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पंजाबी यूनिवर्सिटी ने की जहरीली मशरूम प्रजातियों की पहचान बारे में शोध
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पटियाला। जंगली मशरूम की कौन सी प्रजातियां खाने से शरीर के अंदर जहर फैल सकता है और मौत हो सकती है। इस बारे में अब पंजाबी यूनिवर्सिटी के फोरेंसिक साइंस विभाग से डा. राजिंदर सिंह की अगुवाई में डा. सपरीहा शर्मा की ओर से किए गए पीएचडी शोध कार्य दौरान अहम नतीजे सामने आए हैं। उत्तर पश्चिमी हिमालय के पहाड़ों में प्राप्त मशरूम की कई प्रजातियों के नमूनों को इस खोज का आधार बनाया गया है। शोधकर्ता डा. सपरीहा ने बताया कि बारिश के मौसम दौरान हर साल देश भर के विभिन्न इलाकों में जहरीली प्रजाति की मशरूम का इस्तेमाल करने से हुई मौतों बारे रिपोर्ट सामने आती है।
बहुत सारे केसों में यह रहस्य ही बना रहता है कि क्या असलियत में ही संबंधित मौत मशरूम खाने से हुई है या कोई अन्य कारण है। ऐसी स्थिति में कानून या न्याय की दृष्टि से भी कई किस्म की उलझनें पैदा हो जाती हैं। अगर मौत वास्तव में ही मशरूम खाने से हुई हो तो इस बात की निशानदेही करनी भी संभव नहीं होती है, कौन की प्रजाति की मशरूम मौत का कारण बनी है। इस सारी स्थिति को ध्यान में रखकर यह शोध कार्य शुरू किया गया था।
डा. सपरीहा ने अमर उजाला से बात करते बताया कि उन्होंने इस खोज कार्य दौरान उत्तर पश्चिमी हिमालय क्षेत्रों से संबंधित जंगली मशरूम की विभिन्न किस्मों के नमूने इकट्ठे किए थे। इन विभिन्न नमूनों पर प्रयोगशाला में अलग-अलग किस्म के वैज्ञानिक प्रयोग किए गए। जिसके बहुत अहम नतीजे निकल कर सामने आए हैं। डा. राजिंदर सिंह ने बताया कि इस शोध दौरान मशरूम प्रजातियों के विभिन्न नमूनों को अलग-अलग ढंग जैसे उबाल देने, तलने या बेकिंग और ग्रिलिंग आदि विधियों जरिये गर्माहट दी जाती थी और फिर प्राप्त होने वाले नतीजों पर प्रयोगशाला में काम किया जाता था।
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उन्होंने कहा कि यह खोज फोरेंसिक विज्ञान और मेडिकल के क्षेत्र में मददगार साबित होगी, वहीं कानून व न्याय के नजरिये से ही उपयोगी साबित होगी। क्योंकि बहुत सारे केसों में अदालत में पेश किए जाने वाले केसों में ठोस सबूत न मिलने कारण मौत का रहस्य बरकरार रहता है। आगे कहा कि किसी भी मौत के केस में न्याय लेने को अदालत में मौत के कारण संबंधी ठोस दलील व सबूत के आधार पर सिद्ध करना होता है। अक्सर इंसानी शरीर में से उल्टी के रूप में प्राप्त हुए संबंधित कणों व इनमें शामिल मशरूम प्रजाति आदि बारे पहचान करना असंभव बना रहता है।
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बहुत सारे केसों में यह रहस्य ही बना रहता है कि क्या असलियत में ही संबंधित मौत मशरूम खाने से हुई है या कोई अन्य कारण है। ऐसी स्थिति में कानून या न्याय की दृष्टि से भी कई किस्म की उलझनें पैदा हो जाती हैं। अगर मौत वास्तव में ही मशरूम खाने से हुई हो तो इस बात की निशानदेही करनी भी संभव नहीं होती है, कौन की प्रजाति की मशरूम मौत का कारण बनी है। इस सारी स्थिति को ध्यान में रखकर यह शोध कार्य शुरू किया गया था।
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डा. सपरीहा ने अमर उजाला से बात करते बताया कि उन्होंने इस खोज कार्य दौरान उत्तर पश्चिमी हिमालय क्षेत्रों से संबंधित जंगली मशरूम की विभिन्न किस्मों के नमूने इकट्ठे किए थे। इन विभिन्न नमूनों पर प्रयोगशाला में अलग-अलग किस्म के वैज्ञानिक प्रयोग किए गए। जिसके बहुत अहम नतीजे निकल कर सामने आए हैं। डा. राजिंदर सिंह ने बताया कि इस शोध दौरान मशरूम प्रजातियों के विभिन्न नमूनों को अलग-अलग ढंग जैसे उबाल देने, तलने या बेकिंग और ग्रिलिंग आदि विधियों जरिये गर्माहट दी जाती थी और फिर प्राप्त होने वाले नतीजों पर प्रयोगशाला में काम किया जाता था।
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उन्होंने कहा कि यह खोज फोरेंसिक विज्ञान और मेडिकल के क्षेत्र में मददगार साबित होगी, वहीं कानून व न्याय के नजरिये से ही उपयोगी साबित होगी। क्योंकि बहुत सारे केसों में अदालत में पेश किए जाने वाले केसों में ठोस सबूत न मिलने कारण मौत का रहस्य बरकरार रहता है। आगे कहा कि किसी भी मौत के केस में न्याय लेने को अदालत में मौत के कारण संबंधी ठोस दलील व सबूत के आधार पर सिद्ध करना होता है। अक्सर इंसानी शरीर में से उल्टी के रूप में प्राप्त हुए संबंधित कणों व इनमें शामिल मशरूम प्रजाति आदि बारे पहचान करना असंभव बना रहता है।