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पहले अस्पताल की जिम्मेदारी फिर आती मां की ममता की बारी
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मोहाली। अस्पतालों में तैनात नर्सों के अंदर भी मां का दिल धड़कता है। उनके भी छोटे-छोटे बच्चों घरों में दिन-रात उनका इंतजार करते हैं लेकिन उन्हें यही सिखाया गया होता है कि उन्हें पहले अस्पतालों में जिम्मेदारी निभानी है, उसके बाद वह अपने बच्चों को मां की ममता दे पाती है।
कोरोना काल में तो यह चीज और भी अहम हो गई। इसके बाद भी वह अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। अमर उजाला ने डॉ. बीआर आंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ साइंसेज में तैनात उन नर्सों से बात की जो अपनी ड्यूटी के साथ मां की भूमिका निभा रही है।
मां की ममता के साथ पिता की जिम्मेदारी भी निभाई
मेरे पिता नर्सिंग डिपार्टमेंट में सरकारी नौकरी करते थे। पिता ने मुझे भी नर्सिंग की पढ़ाई करवाई। घर में बड़ी बेटी होने के नाते मां ने हमेशा चाहा कि मैं हर काम सीखूं। अपने 35 साल के जीवन में मां की भूमिका सबसे बड़ी जिम्मेदारी रही। वहीं इकलौती बेटी को भी चौबीसों घंटे वाली नौकरी के बीच संभाला। बेटी अपनी पढ़ाई पूरी कर ही रही थी कि पति ने 2019 में हम दोनों अलविदा कह दिया। ऐसे में मैं अस्पताल में ड्यूटी देती और बेटी अकेले घर पर रहती। उसका अकेलापन देखते हुए मैंने अकेले ही बेटी की शादी की। कोविड के समय में ड्यूटी के बाद की देखभाल की। हालांकि वह नहीं रहे और अब बेटी के सहारे ही जीवन चल रहा है। -परमिंदर कौर, हेड नर्स इंचार्ज
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कोविड ने छीन ली थीं मां बनने की खुशियां
तीन बेटियां होने के कारण मां को हमेशा कुछ न कुछ सुनने को मिलता था। हम तीनों बहनों ने पढ़ाई को अपना हथियार बनाते हुए हर मुकाम हासिल किया। मैं नर्स बनना चाहती थी। मां ने साथ नहीं छोड़ा और मैं दिन-रात मेहनत करते हुए दिल्ली एम्स तक जा पहुंची। इस दौरान मेरी शादी हो चुकी थी। कोरोना अभी शुरू ही हुआ था और इस बीच मैं मां बनने वाली थी और मेरी ड्यूटी कोविड वार्ड में लग गई। दिन-रात ड्यूटी देते हुए मेरा मिसकैरेज हो गया, बच्चे की दिल की धड़कन रुक गई। एक तरह से टूट-सी गई थी क्योंकि दिल्ली में अकेली थी। जैसे-तैसे खुद को संभाला। दिल्ली छोड़कर मैंने मोहाली मेडिकल कॉलेज में नौकरी ज्वाइन कर ली। इस दौरान मुझे फिर से मां बनने का मौका मिला। ड्यूटी के दौरान ही मुझे लेबर पेन हुआ। आज मेरी छह महीने की बेटी है। वहीं कुछ महीनों बाद ही मैं नौकरी पर लौट आई। अस्पताल आने से पहले बेटी को दो माताओं (यानी सास और जेठानी) के सहारे छोड़कर आती हूं। -कंचन, नर्सिंग ऑफिसर मोहाली मेडिकल कॉलेज
बेटी को देखने के लिए करना पड़ता था घंटों इंतजार
2004 मैं डॉक्टर बनना चाहती थी लेकिन नर्स बन गई। मुझे अपने काम पर गर्व है। एक आम परिवार में होते हुए मां का हमेशा सहयोग रहता है। मैंने एमएससी में दूसरा रैंक लिया था। नौकरी करते काफी अच्छा समय निकला। कितनी ही औरतों को मां बनते हुए देखा। 2017 में मेरी शादी हुई और 2018 में मेरे यहां बेटी ने जन्म लिया। कोविड शुरू हुआ तो मेरी ड्यूटी कोविड वार्ड में लगी। ऐसे में ससुराल का स्वभाव बदला। इस कारण मुझे अपनी ही बेटी से मिलने से पहले कई घंटों दूर रहना पड़ता। इन दो सालों में एहसास हुआ कि मेरी बेटी का ख्याल सिर्फ मैं ही रख रही हूं क्योंकि बेटी बीमार हो या घर का काम हो- इन सबके लिए मुझे ही जिम्मेदार समझा जाता है। ऐसे में भले ही सास-ससुर बेटी की पीछे से देखरेख करते है लेकिन जैसे ही घर जाती हूं तो बेटी को सिर्फ मैं ही देखती हूं। -मनप्रीत कौर
