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न्यूनतम वेतन के अपने ही नियम को सरकार कच्चे अध्यापकों पर नहीं कर रही लागू
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मोहाली। मजदूर से भी कम वेतन पा रहे राज्य के 13000 कच्चे (अस्थायी) अध्यापक 11 दिनों से शिक्षा विभाग का घेराव करके बैठे हैं। इन दौरान दो बार आश्वासन देने के बावजूद शिक्षा मंत्री बैठक के लिए नहीं पहुंचे। हैरानी की बात यह है कि सरकार अपने द्वारा तय न्यूनतम वेतन के नियम को इन कच्चे अध्यापकों पर लागू क्यों नहीं कर रही। सरकार के रवैये से मायूस कच्चे अध्यापक अब मांगे पूरी होने तक संघर्ष के मूड में हैं। सरकार की तरफ से इन प्रदर्शनकारियों को मंगलवार तक का समय दिया गया है।
राज्य में इस समय 13000 कच्चे अध्यापक हैं। जो पांच श्रेणियों के तहत राज्य के सरकारी प्राइमरी स्कूलों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ये कच्चे अध्यापक शिक्षा प्रोवाइडर, ईजीएस, एआईई, एसटीआर व आईईवी श्रेणियों के तहत अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वर्ष 2003 में इन कच्चे अध्यापकों की नियुक्ति शुरू हुई थी, जो वर्ष 2011 तक चली। ईटीटी, एनटीटी या बीएड शिक्षित ये कच्चे अध्यापक एक मजदूर से भी कम वेतन पर काम कर रहे हैं। मूक-बधिर बच्चों को पढ़ाने वाले कच्चे अध्यापकों को मात्र 5500 रुपए प्रतिमाह वेतन मिल रहा है। इसी तरह प्राइमरी स्कूलों में सेवाएं दे रहे कच्चे अध्यापकों को 6000 रुपए प्रतिमाह व शिक्षा प्रोवाइडरों को अधिकतम 10000 रुपए प्रतिमाह वेतन मिल रहा है। जबकि छठे वेतन आयोग की सिफारिशें मंजूर होने पर सरकारी कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन 18000 रुपए प्रतिमाह हो जाएगा। ऐसे में सरकार के लिए शिक्षा के क्षेत्र में सेवाएं दे रहे इन कच्चे अध्यापकों के वेतन के अंतर को साफ समझा जा सकता है। कच्चे अध्यापकों की संघर्ष कमेटी के स्टेट कनीवनर दविंदर सिंह संधु कहते हैं कि सरकार की उपेक्षा झेलते हुए पिछले 18 सालों से कच्चे अध्यापक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनका कहना है कि जो वेतन कच्चे अध्यापकों को दिया जाता है उसमें एक परिवार को पालन पोषण करना संभव नहीं है। सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 11 दिनों से शिक्षा विभाग का घेराव करके बैठे इन कच्चे अध्यापकों को दो बार शिक्षा मंत्री ने बैठक के लिए बुलाया, लेकिन दोनों बार शिक्षा मंत्री विजय इंदर सिंगला बैठक के लिए नहीं पहुंचे। प्रदर्शनकारियों की बैठक आला अधिकारियों के साथ ही हुईं। जिन्होंने सरकार के पाले में गेंद डाल कर कच्चे अध्यापकों को आश्वासन ही दिया है। शुक्रवार को हुई बैठक में मंगलवार तक के लिए आश्वासन दिया गया है।
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बाक्स
वर्ष 2011 में कच्चे अध्यापकों की नियुक्ति बंद होने के बाद से ही इनका संघर्ष शुरू हो गया था। समान वेतन व नियमित किए जाने की मांग को लेकर कच्चे अध्यापक पिछले 10 सालों से संघर्ष कर रहे हैं। इस दौरान कई कच्चे अध्यापकों ने सरकार की अनदेखी से तंग आकर जान तक देने की कोशिश की। करीब एक हजार कच्चे अध्यापक तो नियमित होने के लिए संघर्ष करते हुए रिटायर भी हो चुके हैं और कई रिटायर होने वाले हैं। कच्चे अध्यापकों के संघर्ष की कुछ प्रमुख घटनाओं पर एक नजर डालते हैं।
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संघर्ष - वर्ष 2011 में एक एजुकेशन प्रोवाइडर ने बटाला में मरणव्रत शुरू किया।
असर - तत्कालीन अकाली सरकार में शिक्षा मंत्री सेवा सिंह सेखवां ने रेगुलर करने का वादा किया।
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संघर्ष - वर्ष 2015 में शिक्षिका हरप्रीत कौर सहित पांच प्रदर्शनकारी कच्चे अध्यापकों ने बठिंडा की नहर में छलांग लगा दी थी, जिन्हें बचा लिया गया था।
असर - कच्चे अध्यापकों की जत्थेबंदी के 15 पदाधिकारियों को 15 दिन जेल में बिताने पड़े।
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संघर्ष - वर्ष 2016 में शिक्षा विभाग के मोहाली स्थित मुख्यालय के सामने 2 महीने धरना दिया।
असर - 28 दिसंबर 2016 को मौजूदा मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने धरने में पहुंच कर सरकार बनने पर पहली कैबिनेट में रेगुलर करने का वादा किया।
