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सस्ते इलाज का सपना कैसे होगा सच: पीजीआई में चल रहा महंगी दवाइयों का खेल, 97% ब्रांडेड दवाइयां खरीद रहा संस्थान

Mon, 15 Sep 2025 02:31 PM IST
निवेदिता वर्मा वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Mon, 15 Sep 2025 02:31 PM IST
सार

जेनरिक दवाइयां गुणवत्ता और प्रभाव में ब्रांडेड दवाइयों से किसी भी तरह कम नहीं होतीं। इन दवाओं के सक्रिय घटक वही होते हैं जो ब्रांडेड दवाओं में होते हैं लेकिन इन पर किसी कंपनी का पेटेंट नहीं होता। इसी वजह से ये काफी सस्ती होती हैं।

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dream of cheap treatment expensive medicines in PGI buying 97 percent branded medicines
चंडीगढ़ पीजीआई - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केंद्र सरकार जन औषधि और अमृत फार्मेसी से आम लोगों को सस्ती दवाइयां मुहैया कराने में जुटी है जबकि चंडीगढ़ पीजीआई इन कोशिशों को नाकाम करने में जुटा है। 

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पीजीआई में दवा खरीद के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं जिनसे पता चलता है कि संस्थान को सस्ती जेनरिक दवाइयों से ज्यादा महंगी ब्रांडेड दवाइयां पसंद हैं।
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सरकारी ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक संस्थान ने वित्त वर्ष 2020-21 में कुल दवा खरीद का सिर्फ 0.02% जन औषधि केंद्रों से और 2.34% अमृत फार्मेसी से खरीदा जबकि बाकी 97.64% दवाइयां अन्य दुकानों से खरीदी गईं जो ज्यादातर महंगी ब्रांडेड दवाएं थीं। इसमें 59,48,733 लाख की दवाइयां अमृत व जन औषधि से खरीदी गईं जबकि 24,59,79,260 रुपये की दवाइयों की खरीद अन्य दुकानों से हुई।
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यह सीधा-सीधा स्वास्थ्य मंत्रालय के उन निर्देशों का उल्लंघन है जिनमें सरकारी अस्पतालों को जेनरिक दवाइयों की खरीद को प्राथमिकता देने के लिए कहा गया है। पीजीआई ने 2020-21 में 25 करोड़ से ज्यादा कीमत की दवाइयां खरीदीं। इनमें से 24,59,79,260 रुपये की दवाइयां अन्य दुकानों से खरीदीं जबकि महज 59,48,733 लाख की दवाइयां अमृत और जन औषधि से खरीदी गईं।

कमीशन का खेल और मरीजों की जेब पर बोझ

सूत्रों की मानें तो इस खेल के पीछे कमीशन का बड़ा हाथ है। दवा कंपनियां टेंडर हासिल करने के लिए भारी-भरकम कमीशन देती हैं। पीजीआई की ओर से महंगी ब्रांडेड दवाइयों की अंधाधुंध खरीद इस बात की पुष्टि करती है कि नियमों को ताक पर रखकर मोटी रकम बनाई जा रही है। इसका सीधा खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है जिन्हें महंगी दवाइयां खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है।

जेनरिक दवाइयां : सस्ती और असरदार भी

सरकार इसी कारण जन औषधि केंद्रों और अमृत फार्मेसी को बढ़ावा दे रही है। यहां तक कि इन दुकानों से कोई किराया भी नहीं लिया जाता। पीजीआई जैसी जगह पर जहां इन दुकानों से करोड़ों रुपये का किराया मिल सकता था वहां भी सरकार ने ये दुकानें मुफ्त में चलाने की अनुमति दी। इसके बावजूद संस्थान इन योजनाओं को बढ़ावा देने की बजाय इन्हें असफल करने पर तुला हुआ है। यह मामला न सिर्फ मरीजों की जेब पर बोझ डाल रहा है बल्कि सरकार को भी आर्थिक नुकसान पहुंचा रहा है। 2021-22 की ऑडिट रिपोर्ट में भी इस खरीद पैटर्न पर गंभीर आपत्ति जताई गई थी लेकिन संस्थान ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

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