मां की वजह से यहां तक पहुंच पाई
मेरी मां एक शिक्षिका थी। वह रोज सुबह चार बजे उठकर हमें स्कूल के लिए तैयार करती। वहीं स्कूल से वापस आकर हमें स्कूल होमवर्क में मदद करती। मैंने उन्हें दिन-रात काम करते हुए ही देखा है। आज मैं अगर कामयाब डॉक्टर हूं तो अपनी मां के कारण। वहीं मेरे बड़े बेटे को भी उन्होंने ही पाला है। जब मैं मां बनी थी तो मुझे दो बार अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन छोड़नी पड़ी थी। एक दिन मैंने अपने आठ साल के बेटे से पूछा कि क्या में दो बच्चों का ख्याल रखूं या बहुत से बच्चों का तो उसने मुझे सबका ध्यान रखने को कहा। उस दिन मैंने मोहाली में फुल टाइम जॉब ले ली। आज जब मेरे बच्चे मुझसे पुछते है कि मां आप इतनी मेहनत क्यों करते हो तो मैं उन्हें जवाब देती हूं कि मैं नहीं करूगी तो और कौन करेगा। वहीं मेरी मां मेरे लिए आज भी प्रेरणा बनी हुई है। एक शिक्षिका होते हुए उन्होंने कितने ही हजारों बच्चों को ज्ञान बांटा है। ऐसे ही मैं अपने काम से लाखों लोगों की मदद कर पाती हूं जिससे मुझे खुशी मिलती है। -डॉक्टर तरनजोत कौर, ईएनटी स्पेशलिस्ट
मेरी मां के साथ रिश्ता बहुत प्यारा
मेरा मेरी मां के साथ बहुत प्यारा रिश्ता था। आज भले मेरा खुद का बच्चा नहीं है लेकिन मैं हजारों बच्चों की मां हूं, जो मेरे साथ काम करते है और जिन्हें मैं अदाकारी के गुण सिखाती हूं। मेरे मां के साथ मेरा 100 रुपये से जुड़ा रिश्ता है। वह कुछ ऐसे था कि मेरी मां हर तीज के त्योहार के समय मुझे मुट्ठी में बंद करके 100 रुपये देती थी और मरते वक्त तक ऐसा ही करते हुए इस दुनिया से अलविदा कह गई। वहीं आज जब मेरे छात्र अदाकारी में कामयाबी पाते हैं तो मैं उन्हें 1100 रुपये देकर अपना आशीर्वाद देती हूूं। साथ ही मैं उन्हें इस प्रथा को आगे ले जाने के लिए भी कहती हूं। वहीं कुछ दिन पहले ही मेरी शादी की 25वीं सालगिरह थी तो मैंने अपनी मां को याद करते हुए लाल रंग का जोड़ा पहना था। ऐसा लगा कि वो मेरे साथ ही है। -अनीता शब्दीश, पंजाबी फिल्म अभिनेत्री
मां ही सब, मां ही रब्ब
दुनिया में मां ही सबकुछ होती है। वह ही रब्ब का रूप होती है। उन्हें याद करते हुए आज भी आंख भर आती है। मुझे लगता है कि मां के बिना दुनिया बेरंग है। मां के गले लगकर सब दुख दूर हो जाते थे। वहीं मैं एक कलाकार होने से पहले एक समाजसेवी हूं। यह गुण मैंने मां से सीखा है। मैं बठिंडा के एक गांव से हूं। मां बहुत कम गुरुद्वारा साहिब जाती थी। उनका मानना था कि लोगों की सेवा ही धर्म है। गांव में किसी को भी जरूरत होती थी तो वह उनकी मदद करने रात में भी पहुंच जाती थी। लोग भी उनकी मदद लेने के लिए घर आते ही रहते थे। आज मेरा बेटा आस्ट्रेलिया में है। उसने मेरे लिए एक गाना लिखा है जिसमें मैंने ही एक्ट किया है। मेरे बेटे का कहना था कि वह मुझे ही इस गीत में देखना चाहता है। इसमें मैंने अदाकारी की है। वहीं मुझ से हर कोई पहले समय की मां और आज के समय के मां का अंतर पूछता है तो मैं उन्हें कहती हूं। मां की ममता में कोई कमी नहीं आई है। यह रिश्ता युगों तक ऐसा ही रहेगा लेकिन आजकल की कुछ माताएं बच्चों के साथ समय बिताना कम रही है जबकि आज की मां को बच्चों के साथ रहते हुए उन्हें समझना चाहिए ताकि प्यार का एहसास बच्चों में जगता रहे। -गुरप्रीत कौर भंगू, पंजाबी फिल्म अभिनेत्री
