{"_id":"66bd68ab4a8ec87cfb054b7a","slug":"know-about-freedom-fighter-pandit-kanshi-ram-2024-08-15","type":"story","status":"publish","title_hn":"आजादी के मतवाले: अमेरिका छोड़ भारत में आजादी की जंग लड़े पंडित कांशी राम, 33 साल की उम्र में मिली फांसी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आजादी के मतवाले: अमेरिका छोड़ भारत में आजादी की जंग लड़े पंडित कांशी राम, 33 साल की उम्र में मिली फांसी
Thu, 15 Aug 2024 08:02 AM IST
निवेदिता वर्मा
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Thu, 15 Aug 2024 08:02 AM IST
सार
शहीद कांशीराम जोशी का जन्म 13 अक्तूबर 1883 को मोरिंडा के नजदीकी गांव मडोली कलां में पंडित गंगाराम के घर में हुआ था। राजपुरा से तारबाबू का कोर्स पास कर अंबाला के डाकखाना में तारबाबू के तौर पर ड्यूटी की लेकिन कुछ समय बाद नौकरी छोड़ अमेरिका चले गए।
विज्ञापन
पंडित कांशी राम
- फोटो : फाइल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पंडित कांशी राम के बारे में बहुत की कम लोग जानते होंगे, जिन्होंने अमेरिका से भारत आकर आजादी की जंग में हिस्सा लिया और 33 साल की उम्र में फांसी के फंदे को चूम लिया। मुकेरियां में जन्म लेने वाले इस शहीद को आज इतिहास व सरकारों ने ही भुला दिया है।
अमेरिका में अच्छी खासी कमाई और शानदार जिंदगी छोड़कर पंडित कांशी राम जोशी के दिल में कसक थी कि हिंदुस्तान को आजाद करवाने में उनका योगदान जरूरी है और यही कसक इतिहास का साक्षी बन गई कि पंडित कांशीराम आजादी संग्राम के पहले शहीद थे, जिन्हें 27 मार्च 1915 को फांसी लगाई गई थी।
शहीद कांशीराम जोशी का जन्म 13 अक्तूबर 1883 को मोरिंडा के नजदीकी गांव मडोली कलां में पंडित गंगाराम के घर में हुआ था। राजपुरा से तारबाबू का कोर्स पास कर अंबाला के डाकखाना में तारबाबू के तौर पर ड्यूटी की लेकिन कुछ समय बाद नौकरी छोड़ अमेरिका चले गए। कांशीराम ने अमेरिका के सियाटल सिटी में बारूद की फैक्टरी में नौकरी की। बाद में अपनी कंपनी खोल ली और लकड़ी की फैक्ट्रियों में लेबर सप्लाई की ठेकेदारी की। अमेरिका के लोग उस समय भारतीयों को अच्छा इंसान नहीं समझते थे। इसके खिलाफ हिंदुस्तानी कर्मचारियों ने पोर्टलैंड में एकत्रता की और ‘हिंदुस्तान एसोसिएशन ऑफ पेसिफिक कोर्ट’ नाम की संस्था कायम की जिसका महासचिव पंडित कांशीराम को बनाया गया।
विज्ञापन
इस संस्था ने भारत को आजाद करवाने के लिए और अंग्रेजी हुकूमत को खत्म करने के लिए लहर चलाने का प्रोग्राम बनाया। पंडित कांशीराम ने यहीं से भारत की आजादी की जंग में हिस्सा लेना शुरू कर दिया और आसपास के इलाके में काम कर रहे भारतीय कर्मचारियों को एकत्र कर एक बड़ा समागम किया, जिसका लाला हरदयाल ने संबोधन किया। बाद में सैन फ्रांसिस्को में दफ्तर खोलकर पेपर शुरू किया गया, जिसके लिए कांशीराम ने अपनी जमा पूंजी 9 हजार डॉलर संस्था के लिए दिए।
