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यूक्रेन से लौटे विद्यार्थियों को मेडिकल कॉलेजों में दाखिला दे सरकार
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मोहाली। यूक्रेन में युद्ध से बने हालातों के बाद एमबीबीएस की पढ़ाई छोड़कर देश पहुंचे विद्यार्थियों के पक्ष में पंजाब के पूर्व सेहतमंत्री एवं विधायक बलबीर सिंह सिद्धू आगे आए हैं। उन्होंने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है कि यूक्रेन से लौटे विद्यार्थियों को देश के सरकारी और गैर सरकारी मेडिकल कॉलजों में मुफ्त दाखिला दिया जाए। जिससे उनकी पढ़ाई किसी भी कीमत पर प्रभावित न हो। उन्होंने कहा कि पहले ही मुश्किल में चल रहे इन विद्यार्थियों से कोई फीस न ली जाए। इस संबंधी सरकार अपने स्तर पर उचित इंतजाम करे।
उन्होंने यह भी लिखा है कि एक अंदाजे के मुताबिक 19 हजार विद्यार्थी पढ़ाई के लिए यूक्रेन गए थे। इनमें सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की है। यह विद्यार्थी डॉक्टर, नर्सिंग और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए गए थे। इनमें से कुछ आखिरी साल में पढ़ रहे हैं। जिन्होंने अभी वहां दाखिले लिए थे, वह सभी वापस आ रहे हैं और उनका भविष्य खतरे में है। वह इसलिए विदेश पढ़ने जाते हैं क्योंकि अपने देश में मेडिकल की पढ़ाई का खर्च बहुत अधिक है, जबकि कॉलेज कम हैं। कई विद्यार्थियों के तो छह में से एक-दो साल ही पढ़ाई के बचे हैं। उनकी इंटर्नशिप का मामला फंसा हुआ है। उक्त विद्यार्थियों को अब यूक्रेन की तरह अपना भविष्य अंधकार में नजर आ रहा है। वहां स्थिति सुधरने में समय लगेगा। ऐसे में भारत सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाए।
रूस में पढ़ने गए विद्यार्थियों की भी मुश्किलें कम नहीं
सेहत मंत्री ने कहा कि रूस में पढ़ाई करने गए विद्यार्थियों की भी मुश्किलें कम नहीं हैं। जिस तरह रूस पर प्रतिबंध लग रहे हैं, ऐसे में यह देखना होगा कि रूस में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों की डिग्री को कितने देश स्वीकार करते हैं। ऐसे में भारत सरकार को उचित कदम उठाने चाहिए, जिससे रूस में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
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उन्होंने यह भी लिखा है कि एक अंदाजे के मुताबिक 19 हजार विद्यार्थी पढ़ाई के लिए यूक्रेन गए थे। इनमें सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की है। यह विद्यार्थी डॉक्टर, नर्सिंग और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए गए थे। इनमें से कुछ आखिरी साल में पढ़ रहे हैं। जिन्होंने अभी वहां दाखिले लिए थे, वह सभी वापस आ रहे हैं और उनका भविष्य खतरे में है। वह इसलिए विदेश पढ़ने जाते हैं क्योंकि अपने देश में मेडिकल की पढ़ाई का खर्च बहुत अधिक है, जबकि कॉलेज कम हैं। कई विद्यार्थियों के तो छह में से एक-दो साल ही पढ़ाई के बचे हैं। उनकी इंटर्नशिप का मामला फंसा हुआ है। उक्त विद्यार्थियों को अब यूक्रेन की तरह अपना भविष्य अंधकार में नजर आ रहा है। वहां स्थिति सुधरने में समय लगेगा। ऐसे में भारत सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाए।
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रूस में पढ़ने गए विद्यार्थियों की भी मुश्किलें कम नहीं
सेहत मंत्री ने कहा कि रूस में पढ़ाई करने गए विद्यार्थियों की भी मुश्किलें कम नहीं हैं। जिस तरह रूस पर प्रतिबंध लग रहे हैं, ऐसे में यह देखना होगा कि रूस में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों की डिग्री को कितने देश स्वीकार करते हैं। ऐसे में भारत सरकार को उचित कदम उठाने चाहिए, जिससे रूस में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
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