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भक्ति का प्रचार न करें : पं. नवराज
Ludhiana
Updated Wed, 07 Nov 2012 12:00 PM IST
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मानसा। शास्त्र कहता है कि भक्ति का प्रचार नहीं करना चाहिए। भक्ति के प्रचार से भक्ति में विघ्न आएगा। भक्ति को गुप्त रखिये। भक्ति जगत को दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए है। भक्ति भगवान में तन्मय हो जाने के लिए है। यह विचार पंडित नवराज शास्त्री ने शहर के सिनेमा रोड स्थित जै मां मंदिर में चल रही कार्तिक महात्मय की पवित्र कथा दौरान हरि प्रेमियों से व्यक्त किए। इस अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण लीलाओं का वर्णन करते हुए शास्त्री जी ने कहा कि एक बार प्रभु कौरवों के शांति दूत बनकर द्वारिका से हस्तिनापुर आ रहे हैं। दुर्योधन में अनेक प्रकार के व्यंजन बनाए और पूरी हस्तिनापुर दुल्हन की तरह सजा हुआ है। जैसे ही भगवान कृष्ण द्वारिका से हस्तिनापुर पहुंचे तो सबसे पहले लाडले भक्त विदुर चाचा को देख रहे हैं। दुर्योधन ने कहा कि प्रभु आपके लिए छप्पन प्रकार के भोजन तैयार हैं। मेरे गोविंद ने मुस्कुराकर कहा-देखो दुर्योधन, भोजन केवल दो परिस्थितियों में किया जाता है एक तो तब जब भोजन करवाने वाले के मन में श्रद्धा हो या भोजन करने वाला भूख से पीड़ित है, लेकिन तुम्हारे मन में श्रद्धा नहीं और मेरे पेट में भूख नहीं। इस मौके शास्त्री जी ने ‘दुर्योधन के मेवा त्यागे, सागर विदुर घर खाये’ सुनाकर भक्तों को निहाल किया।
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