह बादल हिंदू-सिख भाईचारे के प्रतीक भी थे। 1996 में भाजपा और अकाली दल करीब आए और 1997 के विधानसभा चुनाव में पहली बार गठबंधन कर चुनाव लड़े। 1997 में बादल ने राज्य के 28वें मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यभार संभाला और उन्होंने 2007 चौथी बार और 2012 में पांचवीं बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली।
1959 में हुआ था विवाह
प्रकाश सिंह बादल का जन्म 8 दिसंबर 1927 को पंजाब में मुक्तसर के एक गांव अबुल खुराना में हुआ था। पिता का नाम रघुराज और मां का नाम सुंदरी कौर था। 1959 में उन्होंने सुरिंदर कौर से शादी की। बेटी परनीत की शादी आदेश प्रताप सिंह कैरों से हुई, जो कि पूर्व सीएम प्रताप कैरों के बेटे हैं। बादल की पत्नी का 2011 में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था, वह उनकी राजनीतिक सलाहकार व रीढ़ की हड्डी मानी जाती थी।
मोरारजी सरकार में ढाई माह कृषि मंत्री रहे
साल 1977 में केंद्र की मोरारजी देसाई की सरकार में वह करीब ढाई महीने तक कृषि और किसान कल्याण मंत्री भी रहे। बादल ने पहली बार 1970 में राज्य के 15वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली, इसके बाद 1977 में वे राज्य के 19वें मुख्यमंत्री बने। बीस साल के बाद फिर उन्हें सत्ता की कमान ली, लेकिन इस बार बीजेपी के साथ गठबंधन करने का सियासी फल मिला था। यानी पंजाब में आतंकवाद के खात्मे के बाद 1997 में वह भाजपा अकाली दल गठबंधन की तरफ से पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। 1992 में चुनाव का बहिष्कार : साल 1957 के अलावा 1969 से वह लगातार राज्य विधानसभा के चुनाव जीतते रहे, लेकिन 1992 में वह विधायक नहीं बने, क्योंकि उस साल शिअद ने चुनाव का बहिष्कार किया था।
पीएम बनने पर मोदी ने पैर छूकर लिया था बादल से आशीर्वाद
प्रकाश सिंह बादल की छवि इतनी दमदार थी कि भाजपा के दिग्गज उनके पास दौड़े चले आते थे। केंद्रीय मंत्री राजनाथ हों या फिर दिवंगत मदन लाल खुराना, साहब सिंह वर्मा, सुषमा स्वराज और अरुण जेतली सभी प्रकाश सिंह बादल को परिवार के मुखिया जैसा सम्मान देते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी जब प्रकाश सिंह बादल से मिले तो उनका पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
शिरोमणि अकाली दल ने 2014 में केंद्र में बीजेपी के साथ मिलकर एनडीए की सरकार बनाई। 2015 में उनको देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। हालांकि 2020 में कृषि कानूनों के विरोध में न सिर्फ उनकी पार्टी की राहें बीजेपी से जुदा हो गईं, बादल ने भी अपना पद्म विभूषण लौटा दिया। सम्मान वापसी की बात करते हुए बादल ने चिट्ठी में लिखा कि मैं इतना गरीब हूं कि मेरे पास किसानों के लिए त्यागने को कुछ नहीं है, लिहाजा मैं ये सम्मान वापस कर रहा हूं।
प्रशासन, पंथक व पार्टी पर रही मजबूत पकड़
पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने एक बार अकाली दल की कमान संभाली तो उन्होंने पार्टी के भीतर किसी को सिर उठाने नहीं दिया। शिअद छोड़कर अगर किसी ने अलग अकाली दल बनाया तो वह सफल नहीं हो पाया। पंजाब की राजनीति में सुरजीत सिंह बरनाला, गुरचरण सिंह टोहडा, रविइंद्र सिंह, सिमरनजीत सिंह मान, सुखदेव सिंह ढींडसा, रंजीत सिंह ब्रह्मपुरा, कुलदीप सिंह वडाला जैसे कई नेताओं ने पार्टी छोड़कर अकाली दल का गठन करना चाहा लेकिन उनको मुंह की खानी पड़ी।
बादल ने एसजीपीसी से लेकर सरकार व अकाली दल बादल पर अपना पूरा कब्जा रखा । एसजीपीसी के प्रधान गुरचरण सिंह टोहड़ा ने बादल के खिलाफ सुर निकाला तो कि बादल ने ऐसा सियासी दांव चला कि गुरचरण सिंह टोहड़ा के हाथ से एसजीपीसी की कमान चली गई। टोहड़ा ने सर्वहिंद अकाली दल के नाम से अपना संगठन खड़ा किया तो वह बुरी तरह से फेल हो गया। आखिरकार टोहड़ा को वापस प्रकाश सिंह बादल की शरण में आना पड़ा। कुलदीप सिंह वडाला भी अकाली दल बादल से अलग हुए लेकिन बाद में उनको अपनी पार्टी का अकाली दल बादल में विलय करना पड़ा। ब्यूरो
चंडीगढ़ से बादल गांव तक जाएगी अंतिम यात्रा, कल एक बजे होगा संस्कार
पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल का अंतिम संस्कार 27 अप्रैल बृहस्पतिवार को उनके पैतृक गांव बादल में दोपहर एक बजे होगा। इससे पहले 26 अप्रैल को उनके पार्थिव शरीर को आम लोगों के दर्शनों के लिए सुबह 10 बजे चंडीगढ़ सेक्टर 28 स्थित शिरोमणि अकाली दल के कार्यालय में रखा जाएगा। इसके बाद दोपहर करीब 12 बजे उनकी अंतिम यात्रा शुरू होगी, जो राजपुरा, पटियाला, संगरूर, बरनाला, रामपुरा फूल, बठिंडा होते हुए गांव बादल पहुंचेगी।
आखिरी बार चप्पड़चिड़ी में प्रकाश सिंह बादल ने ली थी मुख्यमंत्री पद की शपथ
प्रकाश सिंह बादल ने साल 2012 में 84 साल की उम्र में पांचवीं बार मुख्ममंत्री पद की शपथ ली थी। यह शपथ उन्होंने मोहाली के चप्पड़चिड़ी स्थित फतेह मीनार के पास स्थित मैदान में शपथ ली थी। उस समय भाजपा और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन था। इस भव्य समारोह में शिअद, भाजपा और उनके सहयोगी दलों के नेता पहुंचे थे। चप्पड़चिड़ी को दुल्हन की तरह सजाया गया। इस दौरान प्रकाश सिंह बादल लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने 18 विधायकों के साथ शपथ ली थी। देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे, वह भी समारोह में शामिल हुए थे, जबकि नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा में थे और कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
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खास बात यह है सबसे कम उम्र में सीएम बनने और सबसे अधिक उम्र में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का रिकॉर्ड भी उनके नाम है। प्रकाश सिंह बादल 1970 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो वह देश में सबसे कम उम्र यानी 43 साल के किसी राज्य के मुख्यमंत्री थे। 2012 में जब वह पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने तो वह देश के सबसे उम्रदराज मुख्यमंत्री बने और अब 2022 के चुनावी मैदान में उतरे तो सबसे ज्यादा उम्र के प्रत्याशी थे। बादल 10 बार विधानसभा तक पहुंचे। राजनीति के हर दांव पेच के माहिर प्रकाश सिंह बादल ने अपने जीवन के अधिकतर विधानसभा चुनाव मुक्तसर लंबी सीट से लड़े। हालांकि, 2022 के आखिरी विधानसभा चुनाव में हार गए थे।
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1957 में वह पहली बार पंजाब विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। 1969 में प्रकाश सिंह बादल फिर से विधानसभा के लिए चुने गए और गुरनाम सिंह की सरकार में उन्हें सामुदायिक विकास, पंचायती राज, पशु पालन, डेरी और मत्स्य पालन मंत्रालय का कार्यभार दिया गया। इसके बाद 1996 से 2008 तक अकाली दल के अध्यक्ष भी रहे।
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हिंदू-सिख भाईचारे के प्रतीक
: लंबे समय तक भाजपा के साथ गठबंधन करने वाले प्रकाश सिंह बादल हिंदू-सिख भाईचारे के प्रतीक भी थे। 1996 में भाजपा और अकाली दल करीब आए और 1997 के विधानसभा चुनाव में पहली बार गठबंधन कर चुनाव लड़े। 1997 में बादल ने राज्य के 28वें मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यभार संभाला और उन्होंने 2007 चौथी बार और 2012 में पांचवीं बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली।
1959 में हुआ था विवाह
प्रकाश सिंह बादल का जन्म 8 दिसंबर 1927 को पंजाब में मुक्तसर के एक गांव अबुल खुराना में हुआ था। पिता का नाम रघुराज और मां का नाम सुंदरी कौर था। 1959 में उन्होंने सुरिंदर कौर से शादी की। बेटी परनीत की शादी आदेश प्रताप सिंह कैरों से हुई, जो कि पूर्व सीएम प्रताप कैरों के बेटे हैं। बादल की पत्नी का 2011 में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था, वह उनकी राजनीतिक सलाहकार व रीढ़ की हड्डी मानी जाती थी।
मोरारजी सरकार में ढाई माह कृषि मंत्री रहे
