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छपार मेले में सजेगी सियासी चौसर: मालवा की धरती से हुंकार भरेंगे दल, वारिस पंजाब दे ने बिछाई पहली बिसात

Mon, 14 Sep 2026 10:14 AM IST
Nivedita संवाद न्यूज एजेंसी, हलवारा
संवाद न्यूज एजेंसी, हलवारा Published by: Nivedita Updated Mon, 14 Sep 2026 10:14 AM IST
सार

पंजाब की राजनीति में मान्यता रही है कि चुनावी वर्ष में छपार मेले में जिस दल का शक्ति प्रदर्शन सबसे भारी दिखता है, मालवा के ग्रामीण इलाकों में उसकी हवा मजबूत मानी जाती है। 26 सितंबर को श्रद्धालु जहां गोगा माड़ी पर मन्नतें मांगेंगे, वहीं सियासी मंचों से पंजाब के राजनीतिक भविष्य के दावे तय किए जाएंगे।

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Punjab religious and cultural Chhapar Mela become first major arena for Political conferences September 26
छपार मेला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब का सुप्रसिद्ध धार्मिक व सांस्कृतिक छपार मेला इस बार चुनावी राजनीति का पहला बड़ा अखाड़ा बनने जा रहा है। 24 से 30 सितंबर तक आयोजित होने वाले इस ऐतिहासिक मेले में 26 सितंबर को राजनीतिक कांफ्रेंसें प्रस्तावित हैं। 
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मालवा की सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रहे सभी प्रमुख राजनीतिक दल इस मेले के जरिये अपना शक्ति प्रदर्शन करने की होड़ में लग गए हैं। यह मेला मालवा की राजनीतिक नब्ज और दलों की जमीनी ताकत का सबसे बड़ा परीक्षण साबित होगा।
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अकाली दल (वारिस पंजाब दे) ने राजनीतिक बिसात पर पहली चाल चली है। पार्टी ने गुग्गा माड़ी के सबसे नजदीक महंगी जमीन किराए पर लेकर अपना मंच सुरक्षित कर लिया है। पार्टी के मालवा जोन प्रभारी व दाखा से विधायक मनप्रीत सिंह अयाली कार्यकर्ताओं को लामबंद करने में जुट गए हैं।
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प्रमुख दलों की तैयारी
अकाली दल (बादल) के दाखा हलका इंचार्ज जसकरण सिंह देओल ने भी अपना मंच लगाने की तैयारी पूरी कर ली है। देओल को आगामी विधानसभा चुनाव में दाखा से पार्टी का संभावित चेहरा माना जा रहा है। ऐसे में छपार का यह मंच अयाली और देओल के बीच वर्चस्व की सीधी राजनीतिक जंग का केंद्र बन गया है। 

सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप), कांग्रेस, अकाली दल अमृतसर, अकाली दल पुनर्सुरजीत और वामपंथी दलों द्वारा भी जमीन तय किए जाने का इंतजार है। सभी दल ग्रामीण जनसमूह तक अपनी बात पहुंचाने के इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहते। 

सूत्रों के अनुसार, अकाली दल (बादल) के साथ संभावित राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए भाजपा इस बार छपार में अलग मंच लगाने से परहेज कर सकती है। यदि ऐसा होता है, तो यह अलग मौजूदगी के बजाय गठबंधन की राजनीति का बड़ा संकेत होगा। भाजपा का यह रुख अन्य दलों की रणनीति को भी प्रभावित कर सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस मेले में किस तरह अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है।


मेले का राजनीतिक महत्व
छपार मेले में भीड़ जुटाना और मंच सजाना अब भारी भरकम बजट का खेल बन चुका है। जमीन के किराए से लेकर टेंट, साउंड और कार्यकर्ताओं की लामबंदी पर लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। 
 
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