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कोरोना काल में तो यह चीज और भी अहम हो गई। इसके बाद भी वह अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। अमर उजाला ने डॉ. बीआर आंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ साइंसेज में तैनात उन नर्सों से बात की जो अपनी ड्यूटी के साथ मां की भूमिका निभा रही है।
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मां की ममता के साथ पिता की जिम्मेदारी भी निभाई
मेरे पिता नर्सिंग डिपार्टमेंट में सरकारी नौकरी करते थे। पिता ने मुझे भी नर्सिंग की पढ़ाई करवाई। घर में बड़ी बेटी होने के नाते मां ने हमेशा चाहा कि मैं हर काम सीखूं। अपने 35 साल के जीवन में मां की भूमिका सबसे बड़ी जिम्मेदारी रही। वहीं इकलौती बेटी को भी चौबीसों घंटे वाली नौकरी के बीच संभाला। बेटी अपनी पढ़ाई पूरी कर ही रही थी कि पति ने 2019 में हम दोनों अलविदा कह दिया। ऐसे में मैं अस्पताल में ड्यूटी देती और बेटी अकेले घर पर रहती। उसका अकेलापन देखते हुए मैंने अकेले ही बेटी की शादी की। कोविड के समय में ड्यूटी के बाद की देखभाल की। हालांकि वह नहीं रहे और अब बेटी के सहारे ही जीवन चल रहा है। -परमिंदर कौर, हेड नर्स इंचार्ज
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कोविड ने छीन ली थीं मां बनने की खुशियां
तीन बेटियां होने के कारण मां को हमेशा कुछ न कुछ सुनने को मिलता था। हम तीनों बहनों ने पढ़ाई को अपना हथियार बनाते हुए हर मुकाम हासिल किया। मैं नर्स बनना चाहती थी। मां ने साथ नहीं छोड़ा और मैं दिन-रात मेहनत करते हुए दिल्ली एम्स तक जा पहुंची। इस दौरान मेरी शादी हो चुकी थी। कोरोना अभी शुरू ही हुआ था और इस बीच मैं मां बनने वाली थी और मेरी ड्यूटी कोविड वार्ड में लग गई। दिन-रात ड्यूटी देते हुए मेरा मिसकैरेज हो गया, बच्चे की दिल की धड़कन रुक गई। एक तरह से टूट-सी गई थी क्योंकि दिल्ली में अकेली थी। जैसे-तैसे खुद को संभाला। दिल्ली छोड़कर मैंने मोहाली मेडिकल कॉलेज में नौकरी ज्वाइन कर ली। इस दौरान मुझे फिर से मां बनने का मौका मिला। ड्यूटी के दौरान ही मुझे लेबर पेन हुआ। आज मेरी छह महीने की बेटी है। वहीं कुछ महीनों बाद ही मैं नौकरी पर लौट आई। अस्पताल आने से पहले बेटी को दो माताओं (यानी सास और जेठानी) के सहारे छोड़कर आती हूं। -कंचन, नर्सिंग ऑफिसर मोहाली मेडिकल कॉलेज
बेटी को देखने के लिए करना पड़ता था घंटों इंतजार
2004 मैं डॉक्टर बनना चाहती थी लेकिन नर्स बन गई। मुझे अपने काम पर गर्व है। एक आम परिवार में होते हुए मां का हमेशा सहयोग रहता है। मैंने एमएससी में दूसरा रैंक लिया था। नौकरी करते काफी अच्छा समय निकला। कितनी ही औरतों को मां बनते हुए देखा। 2017 में मेरी शादी हुई और 2018 में मेरे यहां बेटी ने जन्म लिया। कोविड शुरू हुआ तो मेरी ड्यूटी कोविड वार्ड में लगी। ऐसे में ससुराल का स्वभाव बदला। इस कारण मुझे अपनी ही बेटी से मिलने से पहले कई घंटों दूर रहना पड़ता। इन दो सालों में एहसास हुआ कि मेरी बेटी का ख्याल सिर्फ मैं ही रख रही हूं क्योंकि बेटी बीमार हो या घर का काम हो- इन सबके लिए मुझे ही जिम्मेदार समझा जाता है। ऐसे में भले ही सास-ससुर बेटी की पीछे से देखरेख करते है लेकिन जैसे ही घर जाती हूं तो बेटी को सिर्फ मैं ही देखती हूं। -मनप्रीत कौर
