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खाकी नूं चढ़या चुनावां दा चस्का: बड़े अफसरों से लेकर खेल जगत के चेहरों तक; वर्दी के बाद पकड़ी सियासत की राह

Wed, 09 Sep 2026 11:25 AM IST
Sharukh Khan सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर Published by: Sharukh Khan Updated Wed, 09 Sep 2026 11:25 AM IST
सार

पंजाब की सियासत में कुछ अफसरों ने वर्दी से विधानसभा और मंत्रिमंडल तक सफर तय किया। कोई विधायक और मंत्री बना तो किसी ने चुनाव लड़ा। किसी ने रणनीति और अपनी पार्टी के जरिये पहचान बनाई।

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Punjab Politics From Top Police Officers to Sports Stars, Many Turn to Politics After Uniform
Punjab Politics - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पंजाब की सियासत में खाकी का रंग नया नहीं है। पुलिस की वर्दी में कानून-व्यवस्था संभालने वाले कई अफसर सेवानिवृत्ति या सेवा छोड़ने के बाद चुनावी मैदान में उतरे। कुछ विधानसभा पहुंचे और मंत्री बने तो कुछ चुनाव हारने के बावजूद राजनीति में सक्रिय रहे। पुलिस से राजनीति में आने वालों में डीजीपी स्तर के अफसरों से लेकर उपनिरीक्षक तक शामिल हैं। खेल जगत से पुलिस में आए कई चेहरों ने भी वर्दी उतारने के बाद सियासत का रुख किया।
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वर्दी से विधानसभा और मंत्रिमंडल तक
पूर्व पुलिस अधिकारी कुंवर विजय प्रताप सिंह ने समय से पहले सेवानिवृत्ति लेकर आम आदमी पार्टी का दामन थामा और अमृतसर उत्तर से विधायक बने। पूर्व डीजीपी परमदीप सिंह गिल ने 2012 में अकाली दल के टिकट पर मोगा से चुनाव लड़ा। उन्हें 57,575 वोट मिले जबकि कांग्रेस के जोगिंदर पाल जैन 62,200 वोट लेकर विजयी रहे।
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करीब 32 साल पुलिस सेवा करने वाले बलकार सिंह 2021 में सेवानिवृत्त हुए। राष्ट्रपति पुलिस पदक प्राप्त बलकार ने 2022 में करतारपुर से कांग्रेस के चौधरी सुरिंदर सिंह को हराया और बाद में भगवंत मान सरकार में स्थानीय निकाय मंत्री बने।

 
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पूर्व हॉकी कप्तान और ओलंपियन परगट सिंह पंजाब पुलिस में एसपी रहे। उन्होंने अकाली दल के टिकट पर जालंधर छावनी से चुनाव जीता। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए और शिक्षा एवं खेल मंत्री बने। अर्जुन पुरस्कार विजेता हॉकी खिलाड़ी सुरिंदर सिंह सोढी भी पंजाब पुलिस में आईजी रहे। सेवानिवृत्ति के बाद वह आप में शामिल हुए।
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अर्जुन पुरस्कार विजेता बास्केटबॉल खिलाड़ी सज्जन सिंह चीमा पुलिस में एसपी स्तर तक पहुंचे। उन्होंने आप के टिकट पर 2017 और 2022 में सुल्तानपुर लोधी से चुनाव लड़ा। दोनों बार वह जीत नहीं सके। 2017 में 28,017 वोट के साथ तीसरे और 2022 में 29,903 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे।

पुलिस में उपनिरीक्षक रहे फौजा सिंह सरारी ने करीब 36 साल सेवा के बाद 2022 में गुरुहरसहाय से चुनाव जीता। उन्हें भगवंत मान सरकार में मंत्री बनाया गया लेकिन कथित ध्वनि-रिकॉर्ड विवाद के बाद जनवरी 2023 में इस्तीफा देना पड़ा।

चुनावी मैदान से रणनीति और अलग पार्टी तक
  • पूर्व पुलिस अधिकारी इकबाल सिंह लालपुरा भाजपा में शामिल हुए और बाद में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष बने। पूर्व डीजीपी मोहम्मद मुस्तफा ने चुनाव नहीं लड़ा बल्कि कांग्रेस में सलाहकार और रणनीतिकार की भूमिका निभाई। उनकी पत्नी रजिया सुल्ताना कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और मंत्री रह चुकी हैं।

  • पूर्व डीजीपी सर्बजीत सिंह विर्क आतंकवाद के दौर में पंजाब पुलिस के महत्वपूर्ण अधिकारियों में रहे। दिसंबर 2021 में भाजपा में शामिल हुए। पूर्व डीजीपी मोहम्मद इज़हार आलम 2009 में अकाली दल में आए और पंजाब वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष बने। उनकी पत्नी फरजाना आलम मलेरकोटला से विधायक रहीं।

  • एडीजीपी रहे गुरिंदर सिंह ढिल्लों ने अप्रैल 2024 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर कांग्रेस का दामन थामा। पूर्व डीएसपी सुखजिंदर सिंह खैरा ने अकाली दल में शामिल होकर पंजाब के शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी संभाली।


 

  • पूर्व डीजीपी शशि कांत ने चुनाव नहीं लड़ा लेकिन नशे और राजनीति के कथित गठजोड़ के खिलाफ आवाज उठाई। शामी कुमार कल्याण ने 2022 में पंजाब लोक कांग्रेस के टिकट पर नकोदर से चुनाव लड़ा।

 

  • सबसे अलग उदाहरण सिमरनजीत सिंह मान का है। 1967 बैच के पुलिस अधिकारी मान ने 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में इस्तीफा दिया। इसके बाद उन्होंने शिरोमणि अकाली दल अमृतसर बनाया और तरनतारन तथा संगरूर से सांसद चुने गए।
   

  • यानी पंजाब में खाकी से सियासत तक का सफर सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहा। किसी ने विधानसभा और मंत्रिमंडल तक जगह बनाई तो किसी ने रणनीति और अपनी पार्टी के जरिये राजनीतिक पहचान बनाई।
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