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पटाख व्यापारियों को घाटे का सौदा बनीं दिवाली
नरिंदर वैद्य/अमर उजाला, जालंधर
Updated Fri, 13 Nov 2015 03:09 PM IST
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महानगर के साथ-साथ पूरे राज्य में इस बार दिवाली का त्योहार फीका रहा है। इस त्योहार पर लोगों ने न तो ज्यादा पटाखे फोड़ने में रुचि दिखाई और न ही घरों की सजावट पर ज्यादा ध्यान दिया है।
इस वजह से पटाखा मार्केट के लिए यह दिवाली घाटे का सौदा बनकर रह गई। अकेले जालंधर जिले में ही पटाखे के कारोबार में 40 प्रतिशत सेे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है।
बीते साल जिले में पटाखे की सेल करीब 40 करोड़ थी, वह इस बार 22 से 24 करोड़ रुपये ही रह गई है। बिक्री न होने से दुकानदारों के पास भारी मात्रा में पटाखे का स्टॉक बच गया है। वे अब इन पटाखों को संभालने में लग गए हैं।
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श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं का दिवाली पर कुछ असर हुआ है। इसका सबसे ज्यादा असर गांवों में देखने को मिला है। गांवों में ज्यादातर सिख समाज होने से दिवाल कम मनाई गई। इस वजह से गांवों के दुकानदारों को पटाखे की बिक्री न होने से काफी नुकसान उठाना पड़ा है।
फायर वर्कर्स एसोसिएशन के प्रधान राकेश बाहरी का कहना है कि उनके पास गांव टांडा, मुकेरियां, भुल्लथ, दसूहा, सुलतानपुर से दुकानदार पटाखे लेने आते थे। इस बार यहां से 10 प्रतिशत भी दुकानदार नहीं आए। शहरों में केवल कुछ हद तक पटाखों की बिक्री हुई है।
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इस वजह से पटाखा मार्केट के लिए यह दिवाली घाटे का सौदा बनकर रह गई। अकेले जालंधर जिले में ही पटाखे के कारोबार में 40 प्रतिशत सेे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है।
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बीते साल जिले में पटाखे की सेल करीब 40 करोड़ थी, वह इस बार 22 से 24 करोड़ रुपये ही रह गई है। बिक्री न होने से दुकानदारों के पास भारी मात्रा में पटाखे का स्टॉक बच गया है। वे अब इन पटाखों को संभालने में लग गए हैं।
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श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं का दिवाली पर कुछ असर हुआ है। इसका सबसे ज्यादा असर गांवों में देखने को मिला है। गांवों में ज्यादातर सिख समाज होने से दिवाल कम मनाई गई। इस वजह से गांवों के दुकानदारों को पटाखे की बिक्री न होने से काफी नुकसान उठाना पड़ा है।
फायर वर्कर्स एसोसिएशन के प्रधान राकेश बाहरी का कहना है कि उनके पास गांव टांडा, मुकेरियां, भुल्लथ, दसूहा, सुलतानपुर से दुकानदार पटाखे लेने आते थे। इस बार यहां से 10 प्रतिशत भी दुकानदार नहीं आए। शहरों में केवल कुछ हद तक पटाखों की बिक्री हुई है।