मां की वजह से यहां तक पहुंच पाई
मेरी मां एक शिक्षिका थी। वह रोज सुबह चार बजे उठकर हमें स्कूल के लिए तैयार करती। वहीं स्कूल से वापस आकर हमें स्कूल होमवर्क में मदद करती। मैंने उन्हें दिन-रात काम करते हुए ही देखा है। आज मैं अगर कामयाब डॉक्टर हूं तो अपनी मां के कारण। वहीं मेरे बड़े बेटे को भी उन्होंने ही पाला है। जब मैं मां बनी थी तो मुझे दो बार अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन छोड़नी पड़ी थी। एक दिन मैंने अपने आठ साल के बेटे से पूछा कि क्या में दो बच्चों का ख्याल रखूं या बहुत से बच्चों का तो उसने मुझे सबका ध्यान रखने को कहा। उस दिन मैंने मोहाली में फुल टाइम जॉब ले ली। आज जब मेरे बच्चे मुझसे पुछते है कि मां आप इतनी मेहनत क्यों करते हो तो मैं उन्हें जवाब देती हूं कि मैं नहीं करूगी तो और कौन करेगा। वहीं मेरी मां मेरे लिए आज भी प्रेरणा बनी हुई है। एक शिक्षिका होते हुए उन्होंने कितने ही हजारों बच्चों को ज्ञान बांटा है। ऐसे ही मैं अपने काम से लाखों लोगों की मदद कर पाती हूं जिससे मुझे खुशी मिलती है। -डॉक्टर तरनजोत कौर, ईएनटी स्पेशलिस्ट
मेरी मां के साथ रिश्ता बहुत प्यारा
मेरा मेरी मां के साथ बहुत प्यारा रिश्ता था। आज भले मेरा खुद का बच्चा नहीं है लेकिन मैं हजारों बच्चों की मां हूं, जो मेरे साथ काम करते है और जिन्हें मैं अदाकारी के गुण सिखाती हूं। मेरे मां के साथ मेरा 100 रुपये से जुड़ा रिश्ता है। वह कुछ ऐसे था कि मेरी मां हर तीज के त्योहार के समय मुझे मुट्ठी में बंद करके 100 रुपये देती थी और मरते वक्त तक ऐसा ही करते हुए इस दुनिया से अलविदा कह गई। वहीं आज जब मेरे छात्र अदाकारी में कामयाबी पाते हैं तो मैं उन्हें 1100 रुपये देकर अपना आशीर्वाद देती हूूं। साथ ही मैं उन्हें इस प्रथा को आगे ले जाने के लिए भी कहती हूं। वहीं कुछ दिन पहले ही मेरी शादी की 25वीं सालगिरह थी तो मैंने अपनी मां को याद करते हुए लाल रंग का जोड़ा पहना था। ऐसा लगा कि वो मेरे साथ ही है। -अनीता शब्दीश, पंजाबी फिल्म अभिनेत्री
मां ही सब, मां ही रब्ब
दुनिया में मां ही सबकुछ होती है। वह ही रब्ब का रूप होती है। उन्हें याद करते हुए आज भी आंख भर आती है। मुझे लगता है कि मां के बिना दुनिया बेरंग है। मां के गले लगकर सब दुख दूर हो जाते थे। वहीं मैं एक कलाकार होने से पहले एक समाजसेवी हूं। यह गुण मैंने मां से सीखा है। मैं बठिंडा के एक गांव से हूं। मां बहुत कम गुरुद्वारा साहिब जाती थी। उनका मानना था कि लोगों की सेवा ही धर्म है। गांव में किसी को भी जरूरत होती थी तो वह उनकी मदद करने रात में भी पहुंच जाती थी। लोग भी उनकी मदद लेने के लिए घर आते ही रहते थे। आज मेरा बेटा आस्ट्रेलिया में है। उसने मेरे लिए एक गाना लिखा है जिसमें मैंने ही एक्ट किया है। मेरे बेटे का कहना था कि वह मुझे ही इस गीत में देखना चाहता है। इसमें मैंने अदाकारी की है। वहीं मुझ से हर कोई पहले समय की मां और आज के समय के मां का अंतर पूछता है तो मैं उन्हें कहती हूं। मां की ममता में कोई कमी नहीं आई है। यह रिश्ता युगों तक ऐसा ही रहेगा लेकिन आजकल की कुछ माताएं बच्चों के साथ समय बिताना कम रही है जबकि आज की मां को बच्चों के साथ रहते हुए उन्हें समझना चाहिए ताकि प्यार का एहसास बच्चों में जगता रहे। -गुरप्रीत कौर भंगू, पंजाबी फिल्म अभिनेत्री