साल 1977 में केंद्र की मोरारजी देसाई की सरकार में वह करीब ढाई महीने तक कृषि और किसान कल्याण मंत्री भी रहे। बादल ने पहली बार 1970 में राज्य के 15वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली, इसके बाद 1977 में वे राज्य के 19वें मुख्यमंत्री बने। बीस साल के बाद फिर उन्हें सत्ता की कमान ली, लेकिन इस बार बीजेपी के साथ गठबंधन करने का सियासी फल मिला था। यानी पंजाब में आतंकवाद के खात्मे के बाद 1997 में वह भाजपा अकाली दल गठबंधन की तरफ से पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। 1992 में चुनाव का बहिष्कार : साल 1957 के अलावा 1969 से वह लगातार राज्य विधानसभा के चुनाव जीतते रहे, लेकिन 1992 में वह विधायक नहीं बने, क्योंकि उस साल शिअद ने चुनाव का बहिष्कार किया था।
पीएम बनने पर मोदी ने पैर छूकर लिया था बादल से आशीर्वाद
प्रकाश सिंह बादल की छवि इतनी दमदार थी कि भाजपा के दिग्गज उनके पास दौड़े चले आते थे। केंद्रीय मंत्री राजनाथ हों या फिर दिवंगत मदन लाल खुराना, साहब सिंह वर्मा, सुषमा स्वराज और अरुण जेतली सभी प्रकाश सिंह बादल को परिवार के मुखिया जैसा सम्मान देते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी जब प्रकाश सिंह बादल से मिले तो उनका पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
शिरोमणि अकाली दल ने 2014 में केंद्र में बीजेपी के साथ मिलकर एनडीए की सरकार बनाई। 2015 में उनको देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। हालांकि 2020 में कृषि कानूनों के विरोध में न सिर्फ उनकी पार्टी की राहें बीजेपी से जुदा हो गईं, बादल ने भी अपना पद्म विभूषण लौटा दिया। सम्मान वापसी की बात करते हुए बादल ने चिट्ठी में लिखा कि मैं इतना गरीब हूं कि मेरे पास किसानों के लिए त्यागने को कुछ नहीं है, लिहाजा मैं ये सम्मान वापस कर रहा हूं।
प्रशासन, पंथक व पार्टी पर रही मजबूत पकड़
पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने एक बार अकाली दल की कमान संभाली तो उन्होंने पार्टी के भीतर किसी को सिर उठाने नहीं दिया। शिअद छोड़कर अगर किसी ने अलग अकाली दल बनाया तो वह सफल नहीं हो पाया। पंजाब की राजनीति में सुरजीत सिंह बरनाला, गुरचरण सिंह टोहडा, रविइंद्र सिंह, सिमरनजीत सिंह मान, सुखदेव सिंह ढींडसा, रंजीत सिंह ब्रह्मपुरा, कुलदीप सिंह वडाला जैसे कई नेताओं ने पार्टी छोड़कर अकाली दल का गठन करना चाहा लेकिन उनको मुंह की खानी पड़ी।
बादल ने एसजीपीसी से लेकर सरकार व अकाली दल बादल पर अपना पूरा कब्जा रखा । एसजीपीसी के प्रधान गुरचरण सिंह टोहड़ा ने बादल के खिलाफ सुर निकाला तो कि बादल ने ऐसा सियासी दांव चला कि गुरचरण सिंह टोहड़ा के हाथ से एसजीपीसी की कमान चली गई। टोहड़ा ने सर्वहिंद अकाली दल के नाम से अपना संगठन खड़ा किया तो वह बुरी तरह से फेल हो गया। आखिरकार टोहड़ा को वापस प्रकाश सिंह बादल की शरण में आना पड़ा। कुलदीप सिंह वडाला भी अकाली दल बादल से अलग हुए लेकिन बाद में उनको अपनी पार्टी का अकाली दल बादल में विलय करना पड़ा। ब्यूरो
चंडीगढ़ से बादल गांव तक जाएगी अंतिम यात्रा, कल एक बजे होगा संस्कार
पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल का अंतिम संस्कार 27 अप्रैल बृहस्पतिवार को उनके पैतृक गांव बादल में दोपहर एक बजे होगा। इससे पहले 26 अप्रैल को उनके पार्थिव शरीर को आम लोगों के दर्शनों के लिए सुबह 10 बजे चंडीगढ़ सेक्टर 28 स्थित शिरोमणि अकाली दल के कार्यालय में रखा जाएगा। इसके बाद दोपहर करीब 12 बजे उनकी अंतिम यात्रा शुरू होगी, जो राजपुरा, पटियाला, संगरूर, बरनाला, रामपुरा फूल, बठिंडा होते हुए गांव बादल पहुंचेगी।
आखिरी बार चप्पड़चिड़ी में प्रकाश सिंह बादल ने ली थी मुख्यमंत्री पद की शपथ
प्रकाश सिंह बादल ने साल 2012 में 84 साल की उम्र में पांचवीं बार मुख्ममंत्री पद की शपथ ली थी। यह शपथ उन्होंने मोहाली के चप्पड़चिड़ी स्थित फतेह मीनार के पास स्थित मैदान में शपथ ली थी। उस समय भाजपा और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन था। इस भव्य समारोह में शिअद, भाजपा और उनके सहयोगी दलों के नेता पहुंचे थे। चप्पड़चिड़ी को दुल्हन की तरह सजाया गया। इस दौरान प्रकाश सिंह बादल लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने 18 विधायकों के साथ शपथ ली थी। देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे, वह भी समारोह में शामिल हुए थे, जबकि नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा में थे और कार्यक्रम में शामिल हुए थे।