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Mohali News: 32 साल पुराने दो फर्जी एनकाउंटर में तत्कालीन थानेदार और एसआई दोषी, सजा चार फरवरी को

Sat, 01 Feb 2025 01:56 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 01 Feb 2025 01:56 AM IST
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The then SHO and SI found guilty in two 32-year-old fake encounters, sentenced on February 4
मोहाली। 32 साल पहले छुट्टी पर आए फौजी और एक नाबालिग को आतंकवादी बताकर फर्जी एनकाउंटर करने के मामले में 32 साल बाद अब इंसाफ मिला है। सीबीआई की विशेष अदालत ने सुनवाई करते हुए इस मामले में तत्कालीन थानेदार और एसआई को दोषी करार दिया है। दोनों को चार फरवरी को सजा सुनाई जाएगी।
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साल-1992 के इस फर्जी एनकाउंटर मामले की सुनवाई सीबीआई की विशेष अदालत में हुई। अदालत ने बचाव पक्ष एवं सरकारी वकील की दलीलें सुनकर तत्कालीन थानेदार मजीठा पुरुषोत्तम सिंह और एसआई गुरभिंदर सिंह को दोषी करार दिया है। डीएसपी एसएस सिद्धू (रिटायर्ड एसएसपी) और इंस्पेक्टर चमन लाल (रिटायर्ड एसपी) को आरोप साबित नहीं हो पाने और संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है।
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दोषियों पर लखविंदर सिंह लक्खा उर्फ फोर्ड और फौजी बलदेव सिंह देबा निवासी भैणी बासकरे जिला अमृतसर की हत्या करने और साजिश रचने के आरोप थे। फौजी बलदेव सिंह की जब हत्या हुई उस समय वह फौज से छुट्टी पर आए थे। लखविंदर सिंह खेतीबाड़ी का काम करता था। इस मामले में पीड़ित परिवार ने कहा कि 32 साल बाद उन्हें न्याय मिला है।
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बचाव पक्ष के वकील ने अदालत में दावा किया था कि उक्त दोनों कट्टर आतंकवादी थे। जिनके सिर पर इनाम भी था। वह हत्या, जबरन वसूली, डकैती जैसे सैकड़ों मामलों में वांछित थे। अदालत को बताया कि वह हरभजन सिंह उर्फ शिंदी (पंजाब की बेअंत सिंह सरकार में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री गुरमेज सिंह) के बेटे की हत्या में शामिल थे। 30 अगस्त 1999 को सीबीआई ने एसएस सिद्धू, हरभजन सिंह, मोहिंदर सिंह, पुरुषोत्तम लाल, चमन लाल, गुरभिंदर सिंह, मोहन सिंह, पुरुषोत्तम सिंह और जस्सा सिंह के खिलाफ अपहरण, आपराधिक साजिश, हत्या, झूठे रिकॉर्ड तैयार करने के लिए चार्जशीट दायर की।

गवाहों के बयान-2022 के बाद दर्ज किए गए। क्योंकि इस अवधि के दौरान उच्च न्यायालयों के आदेशों पर मामला स्थगित रहा। पीड़ित परिवार के वकील सरबजीत सिंह वेरका ने कहा कि हालांकि सीबीआई ने इस मामले में 37 गवाहों का हवाला दिया था, पर मुकदमे के दौरान केवल 19 गवाहों के बयान दर्ज किए गए हैं, क्योंकि सीबीआई द्वारा उद्धृत अधिकांश गवाहों की देरी से सुनवाई के दौरान मृत्यु हो गई थी। इस विलंबित मुकदमे के दौरान आरोपी हरभजन सिंह, मोहिंदर सिंह, पुरुषोत्तम लाल, मोहन सिंह और जस्सा सिंह की मौत हो गई थी। आरोपी एसएस सिद्धू तत्कालीन डीएसपी अमृतसर, चमन लाल तत्कालीन सीआईए इंचार्ज अमृतसर, गुरभिंदर सिंह तत्कालीन एसएचओ पीएस मजीठा और एएसआई पुरुषोत्तम सिंह ने इस मामले में मुकदमे का सामना किया।

यह था मामला

अमृतसर जिले के भैणी बासकरे के फौजी जवान बलदेव सिंह देवा को जब वह छुट्टी आया हुआ था। पुलिस ने उसे कट्टर आतंकवादी बताकर अवैध हिरासत में ले लिया था। इसके बाद झूठा पुलिस मुकाबला दिखाकर उसकी हत्या कर दी थी। दूसरा मामला 16 साल के नाबालिग लखिवदंर सिंह की हत्या से जुड़ा है, इसे भी कट्टर आतंकवादी बताकर घर से उठाकर उसकी हत्या कर दी गई थी। इसके बाद उसका कोई सुराग नहीं लग पाया था। काफी समय तक परिवार वाले उनकी तलाश करते रहे। उन्होंने इस मामले में अदालत में आखिर तक जंग लड़ी।


पुलिस ने बनाई थी यह कहानी

पुलिस की कहानी अनुसार मंत्री के बेटे की हत्या 23 जुलाई 1992 को हुई थी। पुलिस स्टेशन छेहरटा की पुलिस ने 12 सितंबर 1992 को मंत्री के बेटे की हत्या के मामले में बलदेव सिंह उर्फ देबा की गिरफ्तारी दिखाई गई थी। पुलिस ने कहानी गढ़ी कि 13 सितंबर 1992 को हथियार व गोला -बारूद की बरामदगी के लिए बलदेव सिंह उर्फ देबा को गांव संसारा के पास ले जाते समय पुलिस पार्टी पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया। मुठभेड़ दौरान बलदेव सिंह उर्फ देबा और एक हमलावर को गोली लगने से उनकी हत्या हो गई थी। हमलावर की पहचान बाद में पुलिस ने लखविंदर सिंह उर्फ लक्खा उर्फ फोर्ड के रूप में करवाई थी। इस मामले की सीबीआई जांच 1995 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शुरू हुई थी।
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