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कृषि मंत्री ने केंद्रीय कृषि कानूनों को जिससे बेहतर बताया, जानिए पंजाब के उस एक्ट के बारे में

Sat, 06 Feb 2021 05:04 PM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 06 Feb 2021 05:04 PM IST
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Know about punjab contract farming act
केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह। - फोटो : फाइल फोटो

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ सड़क से संसद तक हाहाकार मचा है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने यह कहकर एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है कि केंद्र के कानून 2013 से पास पंजाब कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट से बेहतर हैं। कैप्टन सरकार ने 2006 में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़ा एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट संशोधन एक्ट पास किया था। 2013 में इसमें फेरबदल करते हुए अकाली-भाजपा सरकार ने इसे पंजाब कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट बना दिया।

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कृषि मंत्री के बयान के बाद अब यह चर्चा छिड़ गई है कि जिस कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के खिलाफ पंजाब के किसान आंदोलन पर हैं, वैसा कानून तो पंजाब में 7 साल पहले पास हो चुका है। इसके तहत पंजाब में धान, गेहूं को छोड़ वाणिज्यिक फसलों की खेती की जा रही है। कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार ने पंजाब में प्राइवेट सेक्टर को कृषि में रास्ता दिलाने के लिए ‘एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट संशोधन एक्ट 2006’ पारित किया था। 
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एक्ट के साथ ही सरकार ने प्राइवेट मंडियों, बाजारों या कंपनियों के लिए रास्ता खोल दिया था। 2006 में पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार ने तब एग्रो बिजनेस में 3000 करोड़ के निवेश का एलान किया था। निजी कंपनियों के बड़े-बड़े स्टोर खोल उनमें ताजी सब्जियां बेचने का प्रावधान किया गया। दिलचस्प है कि यह सब्जियां किसी बिचौलियों से नहीं, बल्कि सीधे किसानों से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिये लेने की योजना तैयार की गई थी। प्रदेश में सत्ता बदली और फिर अकाली-भाजपा की सरकार ने एग्रो बिजनेस को सुस्त कर दिया। 

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विरोध के कारण नहीं किया गया लागू

अकाली-भाजपा सत्ता में आए तो सरकार ने कुछ फेरबदल करते हुए पंजाब कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट 2013 पारित कर दिया। इसका विरोध हुआ तो सरकार ने कानून को ठंडे बस्ते में डाल दिया और इसे लागू नहीं किया। पंजाब में लंबे समय से आलू की खेती अनुबंध पर हो रही है। पेप्सी कंपनी ने संगरूर और पटियाला के बीच दो प्रोसेसिंग प्लांट लगाए हैं। कंपनी पंजाब के विभिन्न गांवों से आलू लेकर दोनों प्लांटों में प्रोसेस कर प्रोडक्ट तैयार करती है।

यह था एक्ट में
2013 में बने द पंजाब कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट के अनुसार, कृषि आधारित उत्पाद तैयार करने वाली कंपनियां सीधे किसानों से अपने लिए फसल उत्पादन करने का समझौता कर सकती हैं। किसानों की फसल को कंपनियां सीधे खरीद सकती हैं। देश में इकलौता पंजाब ऐसा राज्य हैं, जहां ठेके पर खेती का अलग कानून है, जबकि अन्य राज्यों में एपीएमसी के तहत नियम व शर्तें लागू हैं।
 

कांट्रैक्ट खेती का मकसद है, फसल उत्पाद के लिए तयशुदा बाजार तैयार करना। इसके अलावा कृषि के क्षेत्र में पूंजी निवेश को बढ़ावा देना भी कांट्रैक्ट खेती का उद्देश्य है। कृषि उत्पाद के कारोबार में लगी कई कारपोरेट कंपनियों ने कांट्रैक्ट खेती के सिस्टम को इस तरह सुविधाजनक बनाने की कोशिश की, जिससे उन्हें अपनी पसंद का कच्चा माल, तय वक्त पर और कम कीमत पर मिल जाए। 
 

सजा और जुर्माने का था प्रावधान

पंजाब के कानून में किसान व ठेके पर लेने वाले के बीच अनुबंध था कि दोनों में से कोई इसे तोड़ता है तो उसे एक माह की सजा और 5 हजार से पांच लाख तक जुर्माना लगाया जाएगा, चाहे वह किसान हो या फिर कांट्रैक्ट पर खेती करने वाला। इसके लिए बाकायदा रेगुलेटरी अथॉरिटी बनाने का प्रावधान था, लेकिन अथॉरिटी बनाने के स्थान पर अधिकार स्थानीय डिवीजनल कमिश्नर को दे दिए गए। शुक्रवार को केंद्रीय मंत्री तोमर ने संसद में कहा है कि हमारे कानून पंजाब के कानून से बेहतर हैं। पंजाब के कानून में किसानों को सजा का प्रावधान है, लेकिन केंद्रीय कृषि कांट्रैक्ट कानून में किसानों के लिए सजा नहीं है। 

हमने ये कानून लागू ही नहीं किए, इन्हें रद्द करेंगे : जाखड़
पीपीसीसी के प्रधान सुनील जाखड़ का कहना है कि हमने 2013 के कानून लागू ही नहीं किए। केंद्रीय मंत्री तोमर संसद में यह बोलना भूल गए कि पंजाब में भी कानून भाजपा-अकाली दल ने पारित किए थे। इनको कैप्टन सरकार ने लागू ही नहीं किया। हम अकाली-भाजपा सरकार के बनाए 2013 के कानून को रद्द कर देंगे।
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