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विरासत के फख्र को लोक चेतना का हिस्सा न बनाने वाली कौमें हो जाती हैं अलोपः ढींढसा
ब्यूरो, अमर उजाला, पटियाला
Updated Sat, 24 Dec 2016 03:14 PM IST
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पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी में आयोजित सेमिनार में पुस्तक रिलीज करते वीसी डा. जसपाल सिंह व साथ में अन्य।
- फोटो : अमर उजाला
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अपनी कौम के स्थापित ऐतिहासिक प्रसंगों की महानता को सामने लाना और उसको जन साधारण की चेतना का हिस्सा बना देना जागती कौमों की निशानी होता है। जिन कौमों ने विरासत के फख्र को लोक चेतना का हिस्सा नहीं बनाया, वह धीरे-धीरे अलोप हो जाती हैं। यह विचार पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखदेव सिंह ढींढसा ने पंजाबी यूनिवर्सिटी की ओर से डा. सरबजिंदर सिंह चेयरमैन भाई गुरदास चेयर की अगुवाई में कराए सेमिनार को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
वीसी डा. जसपाल सिंह ने कहा कि दशम पातशाह हजूर श्री गुरु गोबिंद सिंह के 350 साला प्रकाशोत्सव को सिख संसार बहुत उत्साह के साथ मना रहा है। सेमिनार कोआर्डिनेटर डा. सरबजिंदर सिंह ने कहा कि श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन काल कुल 42 वर्ष का है।
डा. पृथीपाल सिंह कपूर ने कहा कि 9 साल की उम्र में पिता को शहादत की तरफ मोड़ देना और 1688 से लेकर 1699 ईस्वी पहाडी राज्यों और मुगलई सल्तनत की दंभी चालों का जवाब देने के लिए जंगे मैदान में उतरना और 1699 ईस्वी की वैसाखी को खालसा के सृजन, सिख धर्म की अलग व अनूठी पहचान का मूल आधार है।
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डा. रमाकांत अंगरीश ने कहा कि खालसा के सृजन से लेकर 1708 ईस्वी तक आनंदपुर धर्म युद्ध का अखाड़ा बना रहा। गुरु साहिब ने अपने साजे खालसा के साथ दुष्ट दोषियों के खात्मे और धर्म का राज स्थापित करने के लिए हिंदू राजाओं और मुगल हुकूमत के साथ सख्त टक्कर ली।
डा. मोहम्मद सुलेमान खुरशीद आलिया यूनिवर्सिटी कोलकाता ने कहा कि बांगला में गुरु गोबिंद सिंह के संबंध में रचे साहित्य पर पूरी गंभीरता के साथ निरीक्षण की आवश्यकता है।
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वीसी डा. जसपाल सिंह ने कहा कि दशम पातशाह हजूर श्री गुरु गोबिंद सिंह के 350 साला प्रकाशोत्सव को सिख संसार बहुत उत्साह के साथ मना रहा है। सेमिनार कोआर्डिनेटर डा. सरबजिंदर सिंह ने कहा कि श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन काल कुल 42 वर्ष का है।
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डा. पृथीपाल सिंह कपूर ने कहा कि 9 साल की उम्र में पिता को शहादत की तरफ मोड़ देना और 1688 से लेकर 1699 ईस्वी पहाडी राज्यों और मुगलई सल्तनत की दंभी चालों का जवाब देने के लिए जंगे मैदान में उतरना और 1699 ईस्वी की वैसाखी को खालसा के सृजन, सिख धर्म की अलग व अनूठी पहचान का मूल आधार है।
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डा. रमाकांत अंगरीश ने कहा कि खालसा के सृजन से लेकर 1708 ईस्वी तक आनंदपुर धर्म युद्ध का अखाड़ा बना रहा। गुरु साहिब ने अपने साजे खालसा के साथ दुष्ट दोषियों के खात्मे और धर्म का राज स्थापित करने के लिए हिंदू राजाओं और मुगल हुकूमत के साथ सख्त टक्कर ली।
डा. मोहम्मद सुलेमान खुरशीद आलिया यूनिवर्सिटी कोलकाता ने कहा कि बांगला में गुरु गोबिंद सिंह के संबंध में रचे साहित्य पर पूरी गंभीरता के साथ निरीक्षण की आवश्यकता है।