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संघर्ष - वर्ष 2016 में समरजीत सिंह मानसा नाम के कच्चे अध्यापक ने बठिंडा में आत्मदाह किया।
असर - समरजीत सिंह 70 प्रतिशत जल गए थेे, लंबे इलाज के बाद जान बची, सरकार पर कोई असर नहीं।
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राज्य में इस समय 13000 कच्चे अध्यापक हैं। जो पांच श्रेणियों के तहत राज्य के सरकारी प्राइमरी स्कूलों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ये कच्चे अध्यापक शिक्षा प्रोवाइडर, ईजीएस, एआईई, एसटीआर व आईईवी श्रेणियों के तहत अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वर्ष 2003 में इन कच्चे अध्यापकों की नियुक्ति शुरू हुई थी, जो वर्ष 2011 तक चली। ईटीटी, एनटीटी या बीएड शिक्षित ये कच्चे अध्यापक एक मजदूर से भी कम वेतन पर काम कर रहे हैं। मूक-बधिर बच्चों को पढ़ाने वाले कच्चे अध्यापकों को मात्र 5500 रुपए प्रतिमाह वेतन मिल रहा है। इसी तरह प्राइमरी स्कूलों में सेवाएं दे रहे कच्चे अध्यापकों को 6000 रुपए प्रतिमाह व शिक्षा प्रोवाइडरों को अधिकतम 10000 रुपए प्रतिमाह वेतन मिल रहा है। जबकि छठे वेतन आयोग की सिफारिशें मंजूर होने पर सरकारी कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन 18000 रुपए प्रतिमाह हो जाएगा। ऐसे में सरकार के लिए शिक्षा के क्षेत्र में सेवाएं दे रहे इन कच्चे अध्यापकों के वेतन के अंतर को साफ समझा जा सकता है। कच्चे अध्यापकों की संघर्ष कमेटी के स्टेट कनीवनर दविंदर सिंह संधु कहते हैं कि सरकार की उपेक्षा झेलते हुए पिछले 18 सालों से कच्चे अध्यापक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनका कहना है कि जो वेतन कच्चे अध्यापकों को दिया जाता है उसमें एक परिवार को पालन पोषण करना संभव नहीं है। सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 11 दिनों से शिक्षा विभाग का घेराव करके बैठे इन कच्चे अध्यापकों को दो बार शिक्षा मंत्री ने बैठक के लिए बुलाया, लेकिन दोनों बार शिक्षा मंत्री विजय इंदर सिंगला बैठक के लिए नहीं पहुंचे। प्रदर्शनकारियों की बैठक आला अधिकारियों के साथ ही हुईं। जिन्होंने सरकार के पाले में गेंद डाल कर कच्चे अध्यापकों को आश्वासन ही दिया है। शुक्रवार को हुई बैठक में मंगलवार तक के लिए आश्वासन दिया गया है।
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वर्ष 2011 में कच्चे अध्यापकों की नियुक्ति बंद होने के बाद से ही इनका संघर्ष शुरू हो गया था। समान वेतन व नियमित किए जाने की मांग को लेकर कच्चे अध्यापक पिछले 10 सालों से संघर्ष कर रहे हैं। इस दौरान कई कच्चे अध्यापकों ने सरकार की अनदेखी से तंग आकर जान तक देने की कोशिश की। करीब एक हजार कच्चे अध्यापक तो नियमित होने के लिए संघर्ष करते हुए रिटायर भी हो चुके हैं और कई रिटायर होने वाले हैं। कच्चे अध्यापकों के संघर्ष की कुछ प्रमुख घटनाओं पर एक नजर डालते हैं।
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संघर्ष - वर्ष 2011 में एक एजुकेशन प्रोवाइडर ने बटाला में मरणव्रत शुरू किया।
असर - तत्कालीन अकाली सरकार में शिक्षा मंत्री सेवा सिंह सेखवां ने रेगुलर करने का वादा किया।
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संघर्ष - वर्ष 2015 में शिक्षिका हरप्रीत कौर सहित पांच प्रदर्शनकारी कच्चे अध्यापकों ने बठिंडा की नहर में छलांग लगा दी थी, जिन्हें बचा लिया गया था।
असर - कच्चे अध्यापकों की जत्थेबंदी के 15 पदाधिकारियों को 15 दिन जेल में बिताने पड़े।
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संघर्ष - वर्ष 2016 में शिक्षा विभाग के मोहाली स्थित मुख्यालय के सामने 2 महीने धरना दिया।
असर - 28 दिसंबर 2016 को मौजूदा मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने धरने में पहुंच कर सरकार बनने पर पहली कैबिनेट में रेगुलर करने का वादा किया।
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संघर्ष - वर्ष 2016 में समरजीत सिंह मानसा नाम के कच्चे अध्यापक ने बठिंडा में आत्मदाह किया।
असर - समरजीत सिंह 70 प्रतिशत जल गए थेे, लंबे इलाज के बाद जान बची, सरकार पर कोई असर नहीं।