अमेरिका में पंडित कांशी राम लोगों को पूजा-पाठ सिखाने लगे और देश की आजादी के लिए प्रेरित करने लगे। वहीं पर कांशीराम की मुलाकात करतार सिंह सराभा के साथ हुई। उनके साथ कांशी राम पंजाब के लिए जहाज से रवाना हो गए और यहां पर आकर सराभा, कांशीराम लुधियाना जिले में आजादी की जंग में शामिल हो गए। कुछ समय बाद 7 गदरियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसमें कांशीराम भी शामिल थे। अदालत ने इन्हें फांसी की सजा सुना दी और 27 मार्च 1915 को पंडित कांशीराम जोशी को लाहौर जेल में उनके 6 साथियों समेत फांसी दे दी गई और महज 33 साल की उम्र में कांशी राम हंसते-हंसते फंदे पर झूल गए।
विज्ञापन
अमेरिका में अच्छी खासी कमाई और शानदार जिंदगी छोड़कर पंडित कांशी राम जोशी के दिल में कसक थी कि हिंदुस्तान को आजाद करवाने में उनका योगदान जरूरी है और यही कसक इतिहास का साक्षी बन गई कि पंडित कांशीराम आजादी संग्राम के पहले शहीद थे, जिन्हें 27 मार्च 1915 को फांसी लगाई गई थी।
विज्ञापन
शहीद कांशीराम जोशी का जन्म 13 अक्तूबर 1883 को मोरिंडा के नजदीकी गांव मडोली कलां में पंडित गंगाराम के घर में हुआ था। राजपुरा से तारबाबू का कोर्स पास कर अंबाला के डाकखाना में तारबाबू के तौर पर ड्यूटी की लेकिन कुछ समय बाद नौकरी छोड़ अमेरिका चले गए। कांशीराम ने अमेरिका के सियाटल सिटी में बारूद की फैक्टरी में नौकरी की। बाद में अपनी कंपनी खोल ली और लकड़ी की फैक्ट्रियों में लेबर सप्लाई की ठेकेदारी की। अमेरिका के लोग उस समय भारतीयों को अच्छा इंसान नहीं समझते थे। इसके खिलाफ हिंदुस्तानी कर्मचारियों ने पोर्टलैंड में एकत्रता की और ‘हिंदुस्तान एसोसिएशन ऑफ पेसिफिक कोर्ट’ नाम की संस्था कायम की जिसका महासचिव पंडित कांशीराम को बनाया गया।
विज्ञापन
इस संस्था ने भारत को आजाद करवाने के लिए और अंग्रेजी हुकूमत को खत्म करने के लिए लहर चलाने का प्रोग्राम बनाया। पंडित कांशीराम ने यहीं से भारत की आजादी की जंग में हिस्सा लेना शुरू कर दिया और आसपास के इलाके में काम कर रहे भारतीय कर्मचारियों को एकत्र कर एक बड़ा समागम किया, जिसका लाला हरदयाल ने संबोधन किया। बाद में सैन फ्रांसिस्को में दफ्तर खोलकर पेपर शुरू किया गया, जिसके लिए कांशीराम ने अपनी जमा पूंजी 9 हजार डॉलर संस्था के लिए दिए।
अमेरिका में पंडित कांशी राम लोगों को पूजा-पाठ सिखाने लगे और देश की आजादी के लिए प्रेरित करने लगे। वहीं पर कांशीराम की मुलाकात करतार सिंह सराभा के साथ हुई। उनके साथ कांशी राम पंजाब के लिए जहाज से रवाना हो गए और यहां पर आकर सराभा, कांशीराम लुधियाना जिले में आजादी की जंग में शामिल हो गए। कुछ समय बाद 7 गदरियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसमें कांशीराम भी शामिल थे। अदालत ने इन्हें फांसी की सजा सुना दी और 27 मार्च 1915 को पंडित कांशीराम जोशी को लाहौर जेल में उनके 6 साथियों समेत फांसी दे दी गई और महज 33 साल की उम्र में कांशी राम हंसते-हंसते फंदे पर झूल गए।